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लोकतंत्र के मेले में पहचान खोजते मुसलमान | ||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||
मेरा भाई निर्दोष है. जो किसी की चोट को देखकर डर जाता था, वो किसी आतंकवादी गतिविधि में कैसे शामिल हो सकता है. उसे बेवजह ही.... कहते कहते आरिफ़ की बहन की आंखों में आंसू छलक आते हैं. गला बंद हो जाता है. आरिफ़ आज़मगढ़ के संजरपुर गाँव का रहनेवाला है और इन दिनों लखनऊ में पुलिस हिरासत में है. आरोप है कि वो लखनऊ की कचहरी में वर्ष 2007 में हुए धमाकों में शामिल था. आरिफ़ के दोस्त उसे अच्छा क्रिकेट खेलने वाले संवेदनशील दोस्त के रूप में जानते हैं. घरवालों की नज़र में वो परिवार, गांव समाज के लोगों का इलाज कर रहा भविष्य का एक डॉक्टर है. पुलिस प्रशासन और दुनिया की नज़रों में अब उसकी पहचान एक चरमपंथी की है. उसकी यह पहचान बनी दिल्ली के बटला हाउस एनकाउंटर के सिलसिले में गिरफ़्तार किए गए आज़मगढ़ के इसी गांव के एक लड़के सैफ़ के मोबाइल के ज़रिए. घरवाले कहते हैं कि आरिफ़ और सैफ़ जब कभी एकसाथ गाँव में होते थे तो साथ-साथ क्रिकेट खेलते थे. मिलते-जुलते थे. पुलिस से घरवाले पूछते हैं कि आरिफ़ का जुर्म क्या है तो पुलिस कहती है कि आरिफ़ भी सैफ़ की तरह चरमपंथी गतिविधियों में शामिल था. सबूत सैफ़ के फ़ोन में उसका नंबर है. आरिफ़ की माँ की आंखें सूनी हैं. वो हमसे बात करने के लिए बरामदे में आईं. सामने बैठीं पर एक शब्द भी न कह सकीं. घर में छोटा भाई है तारिक़. तारिक़ ने अभी हाईस्कूल की परीक्षा दी है. वो आगे की पढ़ाई के लिए बाहर किसी अच्छे स्कूल में जाना चाहता है. आगे चलकर इंजीनियर बनना चाहता है. घरवाले एक बेटे के साथ घटे हादसे से उबर नहीं पा रहे हैं. दूसरे के पैरों में अब परिवार और परिस्थितियों की बेड़ियाँ हैं. आरिफ़ कौन है...
यह सवाल पुलिस से करें तो जवाब मिलता है कि वो एक चरमपंथी है. राजनीतिज्ञों से करें तो वो कहते हैं कि एक मुसलमान है, पर परिवार के लिए वो बुढ़ापे में एक उम्मीद का दरवाज़ा है, लखनऊ में सीपीएमटी मेडिकल प्रवेश परीक्षा की तैयारी कर रहा युवा है. देश के करोड़ों युवाओं की तरह ही विकास और तरक्की देखने को आतुर आंखें है. पर आज के आरिफ़ की कहानी आज़मगढ़ में जन्मे ऐसे लगभग 17 युवाओं की कहानी है जिन्हें वर्ष 2007 से अबतक के समय में चरमपंथी गतिविधियों में शामिल होने के आरोप में हिरासत में लिया गया है. केवल इस संजरपुर गाँव में ही नौ युवा अबतक ऐसे अभियोगों के अंजाम चढ़ चुके हैं. बटला हाउस एनकाउंटर में इस गाँव के दो युवा मारे गए. दो, सैफ़ और आरिफ़ गिरफ़्तार हैं. पाँच वांछित हैं, घरों और पुलिस की पहुँच से दूर हैं. इनमें से कुछ मुंबई में पकड़े गए हैं. कुछ को दिल्ली और कुछ को उनके पैतृक निवासों से उठाया गया है. कुछ पर आरोप तय हैं. कुछ की सुनवाई चल रही है. सभी जयपुर धमाकों, अहमदाबाद में चरमपंथी कार्रवाइयों, दिल्ली में विस्फोट, बटला हाउस एनकाउंटर जैसे किसी न किसी मामले में संदिग्ध पाए गए हैं. आरिफ़ का मुक़दमा अभी तक शुरू भी नहीं हो सका है और उसे पुलिस की क़ैद में तीन महीने से भी ज़्यादा वक़्त बीत चुका है. आरिफ़ के गाँव और आसपास के युवाओं की आखों में देखें तो आरिफ़ की कहानी की तकलीफ़ और एक भय तैरता नज़र आता है. इस इलाके में कई घरों के बच्चे अब इसलिए बाहर नहीं जा सकते क्योंकि उनके घरवाले उन्हें किसी ऐसे मामले में शामिल बताए जाने जैसा कुछ नहीं देखना चाहते. नेता तुम्हीं हो कल के... ऐसे ही कुछ युवाओं से मैंने पूछा कि आज की परिस्थितियों में वो ख़ुद को कैसा पाते हैं. इनके चेहरों पर जवाब देना आसान नहीं दिखता, शायद जवाब देने से भी डर है. जब कुरेदने पर मुंह खुलता है तो ये कहते हैं, "हम लोगों के साथ बहुत बुरा हो रहा है. पुलिस और नेता अपने को बचाने के लिए हम लोगों के साथ ऐसा कर रहे हैं. राजनेताओं के पास कोई काम नहीं है पर कुछ तो करना है इसलिए हमलोगों को फंसाया जा रहा है ताकि दूरियाँ पैदा हों. ये देश को तोड़ने की राजनीति कर रहे हैं." एक और युवा कहते हैं, "आज़मगढ़ के युवाओं को, ख़ासकर एक समुदाय के लोगों को निशाना बनाया जा रहा है. उन्हें आतंकवाद के नाम पर फंसाया जा रहा है. हमें नहीं लगता कि जिन युवाओं को पुलिस ने चरमपंथी गतिविधियों में शामिल होने के आरोप में उठाया है, वो इनमें शामिल थे."
