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जीने का अधिकार कितना सुरक्षित?-2 | |||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||
प्रेस और मीडिया को लोकतंत्र का चौथा स्तंभ कहा जाता है कि क्योंकि उससे आम नागरिकों और लोकतांत्रिक संस्थाओं के समर्थन में आवाज़ उठाने की उम्मीद की जाती है मगर क्या मीडिया आज अपनी भूमिका ज़िम्मेदार तरीके से निभाता है? राजनीतिक विश्लेषक और वरिष्ठ पत्रकार कुलदीप नैयर कहते हैं कि मीडिया ज़िम्मेदारी नहीं रह गया है, यही सबसे बड़ी मुश्किल नज़र आती है. "ऐसा लगता है कि कुछ मीडिया संगठन या पत्रकार किसी विशेष राजनीतिक दल के प्रति सहानुभूति रखते हैं जो बहुत चिंताजनक है. मीडिया में भी, टेलीविज़न वर्ग बहुत जल्दबाज़ी में नज़र आते हैं. वे एक ही ख़बर को बार-बार उधर-उधर से पीटते रहते हैं क्योंकि वे लोगों का ध्यान अपनी ओर खींचना चाहते हैं. पानी को जितनी बार भी मथ लें, वो रहेगा तो पानी ही, उससे निकलेगा तो कुछ नहीं. इसलिए मीडिया अक्सर कुछ मामलों में ज़रूरत से ज़्यादा तूल देता है." लंदन में जुलाई 2005 में पुलिस ने एक ब्राज़ीली नागरिक को आतंकवादी होने के शक में मार दिया था. उस मामले को नागरिक के अधिकारों के लिए बहुत महत्वपूर्ण माना गया. उस मामले की अब भी जाँच चल रही है और लंदन पुलिस को मृतक नागरिक के परिवार को न सिर्फ़ भारी मुआवज़ा देना पड़ा है बल्कि तीखे सवालों का जवाब भी देना पड़ा है. ब्रिटेन के स्वतंत्र पुलिस शिकायत आयोग यानी IPCC ने इस मामले को बड़ी गंभीरता से लिया है और मैट्रोपोलिटन पुलिस के प्रमुख सर इयन ब्लेयर को इस मामले पर उठे विवादों की वजह से ही हाल ही में अपने पद से इस्तीफ़ा देने की घोषणा करनी पड़ी है. चुनौतियाँ तो हैं मगर... मानवाधिकार कार्यकर्ताओं का कहना रहा है कि सरकार और पुलिस के सामने कितनी भी चुनौतियाँ हों, आधुनिक युग में नागरिकों का जीने का अधिकार नहीं छीना जा सकता. तो ऐसे हालात में नागरिक के अधिकारों की गारंटी कौन सुनिश्चित करेगा. वैसे तो यह ज़िम्मेदारी सरकार और न्यायपालिका की है जिसके लिए कुछ संस्थाएँ बनाई जाती हैं.
राजनीतिक विश्लेषक और पत्रकार कुलदीप नैयर कहते हैं कि इस तरह की संस्थाओं को ज़्यादा कारगर बनाना होगा और नागरिकों को ख़ुद भी आगे आना होगा, "सरकारी व्यवस्था और पुलिस पर लोगों का भरोसा बहुत कम हो गया है. मैं एक घटना का संदर्भ देना चाहता हूँ. कुछ वर्ष पहले दिल्ली के अंसल प्लाज़ा में एक पुलिस मुठभेड़ में दो लोग मारे गए थे. मैंने उसकी शिकायत राष्ट्रीय मानवाधिकार आयोग से की और उसने छह महीने बाद मुझे सूचना भेजी की पुलिस का कहना है कि उस मामले में कुछ ख़ास नहीं था और मारे गए लोग आतंकवादी ही थे." कुलदीप नैयर सवाल उठाते हैं कि अगर पुलिस की बात को ही सच मानना है तो फिर सच्चाई कहाँ से सामने आएगी? इसलिए कोई ऐसी संघीय एजेंसी बननी चाहिए जो संदेह वाले मामलों की निष्पक्ष जाँच कर सके और सच्चाई को सामने ला सके." मानवाधिकार कार्यकर्ता इस मामले में ब्रिटेन का भी हवाला देते हैं जहाँ एक स्वतंत्र पुलिस शिकायत आयोग है. कोई भी आम आदमी पुलिस के ख़िलाफ़ इस आयोग में शिकायत कर सकता है और यह आयोग निष्पक्ष तरीके से मामले की जाँच करता है. इस आयोग के पास ख़ासे अधिकार हैं इसलिए पुलिस को इसकी परवाह करनी पड़ती है. राजनीतिक नेतृत्व की नाकामी लेकिन पुलिस के सामने इतनी सारी चुनौतियाँ हैं और उसका कहना है कि वह अपनी जान हथेली पर रखकर अपनी ड्यूटी निभाती है तो फिर पुलिस पर भरोसा क्यों नहीं किया जाता है? भारत के एक पत्रकार और सुरक्षा और गुप्तचर मामलों पर नज़र रखने वाले प्रवीण स्वामी कहते हैं कि पुलिस से राजनीतिक समस्याओं का हल निकाल देने की उम्मीद करना ही बेमानी है, "भारतीय समाज में पिछले दस-पंद्रह वर्षों में एक आपसी शक का माहौल बढ़ रहा है जो पुलिस समस्या है ही नहीं. यह एक राजनीतिक समस्या है और इसका हल सरकार और राजनीतिक नेतृत्व को निकालना होगा."
