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रोज़गार गारंटी क़ानून को लेकर यात्रा शुरू | ||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||
एकबार फिर भारत के दस राज्यों की तमाम सड़कों पर एक यात्रा शुक्रवार से शुरू हो गई है. पर यह यात्रा न तो लोगों से वोट माँगने के लिए है और न ही समाज में कोई धार्मिक चेतना जगाने के लिए. रोज़गार की गारंटी के लिए एक व्यापक कानून की माँग को लेकर शुरू हुई यह यात्रा अगले 45 दिनों तक देश के तमाम गाँवों में जाएगी और लोगों में रोज़गार गारंटी कानून की व्यापक माँग के लिए प्रचार करेगी. साथ ही इसको लेकर भारत में चल रहे लगभग दो दशकों पुराने जन-अभियानों को संगठित रूप देने का प्रयास भी किया जाएगा. सौ से भी ज़्यादा जनसंगठनों ने इस यात्रा को आयोजित करने में अपनी भूमिका निभाई है जिनमें से अधिकतर मजदूर यूनियन या जन अधिकारों पर काम कर रहे अभियान शामिल हैं. पर यह केवल जन-संगठनीय प्रयास भर नहीं है. वाम दलों सहित भारत के कुछ राजनीतिक दल भी इस यात्रा के पक्ष में एक मंच पर इसका समर्थन करते हुए देखे गए. कब बनेगा क़ानून ग़ौरतलब है कि वर्तमान केंद्र सरकार के न्यूनतम साझा कार्यक्रम में जिन बातों का प्रमुखता से उल्लेख किया है, रोज़गार गारंटी कानून उनमें से एक है और इसे लेकर वाम दलों की ओर से सरकार पर एक दबाव भी बनाया जाता रहा है.
हालांकि पिछले साल के आख़िर में सरकार की ओर से इस कानून को लागू करने के लिए एक मसौदा भी सामने आया था पर विशेषज्ञ उसे कमज़ोर मान रहे हैं और उसका राजनीतिक दलों व जनसंगठनों ने विरोध भी किया है. ख़ुद वरिष्ठ वामपंथी नेता एबी बर्धन मानते हैं कि वर्तमान मसौदे से रोज़गार गारंटी की माँग का हल नहीं निकाला जा सकता है. उन्होंने कहा, “हालांकि रोज़गार गारंटी देश में फैली बेरोज़गारी का हल नहीं है पर इसकी लोगों को ज़रूरत है. जो प्रस्ताव हमने देखा था और जो सामने आया है, उसमें बहुत फ़र्क है. इस क़ानून के लिए वामदल प्रतिबद्ध हैं.” सरकार पर भरोसा नहीं इस मौके पर बोलते हुए जानी-मानी लेखिका और सामाजिक कार्यकर्ता, अरुंधति रॉय ने कहा, “यह कानून एक बहुत बड़ी ज़रूरत है और मैं इस यात्रा को लेकर चल रहे लोगों को शुभकामनाएं देती हूँ. पर वर्तमान सरकार की नीयत पर मुझे बहुत ज़्यादा भरोसा नहीं है क्योंकि इनकी सभी आर्थिक नीतियाँ रोज़गार गारंटी के ख़िलाफ़ जा रही हैं.” यात्रा को झंडा दिखाकर शुरु करते हुए पूर्व प्रधानमंत्री वीपी सिंह ने कहा कि केवल क़ानून बनने से काम नहीं चलेगा. लोगों तक इस संदेश को पहुँचाना और उनकी भागीदारी को तय करना होगा. उन्होंने कहा, “सारा खेल समीकरणों का है और इसको सही अर्थों में लागू करने के लिए हमें नौकरशाही की गिरफ़्त से बाहर लाकर आम लोगों को इसकी बागडोर सौंपनी होगी.” कुल मिलाकर यात्रा के शुरू होने से संसद के सत्र से लेकर तमाम राजनीतिक हलकों तक रोज़गार की गारंटी के कानून को लागू करने के बारे में तमाम तकह की बहस शुरू हो गई है. यात्रा के आयोजन से जुड़े केंद्र सरकार के राष्ट्रीय सलाहकार परिषद के सदस्य, जाने-माने अर्थशास्त्री ज़्याँ द्रेज़ ने कहा कि रोज़गार की गारंटी का कानून लागू करने की दिशा में इस यात्रा को एक मज़बूत पहल के रूप में देखा जाना चाहिए. यात्रा से जुड़े संगठनों का मानना है कि इस यात्रा के बाद इस माँग को और संगठित रूप दिया जा सकेगा और इससे सरकार पर एक देशव्यापी दबाव बनाया जा सकेगा. |
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