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क्या हो सकता है बिहार के चुनावों में | ||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||
बिहार में दूसरे चरण के चुनाव के लिए बिसातें बिछ चुकी हैं और मोहरे तैयार हैं. प्रचार ख़त्म हो चुका है पर बिना शोर के. शायद यह चुनाव आयोग का असर था. चुनावी माहौल भांपने के लिए मैंने शुरुआत की हाजीपुर से. बिल्कुल शांत माहौल. एक ओर रेलवे लाइन और दूसरी ओर सड़क पर धूल उड़ाती गाड़ियां, लेकिन ये बारातियों की थी, प्रचार गाड़ी नहीं. मुजफ़्फ़रपुर जाने वाले रास्ते पर कुछ लोग बात करते मिले कि राम विलास पासवान को पूर्व मुख्यमंत्री और जनता दल युनाईटेड के नेता राम सुंदर दास कड़ी टक्कर दे रहे हैं. चौक-चौराहों पर लोजपा के बंगला छाप की गाड़ियां खूब दिखी. राम विलास पासवान के कामों की तारीफ़ हो रही थी, वहीं मुख्यमंत्री नीतीश कुमार की विकास पुरुष वाली छवि भी लोगों के जेहन में थी. लोकतंत्र की जन्मस्थली कही जाने वाली वैशाली में केंद्रीय मंत्री रघुवंश प्रसाद और बाहुबली छवि के मुन्ना शुक्ला के बीच कांटे की टक्कर. रघुवंश प्रसाद का रिम यानी राजपूत, यादव और मुस्लिम समीकरण जाता रहा, ऐसी हवा बनती दिखी. कांटी ब्ल़ॉक चौक पर ख़ुद रघुवंश प्रसाद के कार्यकर्ताओं ने माना कि कांग्रेसी उम्मीदवार हिंद केशरी यादव, रघुवंश प्रसाद के वोटों में सेंध लगा रहे हैं. इसी बहस को सुन रहे एक बुज़ुर्ग ने मुझसे कहा, देख रहे हैं वैशाली की हर गली पक्की सड़क बन गई, फिर भी रघुवंश बाबू हारे तो लोकतंत्र की त्रासदी होगी.
सिर्फ़ वैशाली ही नहीं कांग्रेस के उम्मीदवार मुज़फ्फ़पुर, समस्तीपुर, दरभंगा, बेतिया और सीतामढ़ी में भी मुक़ाबले को त्रिकोणीय बना रहे हैं. मधुबनी में कांग्रेस के शकील अहमद और हुकुमदेव नारायण के बीच सीधा मुक़ाबला दिख रहा है. जात-पात बड़ी बात इस चरण में रोचक बात ये लगी कि शुरुआत तो सभी दलों ने विकास के मुद्दे से की लेकिन चुनान नज़दीक आते-आते जातीय समीकरण फिर अहम होता दिख रहा है. उदाहरण मुज़फ्फरपुर सीट. यहां शुरुआत में लोक जनशक्ति पार्टी के भगवान लाल साहनी और जद यू के जयनारायण निषाद के बीच सीधा मुक़ाबला नज़र आ रहा था लेकिन जातीय गोलबंदी और मुसलमानों के कांग्रेस की ओर रुझान ने कांग्रेसी उम्मीदवार विनीता विजय की लड़ाई में वापसी कर दी है. हो भी क्यों न, यहां राजनीति की हवा रातोंरात बदलती है. कल गांव का गांव किसके पक्ष में होगा, कहा नहीं जा सकता. मुज़फ्फ़रपुर से पश्चिम की ओर बढ़ने पर मोतिहारी में केंद्रीय मंत्री और राजद उम्मीदवार अखिलेश सिंह हर जगह नीतीश सरकार की कमियों को उजागर करते दिखे. लोग उनके आस-पास जुटते ज़रूर लेकिन नेताजी के निकलते ही ये आपस में ही पूछते कि ख़ुद पूर्वी चंपारण के लिए उन्होंने क्या किया. मोतिहारी से सटे पश्चिम