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विकास हमारा मुद्दा है: सुशील मोदी | ||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||
बिहार के उपमुख्यमंत्री और भारतीय जनता पार्टी के नेता सुशील कुमार मोदी से लोक सभा चुनावों पर हुई बातचीत के अंश. इस बार भारतीय जनता पार्टी और जनता दल यूनाइटेड गठबंधन किन मुद्दों के साथ चुनावी मैदान में जा रही है? मुख्य रूप से हम लोग विकास के मुद्दे पर जनता के बीच जा रहे हैं. हमारी सरकार की तीन साल की उपलब्धियों और क़ानून व्यवस्था में आने वाले सुधार को लेकर हम जनता के बीच जा रहे हैं. दूसरी बात जो हम लोग कह रहे हैं कि अगर केंद्र में भाजपा गठबंधन की सरकार बन जाती है तो राज्य के साथ जो भेदभाव अपनाया जा रहा है वो ख़त्म हो जाएगा और बिहार और तेज़ी से विकास करेगा. कल हमारी बात केंद्रीय ग्रामीण विकास मंत्री रघुवंश प्रसाद से हुई, उनका ये दावा है कि नीतीश कुमार के दौर में जो विकास हो रहा है और सड़कों के रूप में जो नज़र आ रहा है, वह केंद्र के 16 हज़ार करोड़ रुपए के बल पर हैं जो उन्होंने मिलकर केंद्र से स्वीकृत कराए थे. इसके बारे में आपका क्या कहना है? देखिए, रघुवंश बाबू आप को गुमराह कर रहे हैं. कोई भी अतिरिक्त राशि हमें केंद्र से प्राप्त नहीं हुई है. ये वित्त आयोग तय करता है कि किस राज्य को कितना पैसा मिलेगा और वित्त आयोग की बात मानना केंद्र की बाध्यता है. जो भी पैसा हमें मिल रहा है वो 12वें वित्त आयोग अनुशंसा के अंतर्गत हमें मिल रहा है. उसके अतिरिक्त एक पैसा इन लोगों ने नहीं दिया है. जो इंदिरा विकास योजना आदि है, इसका ये तरीक़ा है कि जब आप ख़र्च कर लेंगे तो फिर अगली बार के लिए आप दावा पेश कर सकते हैं. ये लोग अपनी सरकार के दौरान ये पैसा ख़र्च नहीं कर पाते थे इसलिए दावा भी पेश नहीं कर पाते थे. हम लोगों ने इंदिरा आवास और सर्वशिक्षा योजनाओं में जितना ख़र्च किया है, उतना किसी ने नहीं किया है. रघुवंश बाबू बताएं कि यूपीए सरकार ने बिहार के लिए जो पैकेज की घोषणा की थी, आज पांच साल बीतने के बाद वो बताएं कि वह कहां है. पैकेज के बारे में उनका कहना है कि राज्य सरकार डीपीआर देने में विफल रही है? पहले तो पैकेज की घोषणा होती है फिर डीपीआर की आवश्यक्ता होती है, यहां तो ऐसी स्थिति ही नहीं आई. कोसी बाढ़ के मामले हम लोगों ने मकान बनाने के लिए 14 हज़ार करोड़ रुपए की मांग की थी. केंद्रीय टीम भी आई थी. आज आठ महीना बीत चुका है लेकिन एक भी पैसा नहीं आया. हम लोगों ने साढ़े तीन लाख घर बनवाने की बात की. शुरू में मनमोहन सिंह की सरकार ने जो एक हज़ार करोड़ रुपए दिए, उसके बाद से एक पैसा नहीं दिया. चुनाव से पहले जद-यू के साथ सीटों को लेकर जो कुछ हुआ उसमें आपको किशनगंज की एक सीट गंवानी पड़ी, इससे ये समझा जाए कि राज्य में भाजपा कमज़ोर