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पैर पसारता सांप्रदायिक 'आतंकवाद'-2 | ||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||
सांप्रदायिकता के ख़िलाफ़ सामाजिक आंदोलन चलाने वाले और कम्यूनलिज़्म कॉम्बैट पत्रिका के संपादक जावेद आनंद कहते हैं, “1984 से लेकर वर्ष 2002 तक देश में कम से कम चार ऐसे क़त्लेआम हुए हैं जिन्हें संयुक्त राष्ट्र की परिभाषा के अनुसार नरसंहार की श्रेणी में रखा जा सकता है. इनमें 1984 में सिख विरोधी दंगे, 1987 में बिहार के भागलपुर में, 1992-93 में मुंबई में और वर्ष 2002 में गुजरात दंगे." "इन सब घटनाओं में पुलिस सिर्फ़ तमाशाई बनी रही और दोषियों के ख़िलाफ़ ठोस कार्रवाई नहीं हुई. अनेक विश्लेषक और बुद्धिजीवी पिछले अनेक वर्षों से यह कहते रहे हैं कि सरकार अगर लोगों के जान-माल की सुरक्षा नहीं कर सकती है तो लोगों में चरमपंथी विचार पैदा होने से रोकना मुश्किल होगा.” जस्टिस जगदीश शरण वर्मा कहते हैं कि इसके लिए राजनीतिक स्वार्थ ज़्यादा ज़िम्मेदार हैं यह एक ख़तरनाक प्रवृत्ति है जिसे रोकना होगा, “मेरी समझ में राजनीतिक नेतृत्व ही सबसे ज़्यादा ज़िम्मेदार है. जब भी कोई घटना होती है तो उन सबका ध्यान सिर्फ़ वोट की राजनीति पर होता है. अगर वोट की राजनीति ना हो तो, बहुत सारी घटनाएँ हो ही नहीं. मुझे सबसे बड़ा अफ़सोस यही है कि जिनके हाथ में क़ानून को लागू करने की ज़िम्मेदारी है, वो ऐसी कोई घटना होने क्यों देते हैं और अगर कोई घटना हो जाती है तो जो गुनहगार हैं उन्हें पकड़कर सख़्ती से सज़ा क्यों नहीं दिलवाते हैं.” पर्यवेक्षकों का कहना है कि सांप्रदायिकता ने अब 'आतंकवाद' का रूप धारण कर लिया है. अनेक राज्यों की पुलिस ने हाल के समय में हुए बम धमाकों के सिलसिले में जिन लोगों को गिरफ़्तार किया है उनमें मुसलमान भी हैं और हिंदू भी. यानी जो लोग आतंकवादी घटनाओं को इस्लामी जेहाद और अंतरराष्ट्रीय आतंकवाद से जोड़कर देखते थे, उन्हें विश्लेषण का एक और मुद्दा मिल गया है. जैसाकि केएस ढिल्लों कहते हैं, “किसी भी अदालत में किसी मुस्लिम संगठन को आतंकवादी घटनाओं के लिए दोषी नहीं क़रार दिया गया है लेकिन दुष्प्रचार की वजह से एक आम राय सी बन गई है कि जो भी चरमपंथी घटनाएँ होती हैं, लोग यही समझ लेते हैं कि उनमें मुसलमानों का हाथ होता है."
"एक धारणा सी बन गई है कि लोग आतंकवाद को सिर्फ़ इस्लामी जेहाद से जोड़कर देखने लगे हैं, जब उनसे कहा जाता है कि नक्सली या माओवादी विद्रोहियों की गतिविधियों को क्या कहेंगे, या पूर्वोत्तर भारत के राज्यों में जो हो रहा, देश से बाहर श्रीलंका में तमिल टाइगर यानी एलटीटीटी जो कर रहा है वो भी तो एक तरह से आतंकवाद ही है, तो लोगों को उनका ध्यान नहीं आता है.” अनेक मुसलमानों से बात करें उनकी शिकायत है कि चूँकि भारत सरकार और राजनीतिक नेतृत्व हिंदू चरमपंथी गतिविधियों को रोकने के लिए सख़्त कार्रवाई नहीं करते इसलिए हो सकता है कि कुछ मुसलमान चरमपंथ का रास्ता अपनाते हों. 'बढ़ता चरमपंथ' जावेद आनंद विभिन्न गुप्तचर सूचनाओं के आधार पर अपनी जानकारी रखते हैं, “किसी आतंकवादी गतिविधि में कोई मुसलमान शामिल रहा है या नहीं, इसका फ़ैसला तो अदालत ही कर सकती है क्योंकि यह तो जाँच-पड़ताल और न्याय व्यवस्था का काम है. मगर पिछले 15-20 वर्षों में जो सांप्रदायिक ध्रुवीकरण हुआ है उसकी वजह से इतना ज़रूर वास्तविक नज़र आता है कि मुसलमानों का एक छोटा सा तबका चरमपंथी गतिविधियों की तरफ़ झुकाव रखने लगा है. और ऐसा सिर्फ़ मुसलमानों में ही नहीं, हिंदुओं में भी हुआ है. हिंदू समाज का एक तबका विश्व हिंदू परिषद और बजरंग दल जैसे संगठनों पर जाकर रुका है तो मुसलमानों में भी सीमी जैसे संगठन हैं जो इस्लामी जेहाद और शहादत की बात करते हैं.”