चंपारण यानी बेतिया में फिल्म निर्माता प्रकाश झा लोजपा से, लालू के साले साधु यादव कांग्रेस से और भाजपा के संजय जायसवाल मैदान में हैं. दिलचस्प मुक़ाबला और प्रचार का तरीका भी अलग. यहां आप दस लोगों से मिलें और पूछें कि सीधा मुक़ाबला किनके बीच है, तो तीन का जवाब होगा प्रकाश झा बनाम साधु यादव, तीन कहेंगे प्रकाश झा बनाम जायसवाल और तीन ये भी कहेंगे कि साधु यादव बनाम जायसवाल. ये सवाल जब मैंने तीनों उम्मीदवारों के समक्ष रखा तो साधु यादव और जायसवाल ने कहा उन्हीं दोनों में मुक़ाबला है. लेकिन प्रकाश झा दार्शनिक अंदाज़ में ये कहते हैं कि उनका मुक़ाबला तो किसी से है ही नहीं. समस्तीपुर में लोग रामविलास पासवान के भाई रामचंद्र पासवान से ये सवाल पूछते हैं कि परिसीमन के बाद इसी सीट को क्यों चुना और पिछले पांच साल में रोसड़ा के लिए क्या किया. मुस्लिम वोट
वहीं से दरभंगा और मुधबनी जाने पर अल्पसंख्यक वोटरों का रुझान पता चलता है. बेतिया के भटही गांव से लेकर मधुबनी के बलहा गांव तक ग़रीब-अमीर सभी तबके के मुसलमानों में आक्रोश दिखा. उन्होंने बेबाकी से कहा कि लालू उन्हें भाजपा के नाम पर डराते आए हैं. दरभंगा में जब एक मस्जिद के बाहर मैंने लोगों से बात की तो वे खुद लालू के उस बयान का ज़िक्र करने लगे जिसमें उन्होंने बाबरी मस्जिद विध्वंस के लिए कांग्रेस को ज़िम्मेदार ठहराया था. वे मुझसे राजद प्रत्याशी एमए फ़ातमी और लालू यादव से ये पूछने को कह रहे थे कि जब बिहार में 15 वर्षों तक राज किया तो अकलियतों के लिए क्या किया. उनका कहना था कि कल्याण सिंह को साथ लेने वाले लालू अब बिहार के मुसलमानों के असली दुश्मन बन गए हैं. ये तो समर क्षेत्र की बातें है जो कुछ चीजें पूरे बिहार में एक समान लागू होती है, वो है जनता की उदासीनता इस चुनाव के प्रति. ख़ास कर युवा कार्यकर्ता नदारद. हाथ जोड़ हर द्वार से गुजर रहे उम्मीदवारों के लिए कोई ख़ास जोश नहीं, नारों में दम नहीं. कुछ नौजवानों से बात करने पर मालूम हुआ कि युया मतदाता बूढ़े उम्मीदवारों से परेशान है. दूसरा कारण ये दल-बदलू उम्मीदवारों को बताते हैं. क्या पता कल निष्ठा किसके प्रति हो जाए? दिन-ब-दिन चढ़ते पारे के बीच नेता भले ही खाक छान रहे हों लेकिन जनता उनको सुनने नहीं निकल रही है. मुख्यमंत्री की सभा तक में भीड़ नहीं दिखाई देती. लोगों का मन टटोलने पर जवाब मिलता है – जनता सब जानती है. जोश और उत्साह में कमी के लिए कुछ लोग चुनाव आयोग की सख्ती को भी जिम्मेदार बताते हैं. न कहीं पोस्टर, कहीं झंडे. इस सख्ती का एक और पहलू है. ये मुजफ्फरपुर के जोगनी गांव की एक दलित महिला मतदाता से उजागर होता है, वो कहती है, न तो उम्मीदवारों का फोटो पता है न निशान, फिर कहां उंगली दबाउंगी क्या पता. |
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