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घोषणा ही नहीं, पैसा भी चाहिए | |||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||
रोज़गार गारंटी योजना को पूरे भारत में लागू करके केंद्र सरकार ने बेशक एक महत्वपूर्ण और ऐतिहासिक फ़ैसला लिया है. साथ ही एक अहम चिंता भी मेरे मन में इस क़ानून के लागू होने के लेकर उठ रही है. वो यह है कि सरकार ने इसे लागू करने के लिए आवश्यक तैयारी नहीं की है. ऐसा केंद्र और राज्य सरकारों, दोनों की ओर से देखने को मिलता है. जहाँ एक ओर केंद्र ने इस योजना को देशभर में लागू करने के लिए आवश्यक बजट देने में अपना हाथ खींच लिया है, वहीं दूसरी ओर राज्य स्तर पर जो आधारभूत व्यवस्थाएं होनी चाहिए थीं, वे नहीं दिखाई दे रही हैं. सरकार को पता तो था कि यह लागू हो रहा है. सैकड़ों, हज़ारों की तादाद में लोग अपने-अपने केंद्रों पर काम मांगने जा भी रहे हैं. पर लोगों को न तो जॉब कार्ड मिल पाए हैं, न आवेदन के फ़ार्म मिल रहे हैं और न ही रसीदें दी जा रही हैं. यहाँ तक कि राज्य सरकारों की ओर से जितने स्टाफ़ की नियुक्ति होनी चाहिए थी, ताकि योजना सही तरीके से लागू हो सके, वो भी नहीं हुआ है. सरकार का दावा तो है कि सबको काम दिया जाएगा पर सबको काम देने के लिए ज़रूरी तैयारी नहीं है. इससे एक नुकसान यह होगा कि सरकार की घोषणा से लोगों की उम्मीदें तो बढ़ी हैं पर व्यवस्था न होने से योजना उम्मीदों पर खरी नहीं उतर पाएगी. बजट, वेतन और मज़दूरी सरकार ने इस बजट में रोज़गार योजना को 16 हज़ार करोड़ दिए हैं जो कि इसे देशभऱ में लागू करने के लिए बहुत कम है. पिछले वर्ष इस योजना को 12 हज़ार करोड़ दिए गए थे जो कम पड़े थे. कई इलाकों से ख़बरें आई थीं कि लोगों को समय पर भुगतान नहीं हो पाया था. भुगतान न होने और काम रुकने से सबसे बड़ा नुकसान यह होता है कि योजना से विश्वास उठ जाता है. सरकार अपनी बाकी योजनाओं के लिए विश्व बैंक तक से कर्ज़ लेती है ताकि वे पूरी हों. रक्षा बजट भी एक लाख करोड़ का है. फिर लोगों को न्यूनतम मज़दूरी देने की योजना के लिए कम घोषणा क्यों. छठे वेतन आयोग में सरकार ने कर्मचारियों के वेतन 40 प्रतिशत तक बढ़ाए. लोगों की तनख़्वाहें एक लाख तक पहुँच गई हैं पर अब सरकार को तय करना चाहिए कि प्राथमिकता क्या है- सरकारी कर्मचारियों की तनख़्वाहें बढ़ाना या उन ग़रीब लोगों को न्यूनतम मज़दूरी सुनिश्चित कराना जिनके लिए ये कर्मचारी काम करते हैं. ग़रीब विरोधी मानसिकता पिछले दिनों में जिस तरह से इस योजना पर बहस हुई है, जिस तरह से ये योजना चर्चा में रही है, उससे एक साजिश जैसा आभाष मिलता है इसके ख़िलाफ़.
अमीरों का या उनके मुताबिक सोचनेवालों का इससे कोई सरोकार नहीं है. व्यवस्था की अपनी जो ख़ामियाँ हैं, कमज़ोरियाँ हैं, उनका भी ठीकरा इस योजना का विरोध करने वाले इसी योजना के सिर फोड़ते रहे. राजनीतिक दल इस घोषणा के लागू होने का श्रेय लेने की लड़ाई तो लड़ रहे हैं पर दलों के कार्यकर्ता कभी इस योजना के क्रियान्वयन को लेकर लोगों के बीच प्रयास करते हुए नहीं दिखाई दिए. आधारभूत ज़रूरतों की कमियों पर भी कोई बात नहीं कर रहा. राज्य और केंद्र के बीच भी योजना को लेकर राजनीतिक पैतरेबाज़ी होती रही है. राजनीतिक पैतरा और चुनाव चुनाव आने वाले हैं और इस लिहाज से इसकी घोषणा को कई तरह से देखा जाएगा. इसमें कोई दो राय नहीं कि राजनीतिक दल इस योजना की ताकत और महत्व को नहीं समझ रहे हैं. पर केवल ऊपरी घोषणाओं से कुछ सधने वाला नहीं है. हम ये चाहते हैं कि लोग भी लामबंद होकर राजनीतिक दलों से कहें कि वोट चाहिए तो ईमानदारी और राजनीतिक इच्छाशक्ति के साथ इस योजना को प्रभावी बनाया जाए और इसके प्रयास किए जाएं. इस बार इस योजना के बजट को लेकर संघर्ष और तेज़ होगा क्योंकि देशभर में इसे लागू करने के बाद मांग और बढ़ेगी और सरकार पर दबाव भी. अभी तक जहां प्रशासनिक सक्रियता से और लोगों के प्रयासों से यह योजना अच्छी तरह से लागू हुई है, वहाँ मज़दूरों का जीवन स्तर सुधरा है. उन्हें काम मिला है और लोग इस योजना से खुश हैं पर कई जगहों से अनदेखी की भी ख़बरें हैं. सरकारों को इस अनदेखी और रोज़गार की ज़रूरत, लोगों की दबाव को समझना चाहिए और इस दिशा में प्रयास करना चाहिए वरना चुनावों में इस योजना की अनदेखी की क़ीमत चुकानी पड़ेगी. (बीबीसी संवाददाता पाणिनी आनंद से बातचीत पर आधारित) |
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