प्रवीण स्वामी कहते हैं, "वास्तविकता ये है कि भारत के बहुत से मुसलमान ख़ुद को भेदभाव का शिकार मानते हैं और पिछले लगभग दो दशकों के दौरान व्यवस्था, सरकार और पुलिस का बर्ताव उनके साथ अच्छा नहीं रहा है. दूसरी तरफ़ बहुत से हिंदू यह समझते हैं कि सरकार और व्यवस्था मुसलमानों का तुष्टिकरण करती है और आतंकवाद का सख़्ती से मुक़ाबला नहीं किया जा रहा है. इसलिए इन दोनों समुदायों में आपसी संदेह की भावना ज़ोर पकड़ती जा रही है और राजनीतिक नेतृत्व इस चुनौती का मुक़ाबला करने में नाकाम रहा है. इतना ही नहीं, इस समस्या का राजनीतिक फ़ायदा उठाने की कोशिशें की जा रही हैं. एक सामाजिक और राजनीतिक समस्या का हल पुलिस या गुप्तचर एजेंसियों से निकालने की उम्मीद करना वास्तविकता के धरातल पर सही नहीं है." जानकारों का कहना है कि इसमें कोई शक नहीं है कि पुलिस और सुरक्षा बलों के सामने बहुत सी चुनौतियाँ होती हैं मगर ऐसा तो हर किसी के साथ है. मसलन, जिसे जो भी काम सौंपा गया है, उसे कर्तव्यनिष्ठा के साथ अंजाम देना उनकी ड्यूटी होती है. तो फिर वर्दी पहनने वाले से अपनी ड्यूटी में कोताही बरतने की उम्मीद कैसे की जा सकती है, "पुलिस को पारदर्शिता तो रखनी ही होगी. लोकतंत्र में पारदर्शिता क़ानूनी और न्यायिक व्यवस्था का अभिन्न हिस्सा है. लेकिन समस्या यही है कि पुलिस पारदर्शिता की परवाह नहीं करती है इसीलिए उसकी छवि के बारे में आम लोगों में संदेह पैदा होते हैं और राजसत्ता को पुलिस की हिमायत के लिए आगे आना होता है." इतिहास बताता है कि अपने अधिकारों के लिए व्यक्ति ने सदियों पहले जो संघर्ष शुरू किया, उसके परिणाम आहिस्ता-आहिस्ता नज़र आए हैं. आधुनिक युग में उन अधिकारों की गारंटी की हिमायत व्यापक रूप में की जाती है. इसलिए उन अधिकारों को हासिल करने के लिए आम नागरिक को झिझक किस बात की? जैसाकि कुलदीप नैयर कहते हैं कि अधिकारों की रक्षा के लिए एकजुट आंदोलन चलाना होगा, "अब आम नागरिकों में यह जागरूकता बन रही है कि हमें अपने अधिकारों की रक्षा के लिए आगे आना होगा और समाज में फैल रहे संदेह के माहौल का एकजुट होकर मुक़ाबला करना होगा. " बहरहाल, यह चर्चा सदियों से चल रही है और आगे भी जारी रहेगी. दूसरे विश्व युद्ध के बाद व्यक्ति के अधिकारों की हिफ़ाज़त में तब एक नया मोड़ आया जब संयुक्त राष्ट्र की निगरानी में मानवाधिकारों के सार्वभौमिक घोषणा-पत्र पर सहमति हुई, यह अलग बात है कि अनेक देशों में अब भी व्यक्ति को अपने अधिकारों के लिए लड़ना पड़ता है जबकि इसमें कोई दो राय नहीं हैं कि नागरिकों के अधिकारों की हिफ़ाज़त करना हर सरकार का कर्तव्य है. आप अपनी राय इस ईमेल पर भी भेज सकते हैं -- |
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