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सोमवार, 03 नवंबर, 2008 को 20:32 GMT तक के समाचार
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पैर पसारता सांप्रदायिक 'आतंकवाद'!

आतंकवाद का मुक़ाबला संगठित होकर करना होगा
ऐसे आरोप हैं कि राजनीतिक स्वार्थों के लिए समाज की शांति को भंग किया जाता है
भारत में पिछले कुछ समय पर नज़र डालें तो अनेक ऐसी घटनाएँ हुई हैं जो भारत की क़ानून और व्यवस्था के साथ-साथ राजनीतिक नेतृत्व और सरकार के लिए भी चुनौती हैं लेकिन किया इस चुनौती का सामना करने के लिए समुचित रणनीति पर ग़ौर किया जा रहा है या फिर इन हालात को राजनीतिक स्वार्थों के लिए भुनाने की कोशिश की जा रही है?

इतना ही नहीं, एक तबका इन्हें हिंदू और मुसलमानों से भी जोड़कर देखने लगा है. मगर भारतीय सुप्रीम कोर्ट के पूर्व मुख्य न्यायाधीश और राष्ट्रीय मानवाधिकार आयोग के चेयरमैन रह चुके जस्टिस जगदीश शरण वर्मा कहते हैं कि इसमें धर्म को खींचना ग़लत है.

जस्टिस वर्मा का कहना है, “जो लोग क़ानून के ख़िलाफ़ जो भी कार्रवाई करते हैं वे सब क़ानून की नज़र में अपराधी हैं और उनके साथ उसी के अनुसार बर्ताव होना चाहिए. इसमें हिंदू या मुसलमान होने की कोई बात ही नहीं है. क़ानून की नज़र में अगर किसी ने कोई जुर्म किया है तो उसी के अनुसार उनका दर्जा तय होना चाहिए."

अपराधी सिर्फ़ अपराधी...
 जो लोग क़ानून के ख़िलाफ़ जो भी कार्रवाई करते हैं वे सब क़ानून की नज़र में अपराधी हैं और उनके साथ उसी के अनुसार बर्ताव होना चाहिए. इसमें हिंदू या मुसलमान होने की कोई बात ही नहीं है. क़ानून की नज़र में अगर किसी ने कोई जुर्म किया है तो उसी के अनुसार उनका दर्जा तय होना चाहिए.
जस्टिस जेएस वर्मा

भारत में 'आतंकवादी' घटनाएँ क्यों हो रही हैं? क्या इन घटनाओं को आतंकवाद कहना भी चाहिए या ये महज़ क़ानून और व्यवस्था की घटनाएँ जिन्हें कुछ निजी स्वार्थों की वजह से 'आतंकवाद' का नाम दे दिया जाता है.

कार्रवाई का अभाव

भारतीय पुलिस सेवा यानी आईपीएस के पूर्व अधिकारी और पुलिस सुधारों पर काम कर रहे के एस ढिल्लों कहते हैं कि आतंकवाद का इस्तेमाल किसी राजनीतिक उद्देश्य के लिए किया जाता था लेकिन अब इसकी परिभाषा कुछ बदल गई है, “आतंकवाद का मतलब होता था किसी राजनीतिक लक्ष्य को हासिल करने के लिए की गई विध्वंसक कार्रवाई लेकिन अब इसका मतलब कुछ बदल सा गया है. भारत में जो बम विस्फोट की घटनाएँ हो रही हैं उनका राजनीतिक लक्ष्य सरकार को अस्थिर करना हो सकता है.”

के एस ढिल्लों कहते हैं, “इन घटनाओं को तथाकथित इस्लामी आतंकवाद से नहीं जोड़ा जा सकता क्योंकि यह उस तरह का आतंकवाद है जो किसी परेशानी या हताशा की वजह से पैदा हुआ है.”

ढिल्लों कहते हैं, “अयोध्या में दिसंबर 1992 में बाबरी मस्जिद गिराए जाने से पहले भारत के मुसलमानों में कभी ऐसी भावना नहीं आई थी कि वो देश के दूसरे दर्जे के नागरिक हैं लेकिन मस्जिद गिराए को बड़े ही संगठित तरीके से जाने के बाद जब सरकार ने कोई ठोस कार्रवाई नहीं की है. उसके बाद मुंबई में तुरंत सांप्रदायिक दंगों का भड़कना और सबसे ख़तरनाक थे वर्ष 2002 में गुजरात के दंगे.”