पर क्या इन परिस्थितियों में नेता संजरपुर के लोगों के पास नहीं आए. क्या उन्होंने इन युवाओं के दर्द को समझने, हल करने की कोशिश नहीं की. जवाब मिलता है, "कई नेता आश्वासन की बातें लेकर हमारे पास आए पर आज पाँच-छह महीने बाद भी कोई कुछ करता नज़र नहीं आ रहा है. सब बातें करके जाते हैं." मानवाधिकार कार्यकर्ता तारिक़ कहते हैं, "पिछले दिनों यहाँ समाजवादी पार्टी से शिवपाल सिंह यादव आए. उन्होंने कहा कि मुसलमानों की लड़ाई लड़ेंगे पर अगर कुछ वाकई करना है तो संसद में सवाल उठाना चाहिए था, आजतक सपा ने संसद में यह सवाल क्यों नहीं उठाया. बसपा के टिकट पर लड़ रहे अक़बर अहमद डंपी भी संसद में सवाल क्यों नहीं उठाते हैं." पर हल क्या है इस स्थिति का, इसपर निराशा दिखाई देती है इन युवाओं को. एक कहता है, "कोई हल नहीं है क्योंकि सरकारें हल निकालना नहीं चाहतीं. ऐसे ही रहा तो हम चुनावों का बहिष्कार कर देंगे." आतंक का गढ़ कहाँ है... जहाँ आज़मगढ़ का चुनाव इसबार आतंकवाद के मुद्दे के इर्द-गिर्द ही लड़ा जाता नज़र आ रहा है वहीं इस गाँव में चुनाव का मौसम सूना है. लोगों में हर ओर से निराशा है. नेताओं के पास आतंकवाद से मुक्ति के नारे हैं. मुसलमानों को सम्मान से जीने देने का वादा है वहीं इन भाषणों के जवाब में यहाँ के युवाओं के चेहरे पर खोखली हंसी है. एक युवा हमें बताते हैं, "यहाँ आए तो कई नेता. अपने अपने झंडे लगे काफिलों के साथ. हमारी स्थिति के साथ सहानुभूति जताई पर अबतक कुछ न कर पाने की वजह से लोगों की आंख में आंख नहीं डाल पा रहे. उनके लबों पर वोट मांगने के लिए शब्द नहीं आ पा रहे. वो वोट मांगने की हिम्मत नहीं जुटा पा रहे हैं." एक और युवा ज़ोर देकर कहते हैं, "दरअसल, ये नेता जब दूसरे इलाक़ों में मुसलमानों से वोट मांगने जाते हैं तो लोग पूछते हैं कि क्या संजरपुर गए थे. ये उन लोगों से हाँ कह सकें इसलिए यहाँ आए हैं वरना इनकी यहाँ आने की हिम्मत नहीं है." आरिफ़ की बहन से हमने पूछा कि उन्हें क्यों लगता है कि आरिफ़ बेकसूर है. जवाब मिलता है, "ऐसा मान लेना हम लोगों के लिए इसीलिए मुश्किल नहीं है कि वो हमारे घर का है बल्कि उसका स्वभाव ऐसा था ही नहीं. वो अपने करियर को लेकर चिंतित था. उसे डॉक्टर बनना था और इसी के लिए वो मेहनत कर रहा था." घरवाले बातें करते करते कुछ बिखरते, कुछ हिम्मत जुटाते नज़र आते हैं. बहन कहती है, "आरिफ़ के साथ न्याय होगा तो हमें भी न्याय मिलेगा. पर न्याय मिलेगा, इसे लेकर भी शक होता है क्योंकि कितने ही लोग बेगुनाह हैं पर सीखचों के पीछे हैं...." आरिफ़ निर्दोष है या नहीं, यह जाँच का विषय है. इसकी जाँच होगी और शायद सच सामने आ जाएगा. पर आज़मगढ़ के इस गाँव को देखकर, यहां के लोगों से मिलकर इतना ज़रूर दिखता है कि जिस आज़मगढ़ को कुछ लोगों ने आतंक का गढ़ तक कह डाला, वहाँ के इस गाँव के लोगों के लिए अब घर की दहलीज़ के बाहर की पूरी दुनिया आंतक का गढ़ बन गई है. उन्हें ख़ौफ़ है कि कहीं ये आतंक की दुनिया उनके बच्चों को निगल न ले. |
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