|
रोज़गार की ‘गारंटी’ नहीं | ||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||
...हमारा कार्ड देखिए, काम किए नहीं और पैसा उठ गया. मंत्री जी आए तो हमने उनसे मुखिया की करतूतों के बारे में बताया. वो बोले देख लेंगे लेकिन हुआ कुछ नहीं. विकलांग आदमी है साहब, एक ही बेटा है काम मिलता तो कुछ होता... अपनी पीड़ा बयाँ कर रहा यह व्यक्ति केंद्रीय ग्रामीण विकास मंत्री रघुवंश प्रसाद सिंह के गाँव का है और उनकी बातें राष्ट्रीय रोज़गार गारंटी योजना की दुर्दशा की ओर इशारा कर रही थी. और ये सिर्फ़ एक व्यक्ति की कहानी नहीं है. रोज़गार गारंटी योजना को संयुक्त प्रगतिशील गठबंधन सरकार (यूपीए) बतौर अपनी बड़ी सफलता बताकर लोकसभा चुनावों में जनता से वोट माँग रही है. केंद्रीय ग्रामीण विकास मंत्रालय ने इस कल्याणकारी योजना को ज़मीन पर उतारने में अहम भूमिका अदा की लेकिन ख़ुद इस विभाग के मुखिया रघुवंश प्रसाद सिंह के क्षेत्र में इस योजना का लाभ ग़रीब परिवारों को पूरी तरह नहीं मिल पा रहा है. हालाँकि ग्रामीण विकास मंत्री इस योजना की दुर्दशा के लिए राज्य सरकार को ज़िम्मेदार बताते हैं. बिहार में नरेगा और पीला कार्ड के नाम से चर्चित इस योजना का जायज़ा लेने हम ख़ुद रघुवंश प्रसाद सिंह के गाँव और उनके लोकसभा क्षेत्र पहुँचे. रघुवंश प्रसाद सिंह बिहार के वैशाली लोकसभा क्षेत्र से राष्ट्रीय जनता दल (राजद) के टिकट पर चुनाव मैदान में हैं जहाँ 23 अप्रैल को मतदान होना है. विफल योजना, निराश लोग मंत्री जी के गाँव शाहपुर के महेशर पासवान कहते हैं,'' काम मिला है दस पंद्रह दिन. काम ही नहीं रहता है.''
बिंदेश्वर पासवान का कहना है,'' देखिए अपने काम से फ़ुरसत नहीं रहता है. ठेकेदार अपने हिसाब से काम पर बुलाता है. मज़दूरी भी देता है 70 रुपया. एक दिन की मज़दूरी का पता लगाए तो कहा कि 82 रूपया बनता है. लेकिन देता है सत्तर रुपया ही.'' नारायण कुमार सिंह की शिकायत कुछ और है. वो कहते हैं,'' हमारे पास भी जॉब कार्ड है. हम एक भी दिन काम नहीं किए लेकिन पैसा उठ गया. इसमें मुखिया की गड़बड़ी है या किसी और की पता नहीं.'' ग्रामीणों में इस बात को लेकर काफ़ी गुस्सा है कि उन्हीं के गाँव का व्यक्ति भारत सरकार में मंत्री है लेकिन फिर भी वो बेहाल हैं. नारायण कहते हैं,'' अगर वो यहाँ ध्यान देते तो ये हालत होती. सड़कें नहीं बनती, ग़रीबों का भला नहीं होता.'' इसी बीच एक युवक रंजन कुमार बिना काम किए उनके कार्ड पर पैसा उठा लिए जाने की शिकायत करते हैं. पास में ही खेत में गेहूँ काट रही एक महिला ज़ोर-ज़ोर से चिल्लाती हुई कहती है,'' मेरा घर देखिए. कब टूटेगा पता नहीं. ग़रीब लोग को देखने वाला कोई नहीं. विश्वास कीजिएगा कि मेरा नाम बीपीएल में नहीं है.'' गाँव वाले एक और मुद्दा उठाते हैं, रघुवंश प्रसाद सिंह के लोकसभा क्षेत्र