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मंगलवार, 14 अप्रैल, 2009 को 06:37 GMT तक के समाचार
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बदहाली को चुनावी मुद्दा बनाएँगे व्यापारी

हीरा तराशते कारीगर
इस व्यावसाय से हज़ारों लोग काम न मिलने पर दूसरे कामों में रोगार तलाशने पर मजबूर हैं.
आपने कभी हीरों के हज़ारों सौदागरों को एक साथ एक ही जगह पर व्यापार करते देखा है? अगर आप सूरत शहर के मिनी बाज़ार गए हों तो ज़रूर देखा होगा.

मैं जब मिनी बाज़ार गया तो वहां हीरों के हज़ारों व्यापारियों को एक साथ देखा तो ज़रूर लेकिन व्यापार ठंडा पड़ा था. दर्जनों व्यापारी ग्राहकों का इंतज़ार कर रहे थे लेकिन ग्राहक दूर दूर तक कहीं नज़र नहीं आ रहे थे.

इस बाज़ार से कुछ फ़ासले पर हीरे तराशने और चमकाने का एक कारख़ाना है. वहां कभी एक हज़ार मज़दूर काम करते थे. आज सिर्फ़ 300 के क़रीब काम पर आए हैं. बाक़ी बेरोज़गार हो चुके हैं.

भीड़ भाड़ वाले इस शहर में लगभग सात लाख मज़दूर हीरों के कारोबार से जुड़े हैं. इन्हें यहाँ ‘रत्ना’ कलाकार कहा जाता है. इनमें से ढाई लाख इन दिनों बेरोज़गार हैं.

अंतरराष्ट्रीय आर्थिक संकट का असर सूरत के हीरा और कपड़ा उद्योग पर साफ़ देखने को मिलता है. यहाँ धंधा गंभीर रूप से मंदी की चपेट में है और लोगों को कोई राहत भी नहीं मिल रही है.

 इस मंदी का सब से बुरा असर मज़दूरों पर पड़ा है. हजारों मज़दूर नौकरियों से निकाल दिए गए हैं
चंद्रकांत संघवी, हीरा कंपनी मालिक

सूरत हीरे की मंडियों का गढ़ है. भारत से हीरे के निर्यात में लगभग 20 अरब डॉलर से अधिक का योगदान सूरत करता है. पश्चिमी देशों में सबसे अधिक हीरों की सप्लाई यहीं से होती है.

संघवी एक्सपोर्ट इंटरनेशनल सूरत में हीरों के निर्यात की सबसे बड़ी कंपनियों में से एक है और इसके कारख़ानों में तीन हज़ार मज़दूर काम करते हैं. इस कंपनी के मालिक चंद्रकांत संघवी कहते हैं, "इस मंदी का सब से बुरा असर मज़दूरों पर पड़ा है. हजारों मज़दूर नौकरियों से निकाल दिए गए हैं. कई अपने घरों को लौट गए हैं और कई बेरोज़गार हैं."

 मैं दिवाली से बेरोज़गार हूँ. धंधा ठप्प पड़ गया है. मैंने परिवार चलाने के लिए अपना घर छह लाख में बेच दिया
मुकेश शाह, हीरा व्यापारी

हीरों का व्यापार 25 से 30 प्रतिशत तक सीमित हो गया है. लेकिन संघवी जैसे बड़े व्यापारी इस मुसीबत से जूझने के योग्य हैं. लेकिन बड़ी दिक्क़त छोटे व्यापारियों की है जो रोज़ के कारोबार पर निर्भर हैं.

मिनी बाज़ार के छोटे व्यापारियों ने बीबीसी को बताया, "इस समय यहाँ बैठने की जगह है लेकिन अच्छे दिनों में यहाँ तिल रखने की जगह भी नहीं होती. यहाँ जो व्यापारी मौजूद हैं उनमें से कई बेकार हैं और कई इस उम्मीद में आए हैं की शायद कोई ग्राहक आ जाए."