पड़ रही है या चुनाव जीतने वाले उम्मीदवारों का मामला है? ये जीतने हारने वाले उम्मीदवारों का नहीं बल्कि बस दो दलों का मामला है. पिछले बार हमारे पास 15 सीटें थीं, इसबार हमने एक ज़्यादा सीट ली फिर वह अतिरिक्त सीट हमने दे दी. गठबंधन में सीट लेने देने के कई कारण हो सकते हैं. एक सीट के घटने बढ़ने से कोई गठबंधन तो नहीं तोड़ता. आप क्या चाहते हैं कि जो यूपीए ने किया वही हम करते. क्या आप ये समझते हैं कि आप का गंठबंधन अटूट है और चुनाव के बाद भी क़ायम रहेगा? ख़ासकर नीतीश कुमार के उस बयान के हवाले से कि 'कल को कोई नहीं जानता' जिसे काफ़ी उदृत किया गया और धर्मनिरपेक्ष ताक़त के नाम पर कांग्रेस के नेताओं ने भी संपर्क किया है? नीतीश कुमार ने ऐसा कोई बयान नहीं दिया है. स्वंय नीतीश कुमार ने खंडन किया है कि एक टीवी चैनल ने उनकी बातों को तोड़मरोड़ कर पेश किया है. हम लोगों का गठबंधन 1996 से है और हम लोग पाँच लोक सभा और तीन विधानसभा चुनाव मिल कर लड़ चुके हैं. यहां मिली जुली सरकार है जो 55 विधायकों के बलबूते चल रही है लेकिन दूर दूर तक इस गठबंधन के टूटने की मुझे कोई संभावना दिखाई नहीं देती है.
चूंकि यूपीए का गठबंधन टूट गया इसलिए वे लोग भ्रम पैदा करने का प्रयास करते हैं. अभी नीतीश जी आडवाणी जी के मंच पर गए और दोनों ने एक दूसरे की जिन शब्दों में प्रशंसा की उससे ऐसा नहीं लगता. यहां भाजपा-जदयू की सरकार चल रही है और कोई गठबंधन से बाहर जाएगा तो सरकार ही गिर जाएगी. तो ऐसा नहीं हो सकता है. वरुण गांधी पर नीतीश कुमार का रुख़ और ख़ास तौर से नरेंद्र मोदी के बारे में उनका ये कहना कि उन्हें बिहार में चुनाव प्रचार के लिए आने की कोई ज़रूरत नहीं है, यहां भाजपा के सक्षम नेता हैं तो क्या उन्हें नरेंद्र मोदी के बिहार में आने से कोई परहेज़ है? देखिए नरेंद्र मोदी के मुद्दे पर कोई मतभेद नहीं है. भाजपा किसको बुलाएगी यह भाजपा को तय करना है. नरेंद्र मोदी इतने व्यस्त हैं कि आज भी देश के सभी राज्यों में नहीं जा सके हैं, यहां पर हम लोग स्वंय सक्षम हैं. जहां उनकी ज़्यादा ज़रूरत है उनका उपयोग अन्य राज्यों में हो. सुषमा जी, मुरली मनोहर जोशी, वेंकैया नायडू जी नहीं आए हैं. जहां तक वरूण का मामला है तो दोनों अलग अलग दल हैं. किसी मुद्दे पर उनका अपना विचार हो सकता है उनकी अलग नीति हो सकती है, राम जन्मभूमि पर उनकी अलग सोच है. और एक ही सोच होती तो दो अलग अलग दल होने की आवश्यक्ता क्या थी. शासन के मामले में हम लोग एक हैं. बिहार की विपक्षी पार्टी राष्ट्रीय जनता दल और लोक जनशक्ति पार्टी का एक साथ मिलकर और कांग्रेस का अपने बल पर अलग चुनाव लड़ने से भाजपा-जदयू गठबंधन पर कितना असर पड़ेगा? निश्चित रूप से इसका लाभ मिलेगा. चुनाव से पहले यूपीए बिखर गया और आज सोनिया जी लालू जी के 15 साल के काल को काला अध्याय