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बिहार में चुनाव का 'साइड इफ़ेक्ट' | |||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||
बिहार में आजकल शादी-ब्याह का मौसम है लेकिन शादियाँ टाली जा रही हैं. अगर बारात निकली तो दुल्हे की सवारी दुल्हन के घर तक पहुंचेगी, ये तय नहीं. लोगों के मुंह से सिर्फ़ यही निकल रहा है... 'चुनाव जो न कराए'. लड़की पक्ष को तो इसकी चिंता नहीं है लेकिन वर पक्ष वाले बेचारे परेशान हैं. क्योंकि कोई भी ट्रेवल एजेंसी अपनी गाड़ी, चाहे कार हो या बस, भाड़े पर देने को तैयार नहीं है. सबके सब सात मई तक का इंतज़ार करने को कह रहे हैं. उसी दिन बिहार में आख़िरी चरण का मतदान है. इस समय चुनाव ड्यूटी लिए बड़े पैमाने पर गाड़ियाँ ज़ब्त की जा रही हैं. चाहे निजी गाड़ी हो या टैक्सी, आजकल सड़क पर गाड़ी निकालने के बजाए लोग घर में ही गाड़ी रखना पसंद कर रहे हैं. चिंता की बात यह कि अगर आपने गाड़ी निकाली तो सड़कों पर कहीं भी पुलिस की गाड़ी मिल सकती है और उसमें बैठे अधिकारी तुरंत आपकी गाड़ी पर पोस्टरनुमा आदेशपत्र चिपका देते हैं. इसमें चुनाव ड्यूटी के लिए किस तारीख़ को कितने बजे पहुंचना है, इसका विवरण होता है. आस्था ट्रेवल्स के पिंकू का कहना है, "हम लोग गाड़ी भाड़े पर नहीं दे रहे हैं. अगर ज़ब्त हो गई तो गाड़ी का क्या हाल होगा पता नहीं. सरकार को चाहिए था कि पर्यवेक्षकों, सुरक्षाकर्मियों और ईवीएम मशीनों को ढोने के लिए अपनी ओर से व्यवस्था करती या फिर गाड़ी मालिकों को उचित पैसे का भुगतान करती." टल रही है शादियाँ
प्रशासन बारात की गाड़ियों तक को नहीं बख़्श रहा है. मुज़फ़्फ़रपुर से सटे कमतौल गांव में शिवपूजन शर्मा शादी के लिए निकले, लेकिन बारात पहुँचने से पाँच किलोमीटर पहले ही उनके भाड़े की गाड़ी पकड़ ली गई. चालक ने विरोध किया तो गाड़ी उसी समय वहीं ज़ब्त कर ली गई. शिवपूजन के पिता जी कहते हैं, "हम लोगों ने किसी तरह लड़की वालों तक ये ख़बर पहुँचाई और उन्हीं के गांव से किसी तरह गाड़ी का इंतज़ाम किया गया." कई बार तो ऐसा भी हुआ है कि बारातियों से लदी गाड़ी पकड़ ली गई और वापसी में उन्हें सार्वजनिक परिवहन व्यवस्था का इस्तेमाल करना पड़ा. कुछ लोगों ने पहले से तय शादियों की तारीख़ भी आगे खिसका दी है. मुज़फ़्फ़रपुर ज़िले के बरूराज के रहने वाले राजू ने अपनी बहन की शादी 17 अप्रैल से बढ़ा कर 10 मई कर दी है. लेकिन गाड़ी ज़ब्त होने से चालक खुश हैं. मैंने ट्रैवल एजेंसी में ही काम करने वाले एक स्थानीय ड्राइवर उमेश से इसका कारण पूछा, "हमें तो हर दिन सौ-डेढ़ सौ रूपया भी मिलता है और डीज़ल में भी इधऱ-उधर हो जाता है. लेकिन मालिक को कुछ भी नहीं मिलता." लेकिन जो लोग अपनी कार ख़ुद ही चलाते हैं, उनमें से अधिकांश ने अपनी गाड़ी बाहर निकालना बंद कर दिया है. कुछ लोगों ने तो अपने गैराज में ही गाड़ी के पहिए निकाल कर अलग रख दिए हैं ताकि पुलिस अगर घर भी पहुंच जाए तो जवाब दिया जा सके कि गाड़ी ख़राब है. |
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