ठोस कार्रवाई का अभाव...
 अयोध्या में दिसंबर 1992 में बाबरी मस्जिद गिराए जाने से पहले भारत के मुसलमानों में कभी ऐसी भावना नहीं आई थी कि वो देश के दूसरे दर्जे के नागरिक हैं लेकिन मस्जिद गिराए को बड़े ही संगठित तरीके से जाने के बाद जब सरकार ने कोई ठोस कार्रवाई नहीं की है. उसके बाद मुंबई में तुरंत सांप्रदायिक दंगों का भड़कना और सबसे ख़तरनाक थे वर्ष 2002 में गुजरात के दंगे.
केएस ढिल्लों

“मुसलमान भारत का सबसे बड़ा अल्पसंख्यक समुदाय है और उनके एक तबके में ये भावनाएँ पनप रही हैं कि इस समुदाय को दबाने की कोशिश की जा रही है और ऐसा जब भी होता है वो राजसत्ता की मदद से होता है.”

चिंता की बात ये है कि राजनीतिक नेतृत्व की उदासनीता की वजह से एक धर्मनिर्पेक्ष देश में समाज सांप्रदायिक रास्तों पर बँटता नज़र आने लगता है. कुछ हिंदुओं का कहना है कि जितनी भी 'आतंकवादी' घटनाएँ होती हैं उनमें मुसलमानों का हाथ होता है.

दूसरी तरफ़ अनेक मुसलमानों का कहना है कि उनके साथ ना सिर्फ़ भेदभाव होता है बल्कि बड़े पैमाने पर उनके अधिकारों का उल्लंघन होता है. उन पर हमेशा शक किया जाता है. ऐसे माहौल में किसी घटना की सच्चाई क्या है, उसे जानने का इंतज़ार करने के बिना बहुत से लोग आनन-फानन में कोई राय बना लेते हैं जिसे देश और समाज का शायद इतना बड़ा नुक़सान हो जाता है जिसकी भरपाई करना अगर असंभव नहीं तो बेहद मुश्किल ज़रूर होता है. क्या मीडिया को ऐसे माहौल में संयम बरतने की ज़रूरत है.

मीडिया की भूमिका

पत्रकार और गुप्तचर मामलों पर नज़र रखने वाले प्रवीण स्वामी कहते हैं, “जब भी किसी समुदाय के कुछ सदस्यों की गतिविधियों की वजह से पूरे समुदाय को ज़िम्मेदार ठहराया जाता है तो उसके ख़तरनाक परिणाम होते हैं. इस प्रवृत्ति को ख़त्म किया जाना चाहिए. हाल के समय में आज़मगढ़ को आतंकवाद का गढ़ कहा जाने लगा जबकि सच्चाई ये है कि आज़मगढ़ में लाखों लोग रहते हैं और अगर उनमें से चंद लोग किन्ही विध्वंसकारी गतिविधियों में शामिल हो भी गए तो पूरे आज़मगढ़ को कैसे ज़िम्मेदार ठहराया जा सकता है.”

समझौता एक्सप्रेस में बम विस्फोट के बाद
विस्फोट की घटनाओं का निशाना हिंदू और मुसलमान दोनों ही होते हैं

प्रवीण स्वामी कहते है, “वर्ष 2002 में गुजरात में हुए सांप्रदायिक दंगों के के लिए कुछ हिंदुओं को ज़िम्मेदार ठहराया था लेकिन इस आधार पर यह तो नहीं कहा जा सकता कि सारे गुजराती हिंदू सांप्रदायिक ही होते हैं.”

पुलिस और गुप्तचर एजेंसियों की बात मानें तो हाल के वर्षों में जो बम विस्फोट विस्फोट की घटनाएँ हुई हैं उनमें गिरफ़्तार होने वाले ज़्यादातर लोग मुसलमान हैं. इससे एक अनकहा संदेश समाज में ये भी जाता है कि जो भी चरमपंथी घटनाएँ होती हैं उनमें मुसलमानों का ही हाथ होता है. क्या राजनीतिक नेतृत्व की ज़िम्मेदारी इस ख़तरनाक मानसिकता को बढ़ने से रोकने की नहीं है. क्या सरकार की ज़िम्मेदारी नहीं बनती कि समस्या की जड़ को समझने की कोशिश करे और उसी के अनुसार कोई ऐसा रास्ता निकाला जाए जिससे समाज को बँटने से रोका जा सके.

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