व्यापारी मुकेश शाह कहते हैं, "मैं दिवाली से बेरोज़गार हूँ. धंधा ठप्प पड़ गया है. मैं ने परिवार चलाने के लिए अपना घर छह लाख में बेच दिया”.

जब हीरों के व्यापारियों पर इतनी गहरी आर्थिक मार पड़ी है तो इस उद्योग से जुड़े उन सात लाख मजदूरों या रत्ना कलाकारों की दशा और भी भयानक है. और ऐसी ख़बरें भी आ रही हैं कि 21 बेरोज़गार मज़दूरों ने आत्महत्या कर ली. हज़ारों रोज़गार की तलाश में देश के अन्य शहरों में निकल पड़े हैं और कई अपने गावों को लौट गए हैं.

चुनावी मुद्दा

यही हाल कपड़ा उद्योग का भी है. दक्षिण भारत में कपड़े के कई छोटे मिल बंद हो चुके हैं और इस उद्योग में पांच लाख मज़दूर बेरोज़गार हो गए हैं. दवाइयों के उद्योग का भी बुरा हाल है.

उन कंपनियों और उद्योगों को नुक्सान उठाना पड़ रहा है जो निर्यात पर निर्भर करते हैं या जिनमें विदेशी निवेश हुआ है. तो क्या इतना बड़ा आर्थिक संकट आम चुनाव को किसी तरह से प्रभावित करेगा?

 सरेश भाई इलेक्शन जीतने से तो रहे लेकिन यह सही है की हीरों के कारोबार से जुड़ी समस्या को एक चुनावी मुद्दा बनाने में वो ज़रूर सफल हो सकते हैं
केके शर्मी, ट्रेनर

सुरेश भाई सूरत सीट से लोक सभा का चुनाव लड़ रहे हैं. वो उन लाखों बेरोज़गार रत्ना कलाकारों में से एक हैं जो कई महीनों से बेरोजगार हैं. वो कहते हैं, “मैंने लाखों रत्ना कलाकारों की समस्याओं को संसद में पेश करने के लिए लोक सभा चुनाव में खड़े होने का फैसला किया है.”

सुरेश भाई हर रोज़ अपनी साईकिल पर चुनाव प्रचार करने निकल जाते हैं और जनता को रत्ना कलाकारों की समस्याओं से आगाह कराते हैं.

लेकिन क्या वो चुनाव में जीतने की उम्मीद करते हैं तो उन्होंने ने कहा, “मैं सौ फ़ीसद चुनाव जीतूँगा. आप देखना मैं पचास हज़ार वोटों से जीतूँगा.”

पचास हज़ार वोटों से जीतने का दावा कुछ महत्वकांक्षी हो सकता है लेकिन सुरेश भाई के चुनाव लड़ने से मज़दूरों का मुद्दा ज़रूर चुनावी मुद्दा बन गया है.

सूरत में रत्ना कलाकारों और जौहरियों को ट्रेनिंग देने वाली एक सरकारी संस्था से केके शर्मा का कहना है, "वो चुनाव जीतने से तो रहे लेकिन यह सही है की हीरों के कारोबार से जुड़ी समस्या को एक चुनावी मुद्दा बनाने में वो ज़रूर सफल हो सकते हैं."

गुजरात के मुख्य मंत्री नारेंद्र मोदी की सरकार को अगर कहीं चुनौती है तो इसी शहर में और वो भी केवल आर्थिक कारणों से. मज़दूर और छोटे व्यापारियों का कहना था कि राज्य सरकार ने वादे ज़रूर किए लेकिन उन्हें एक रुपये की भी मदद नहीं दी गई है.

इन लोगों में राज्य सरकार के ख़िलाफ़ नाराज़गी साफ़ झलकती है. लेकिन जैसा कि केके शर्मा कहते हैं चुनाव में इन मुद्दों का प्रभाव पड़े भी तो जोड़ तोड़ की सियासत में कहीं खो जाते हैं.

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