अगर हम इस बहस को सीमित करते हुए यह कहें कि दरअसल यह कोई 'आतंकवाद' नहीं बल्कि क़ानून और व्यवस्था का एक मामला है तो शायद कुछ ग़लत नहीं होगा क्योंकि अनेक जानकारों का मानना है कि हर समस्या की कोई ना कोई जड़ होती है और उसमें हिंदू- मुसलमान या ईसाई रंग ढूंढना ग़लत है. चुनौती बड़ी है राजनीतिक विश्लेषक और पत्रकार कुलदीप नैयर कहते हैं कि असल समस्या ये है कि हिंदू और मुसलमानों में कुछ लोग चरमपंथी रुख़ अपना रहे हैं जिससे समाज के बँटने का ख़तरा पैदा हो जाता है, “पहले तो सिर्फ़ इस्लामी चरमपंथ की ही बात होती थी लेकिन अब तो हिंदुओं में भी तालेबान पैदा हो गए हैं तो इन्हें भी तो देखना चाहिए. लेकिन बेहद अफ़सोस की बात ये है कि आतंकवाद की चुनौती का समझदारी से मुक़ाबला करने के बारे में राजनीतिक नेतृत्व में कोई गंभीरता नज़र नहीं आती है. पार्टियाँ इस मुद्दे पर सिर्फ़ राजनीतिक लाभ उठाना चाहती हैं. आगामी चुनावों को देखते हुए यह प्रवृत्ति और बढ़ती नज़र आ रही है.” समाज को अस्थिर होने से रोकने की प्रमुख जि़म्मेदारी तो राजनीतिक नेतृ्त्व, बुद्धिजीवी वर्ग और सरकार की है लेकिन आम नागरिक भी अपनी ज़िम्मेदारी से बच नहीं सकते. अनेक बुद्धिजीवी मानते हैं कि भारत में राजनीतिक स्वार्थों की वजह से ही अक्सर इस तरह की गंभीर समस्याएँ खड़ी होती हैं जिनके दूरगामी और विघटनकारी परिणाम होते हैं. जड़ कहाँ है? जस्टिस जेएस वर्मा कहते हैं, “यह मैं बहुत समय से कहता आया हूँ कि देखिए, समस्या की जड़ में जाने की कोशिश कीजिए. अभी आप क्या कर रहे हैं कि आप किसी को भी आतंकवादी कहकर सिर्फ़ गोली मार देना चाहते हैं. आतंकवाद है क्यों इसकी वजह तो जानने की कोशिश कीजिए. राजनीतिक, आर्थिक या सामाजिक कारण हैं, पहले उनका पता तो लगाइए. आप उन कारणों को जब तक दूर नहीं करेंगे, समस्या हल नहीं होगी. यह तो वैसे ही है कि अगर किसी आदमी को बुख़ार आ रहा है तो आप बुख़ार का इलाज तो करने लगे हैं, लेकिन बुख़ार किन कारणों से आ रहा है उसका पता लगाने की कोई इच्छा नज़र नहीं आती, तो बुख़ार आज ख़त्म हो जाएगा तो कल फिर आ जाएगा.”
जस्टिस वर्मा कहते हैं, “आप किसी एक आतंकवादी को मारते हैं तो उसके बाद अनेक पैदा हो जाते हैं और उस धोखे में आप अक्सर बेक़सूर लोगों को भी मार देते हैं. पंजाब में चरमपंथी गतिविधियों के दौरान ऐसा ही हुआ जिनका अब पता चल रहा है कि हज़ारों निर्दोष लोगों को मार दिया गया था.” लेकिन बड़ा सवाल ये है कि क्या देश की मौजूदा क़ानून लागू करने वाली एजेंसियों और न्यायिक व्यवस्था चुनौती का मुक़ाबला करने में सक्षम हैं. क्या सिस्टम में ही कुछ ख़ामियाँ भी तो पैदा नहीं हो गई हैं. सिस्टम कितना कारगर? कुलदीप नैयर कहते हैं, “उड़ीसा में हाल के दिनों हिंदुओं और ईसाइयों के बीच हिंसा के दौरान ऐसे आरोप लगाए गए कि पुलिस खड़ी होकर तमाशा देखती रही. वर्ष 2002 में गुजरात में पुलिस की बड़ी नाकामी साबित हुई. तो ऐसा लगता है कि पुलिस में भी कुछ तत्व दूषित हो गए हैं.” केएस ढिल्लों कहते हैं, “सिस्टम बहुत बोसीदा हो गया है जिसे कारगर बनाने की बेहद ज़रूरत है. पुलिस विभाग में सिर्फ़ पैसा बहाने से कुछ नहीं होगा, बल्कि इसकी पूरी संस्कृति और सोच को बदलना होगा. एक तरह से पूरा पुलिस सिस्टम बदलना होगा.” इसमें कोई शक नहीं कि सभी नागरिकों को बिना किसी डर के अपना