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दोस्ती नहीं दुश्मनी की डोर से बंधी महिला | ||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||
अक्सर लोग दोस्ती की डोर से बंधे होने की बात करते हैं, लेकिन अट्ठावन साल की एक महिला दुश्मनी की डोर से बंधी हैं. वो अपने बेटे के कथित हत्यारे से बदला लेने के लिए चुनाव मैदान में है. इलाहाबाद के सुलेमसराय की रहने वाली रानी पाल कहती हैं, ''जहां-जहां से अतीक अहमद चुनाव लड़ेंगे वहां-वहां से मैं उनके ख़िलाफ़ चुनाव मैदान में रहूँगी.'' सितंबर 2004 में रानी पाल के बेटे राजू पाल ने बहुजन समाज पार्टी के टिकट पर इलाहाबाद पश्चिम विधान सभा सीट से अतीक अहमद के भाई अशरफ को हराकर उपचुनाव में जीत दर्ज की थी. लेकिन विधायक चुने जाने के चार महीने बाद ही उनकी दिन दहाड़े हत्या हो गई. हत्या से मात्र नौ दिन पहले राजू पाल की शादी पूजा पाल से हुई थी. राजू पाल के परिवार ने हत्या के लिए सीधे-सीधे अतीक अहमद और तत्कालीन मुख्यमंत्री मुलायम सिंह पर इल्ज़ाम लगाया था. अतीक अहमद की पहचान एक बाहुबली नेता के तौर पर होती है और उनके ख़िलाफ़ कई मुक़दमे दर्ज हैं. परिवार का आरोप राजू पाल की हत्या के एक साल बाद उपचुनाव हुआ, मगर राजू की पत्नी पूजा पाल चुनाव हार गईं या उनके परिवार वालों की माने तो प्रशासन ने उन्हें हरवा दिया और अशरफ विधायक हो गए. लेकिन 2007 के आम चुनाव में पूजा पाल बहुजन समाज पार्टी की लहर में विधायक बन गईं. सरकार संभालते ही मायावती ने हत्याकांड की केंद्रीय जांच ब्यूरो (सीबीआई) से जांच की सिफ़ारिश कर दी और प्रशासन ने अतीक अहमद पर निशाना साधना शुरू किया. लेकिन समय बदला, मायावती को प्रधानमंत्री की कुर्सी दिखाई देने लगी. परमाणु क़रार के मसले पर मायावती ने जेल में बंद अतीक अहमद से हाथ मिला लिया. इस बीच राजू पाल की माँ का कहना है कि मैंने कई बार मुख्यमंत्री मायावती से मिलने की कोशिश की पर कामयाब नही हुई. तभी मैंने ठान लिया अतीक अहमद के खिलाफ चुनाव लडूंगी. लोक सभा चुनाव में टिकट के लिए अतीक अहमद की बात बहुजन समाज पार्टी से बनते-बनते रह गई और वह फूलपुर से सटे प्रतापगढ़ से अपना दल के टिकट पर चुनाव लड़ रहे हैं. अतीक अहमद जेल में हैं. उन पर दर्जनों गंभीर आपराधिक मामले हैं. कानून उन्हें संसद जाने से नही रोक सकता, रानी पाल जनता की अदालत में गुहार लगा रही हैं. डोली के साथ झाड़ू
चुनाव के इस संग्राम में बड़े-बड़े योद्धा खड़े हैं, लेकिन उन सबसे अलग हैं रानी पाल. नामांकन भरने गईं तो वह डोली साथ ले गईं जिस पर सवार होकर उनकी बहू ससुराल आई थी और नौ दिन बाद ही विधवा हो गई. नामांकन के समय उनके हाथ में एक झाड़ू भी थी. राजू पाल के दोस्त और अब रानी पाल के चुनाव प्रचारक ओम प्रकाश सिंह बघेल कहते हैं, '' झाड़ू इसलिए कि संसद में पहुँच कर मैं चुनाव लड़ रहे माफियाओं की सफाई कर सकूं.'' रानी पाल का ज़ोर अपने को जिताने से ज्यादा अपने विरोधी अतीक अहमद को हराने पर है. उनका एक छोटा सा पर्चा है जिसमें उनके साथ साथ मृत बेटे राजू पाल की तस्वीर छपी है. पर्चे पर लिखा है '' इंसानियत मर गई, स्वार्थ, पैसा, राजनीति, दलाली के लिए.'' रानी पाल को मालूम है कि न तो वह ख़ुद चुनाव जीत सकती हैं और न ही अतीक अहमद का बहुत कुछ बिगाड़ सकती हैं. पर एक लोकतांत्रिक समाज में आप और कैसे किसी का विरोध कर सकते हैं, रानी पाल के लिए यही गांधीगिरी है. अपनी बात पर डटे रहना. जब मैंने पूछा इतने बड़े माफिया से लड़ने में डर नही लगता? रानी पाल कहती हैं, ''अब क्या डरना. मेरा बेटा छिन गया. पति भी नही रहे. मरना तो एक दिन है ही. मरने से क्या डरना? जो मरने से न डरें तो माफिया भी उनका क्या बिगाड़ सकता है?" |
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