का. ये बता दूँ कि रघुवंश प्रसाद सिंह का गाँव हाजीपुर लोकसभा क्षेत्र में आता है जबकि वो बगल की ही वैशाली सीट से चुनाव लड़ते हैं. इस पर चंदेश्वर कहते हैं,'' हमारे लिए कोई क्यों सोचेगा. मंत्री जी अपना वैशाली देखते हैं. हमसे कोई मतलब नहीं है, ये कहते हुए वो अपना जॉब कार्ड फाड़ने की बात करते हैं.'' यहाँ के कई लोगों ने बताया कि एक बार इस गाँव से मतदान के दिन खाली बक्सा जा चुका है और इस बार भी वे चुनाव बहिष्कार की योजना बना रहे हैं. पर लोकसभा क्षेत्र हाजीपुर होने के कारण सारा गुस्सा वहाँ से सांसद रामविलास पासवान पर उतारते हैं. राज्य सरकार ज़िम्मेदार हम वैशाली लोकसभा क्षेत्र के गरहा गाँव में पहुँचे जहाँ रघुवंश प्रसाद सिंह सड़क किनारे चलते हुए लोगों से उनके पक्ष में मतदान की अपील कर रहे थे.
वहीं पास में मज़दूरी कर रहे एक व्यक्ति से मैंने पूछा कि क्या उनके पास जॉब कार्ड है, तो जवाब मिला,'' है तो ज़रूर और काम भी मिलता है लेकिन इसका कोई ठीक नहीं रहता. मुखिया और सरपंच मिल कर पैसा खा जाते हैं.'' इतने में ही रघुवंश प्रसाद सिंह उसके पास भी पहुँचे और उसने काम नहीं मिलने की शिकायत कर डाली. फिर मैंने ग्रामीण विकास मंत्री से उनके गाँव का हवाला देते हुए बिहार में इस योजना की दुर्दशा के बारे में पूछा, तो जवाब मिला,'' नीतीश कुमार से इसे निरुत्साहित होकर लागू किया. जनता के साथ फरेब किया है.'' वो कहते हैं,'' अन्य राज्यों में हर जिला 100 करोड़ खर्च करता है, यहाँ 10 से 12 करोड़ में ही मामला ख़त्म. मुझे शिकायतें मिल रही है. मैंने कई बार नीतीश कुमार को पत्र लिखा लेकिन कोई जवाब नहीं मिला.'' ये कहते हुए वो आगे बढ़ जाते हैं. हाजीपुर का हाल हाजीपुर जिला मुख्यालय से जो आँकड़े मिले वो भी चौंकाने वाले हैं. पूरे ज़िले में वर्ष 2007-08 के दौरान चार लाख 45 हज़ार 629 परिवारों को जॉब कार्ड दिया गया.
इस योजना के तहत कुल 3324 छोटी-छोटी योजनाएँ थी जिनमें से 1748 पूरी की गईं और कुल 2934.6 लाख रुपए खर्च हुए. लेकिन सिर्फ़ एक लाख 22 हज़ार 317 परिवारों को रोज़गार मिल सका. मतलब लगभग साढ़े चार लाख जॉब कार्ड धारकों में से सिर्फ़ एक तिहाई इसका फ़ायदा उठा सके. |
इससे जुड़ी ख़बरें रोज़गार में भ्रष्टाचार27 मई, 2008 | भारत और पड़ोस बदहाली को चुनावी मुद्दा बनाएँगे व्यापारी 12 अप्रैल, 2009 | भारत और पड़ोस मधु कोड़ा ने अनियमितताएँ स्वीकारीं26 मई, 2008 | भारत और पड़ोस रोज़गार गारंटी योजना पूरे देश में लागू01 अप्रैल, 2008 | भारत और पड़ोस घोषणा ही नहीं, पैसा भी चाहिए01 अप्रैल, 2008 | भारत और पड़ोस रोज़गार गारंटी योजना है..पर रोज़गार नहीं30 दिसंबर, 2007 | भारत और पड़ोस | ||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||
| |||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||