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बिहार में करवट लेती राजनीति | ||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||
इस बार बिहार में संसदीय राजनीति ने भी करवट बदली है. पिछली बार लालू प्रसाद यादव को विधानसभा चुनावों में परास्त करने वाले नीतीश कुमार के नेतृत्व में जेडीयू और भाजपा गठबंधन को लोकसभा चुनावों में भी भारी जीत मिली है. तो लालू प्रसाद यादव और रामविलास पासवान की पार्टियों के गठबंधन को क़रारी हार का सामना करना पड़ा है. कांग्रेस को अकेले चुनाव लड़ने का फ़ायदा वैसा नहीं मिला है जैसा उत्तर प्रदेश में मिला है. लोकजनशक्ति का सफ़ाया बिहार में इस बार की सबसे आश्चर्यजनक हार हाजीपुर से केंद्रीय मंत्री रामविलास पासवान की हुई है. वे वहाँ से आठ बार चुनाव जीत चुके थे और एक बार उन्होंने सबसे अधिक मतों से चुनाव जीतकर अपना नाम गिनीज़ बुक ऑफ़ वर्ल्ड रिकॉर्ड में भी दर्ज कराया था. पासवान को राज्य के पूर्व मुख्यमंत्री और जनता दल यूनाइटेड के उम्मीदवार 88 साल के रामसुंदर दास ने हराया. वे पहले भी कई बार पासवान के ख़िलाफ़ चुनाव लड़े चुके हैं लेकिन इससे पहले उन्हें हरा पाने में कामयाब नहीं हो पाए थे. हाजीपुर में इस बार रामसुंदर दास के पक्ष में कई अगड़ी जातियाँ लामबंद हो गई थीं इसके बाद भी किसी को रामविलास पासवान की हार का अंदाज़ा नहीं था. लोकसभा के चुनाव में लालू प्रसाद की पार्टी को क़रारी हार का सामना करना पड़ा है जबकि ख़ुद लालू प्रसाद पाटिलपुत्र से जद यू उम्मीदवार से पीछे चल रहे हैं वहीं सारण में जद यू उम्मीदवार से बढ़त बनाए हुए हैं. बिहार में पहली बार वाम दल एक साथ मिलकर चुनाव लड़ रहे थे और लोगों को उम्मीद थी कि बेगूसराय और आरा में उन्हें सफलता मिलेगी लेकिन ऐसा नहीं हुआ. इस बार के लोकसभा चुनाव में लालू प्रसाद की पार्टी से अलग होकर अकेले चुनाव लड़ने से कांग्रेस न केवल जीवित हुई है बल्कि दो सीटों पर वह आगे भी चल रही है. लेकिन उसे वहाँ उसे वैसा फ़ायदा नहीं हुआ है जैसा कि उत्तर प्रदेश में हुआ है. राजद के बाहुबली सांसद शहाबुद्दीन की पत्नी हिना शहाब को सिवान में हार का सामना करना पड़ा है उन्हें निर्दलीय ओमप्रकाश यादव ने हराया. कमजोर होती पकड़ राजनीतिक प्रेक्षकों का मानना है कि राजद और लोजपा के हार के पीछे उनके पक्ष में यादव और मुस्लिम वोटों का पूरी तरह न होना रहा है.
राजद और लोजपा का कांग्रेस के साथ चुनावी समझौता न हो पाना और राजद और लोजपा के वोटों का एक-दूसरे में ट्रांसफ़र न हो पाना भी एक एक प्रमुख कारण है. तीन साल पहले हुए विधानसभा चुनाव में मिली जीत के बाद लोकसभा चुनाव में भी मिली जीत को राज्य के मुख्यमंत्री नीतीश कुमार ने इसे सकारात्मक राजनीति की जीत बताया. पटना में संवाददाताओं से उन्होंने कहा, "साढ़े तीन साल पहले बदहाली से तंग जनता ने हमें जो जनादेश दिया था यह जीत उसी पर जनता की मुहर है." उन्होंने कहा कि विपक्ष को यह समझना चाहिए कि जनता अब काम और विकास चाहती है नकारात्मक राजनीति नहीं. उन्होंने कहा कि रामविलास पासवान और लालू प्रसाद यादव ने 2004 में बिहार को विशेष पैकेज दिलाने का वादा किया था. जिसका जिक्र आम वजट में भी किया गया था लेकिन वे दिला नहीं पाए हैं. बिहार के मुख्यमंत्री ने कहा कि कांग्रेस ने बिहार को विशेष राज्य का दर्जा देने की माँग का समर्थन किया था. अब उसे बहुमत मिला है तो उसे हमारी माँग पूरी करनी चाहिए. |
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