के तौर पर बयान कर रही हैं, लालू यादव उसका जवाब दे रहे हैं कि उनको जो भाषण लिख कर दिया गया, वे उसी को पढ़ रही हैं तो इससे अच्छी स्थिति हमारे लिए और क्या होगी कि हमारे विरोधी आपस में एकजुट नहीं हैं और एक दूसरे को हराने में लगे हैं. सोनिया गांधी, लालू प्रसाद और रामविलास जी का ख़ास तौर से अल्पसंख्यकों को ये कहना कि अगर आप जदयू-भाजपा को वोट करते हैं तो आप आडवाणी को प्रधानमंत्री बनाने के लिए वोट कर रहे हैं ऐसे में आप अल्पसंख्यकों को कैसे समझा पाएंगे? जब अटल जी प्रधानमंत्री थे तो आडवाणी जी उपप्रधानमंत्री थे और अटल जी छह वर्षों तक इस देश के प्रधानमंत्री रहे फिर भी लोगों ने उनको वोट दिया और अल्पसंख्यक समुदाय के लोगों ने वोट दिया है. वे चुनाव के ज़माने में ऐसे मुद्दे उठाते हैं उनके पास विकास का मुद्दा नहीं है. यहाँ पर मुसलमानों के दिल में भाजपा से कोई डर भय नहीं है इसलिए उनका सारा प्रयास विफल हो जाएगा. इस बार चुनाव से पहले दल बदल के कई उदाहरण सामने आए उनको टिकट देने से कहीं कार्यकर्ता ठगा सा महसूस नहीं करते कि दूसरी पार्टी से कोई आया और वह लाभ ले गया और उनकी बरसों की मेहनत का उन्हें कोई लाभ नहीं हुआ? हां, ये बात सही है कि कार्यकर्ता ऐसा महसूस करता है. यहां बात ये है कि कोई अच्छा कार्यकर्ता है उसमें चुनाव जीतने की क्षमता है या नहीं ये अलग विषय है लेकिन कांग्रेस ने जो थोक भाव से उम्मीदवारों का आयात किया है, वह स्वस्थ राजनीत का लक्षण नहीं है और कांग्रेस को उसका खामियाज़ा भुगतना पड़ेगा. पिछले चुनाव में ये देखा जाता रहा है और हर दल ये दावा करते रहे हैं कि टिकटों के बंटवारे में समाज के हर वर्ग का ख़्याल रखा जाता है. कहा जाता है कि आपकी सहयोगी पार्टी ने एक भी ब्राह्मण को टिकट नहीं दिया जिससे उस वर्ग में ख़ासी नाराज़गी है, आपका क्या कहना है? इस देश में इतनी जातियाँ हैं कि कोई भी दल सभी जाति को टिकट नहीं दे सकता है. हम लोग भी चाह कर सभी जातियों को टिकट नहीं दे पाए. लेकिन जो गठबंधन है उसमें लगभग सभी महत्पूर्ण जातियों को टिकट दिया गया है. जिन जातियों को जदयू टिकट नहीं दे पाया उसे भाजपा ने टिकट दे दिया और जिसे भाजपा टिकट नहीं दे पाई उसे जदयू ने दे दिया. कुल मिला कर गठबंधन चुनाव लड़ रहा है, गठबंधन के नेता मिल कर दौरा कर रहे हैं. जिनको टिकट नहीं मिला उनमें नाराज़गी हो सकती है लेकिन मैं ने ऐसा महसूस नहीं किया कि पूरी की पूरी जाति में कहीं नाराज़गी हो. बिहार की 40 सीटों की केंद्र में बड़ी भूमिका होगी आपके गठबंधन को कितनी सीट की उम्मीद है? मुझे तो उम्मीद है कि हम चालीस की चालीस लोक सभा सीट जीतेंगे, दो चार कम हो सकती है. लेकिन हम स्वीप करेंगे क्योंकि एनडीए गठबंधन के पक्ष में बिहार में एक आंधी चल रही है. |
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