जीवन जीने का अधिकार है और देश में होने वाली विध्वंसक घटनाओं से शांतिप्रिय लोगों की यह ज़रूरत पूरी नहीं होती है. एक तरफ़ तो शिक्षा बढ़ रही है और देश-दुनिया हर क्षेत्र में प्रगति कर रही है, मगर दूसरी तरफ़ ऐसा भी नज़र आता है जैसे कि समाज में मानसिकता भी संकुचित तो नहीं हो रही है. सिकुड़ती जगह? कुलदीप नैयर कहते हैं, “एक वजह तो यही नज़र आती है कि कुछ लोगों का यह भरोसा उठ रहा है कि उनका पहले समाज में जो स्थान था वो अब कम होता जा रहा है. उन्हें शायद लग रहा है कि पहले उनकी अपनी जगह थी जिसे अब छीना जा रहा है. ऐसे में व्यक्ति हताश भी हो सकता है. भारत में असल में सेंटर में व्यक्ति का जो स्थान होता था, जिसे हम बीच की जगह कहते हैं, हाल के दिनों में ऐसा लग रहा है कि यह स्थान कुछ सिकुड़ता जा रहा है. राजनीतिक दलों ने हमला कर – करके उस स्थान को और कम कर दिया है. दरअसल इस बीच की जगह को बड़ा करने की बेहद ज़रूरत है.” बँटवारा हुए तो साठ साल से ज़्यादा गुज़र चुके हैं और एक नई सदी भी अपना सफ़र शुरू कर चुकी है. पर्यवेक्षकों का कहना है कि अब आतंकवाद का रूप ले चुकी सांप्रदायिकता के दानव से छुटकारा पाने के लिए शतुर्मुर्ग की तरह रेत में मुँह छुपाने से कुछ हासिल नहीं होगा बल्कि राजनीतिक ईमानदारी नज़र आनी चाहिए. जस्टिस जे एस वर्मा कहते हैं, “मैं ये कहता हूँ कि किसी भी इंसान को अन्याय से पीड़ित होने की भावना से ग्रसित नहीं होने देना चाहिए, यही क़ानून के शासन की सही भावना है. ये कौन कहता है कि किसी भी समुदाय के सभी लोग एक जैसे होते हैं. सारे इंसान अलग-अलग हैं, हर एक की फ़ितरत अलग-अलग है. लेकिन आज की राजनीति यही सोचती है कि किससे क्या फ़ायदा हो सकता है, बस हर आदमी अपनी-अपनी रोटी सेंकना चाहता है. हर राजनीतिक दल वोट की राजनीति खेल रहा है. इसलिए अगर समाज का कोई भी तबका ये महसूस करे कि उसके साथ अन्याय हो रहा है तो यह सरकार और व्यवस्था की एक बहुत बड़ी नाकामी है. और यह बिल्कुल भी नहीं होने देना चाहिए क्योंकि ऐसी स्थिति में ध्रुवीकरण और बढ़ता है.” कुलदीप नैयर कहते हैं कि समस्या गंभीर तो है लेकिन सबसे अहम बात ये है कि आम नागरिकों को अपनी ज़िम्मेदारी समझनी होगी. अब सिर्फ़ राजनीतिक नेतृत्व और सरकार के भरोसे हाथ पर हाथ रखकर नहीं बैठा जा सकता क्योंकि लोकतंत्र की सबसे बड़ी ख़ासियत यही है कि अंततः आम नागरिक की राय ही वज़न रखती है. “तसल्ली की बात ये है कि लोग चुप नहीं बैठे हैं और उनमें कुछ हलचल ज़रूर देखने को मिल रही है. हाँ, इतना ज़रूर है कि इस हलचल ने अभी कोई ठोस आकार नहीं लिया है. मगर इसमें कोई शक नहीं है कि भारत देश की आत्मा धर्मनिर्पेक्ष है जो अब भी मज़बूत है, अलबत्ता चंद लोग हैं जो इसे बिगाड़ने की कोशिश कर रहे हैं.” भारत में जल्दी ही चुनाव होने वाले हैं और मतदाताओं को एक बार फिर अपने वोट का वज़न आँकने का अवसर मिलेगा. पर्यवेक्षकों का विचार है कि चुनावों में एक सरकार जाती है तो कोई दूसरी आती है मगर मतदाता की जागरूकता बेहद ज़रूरी है ताकि राजनीतिक दल अपने नीहित स्वार्थ के लिए उनकी अहमियत को हल्का करके ना आँक लें. समाज में दरार पैदा होने से रोकनी की सबसे बड़ी ज़िम्मेदारी ख़ुद आम नागरिकों पर ही है. आप अपनी राय इस पते पर भेज सकते हैं... |
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