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सूचना का अधिकार विधेयक संसद में पेश | ||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||
सरकारी कामकाज में पारदर्शिता और जवाबदेही को तय करने के मकसद से केंद्र सरकार ने मंगलवार को सदन में सूचना का अधिकार विधेयक पेश किया. विधेयक को सदन में प्रस्तुत करते हुए कार्मिक एवं संसदीय मामलों के राज्यमंत्री सुरेश पचौरी ने कहा कि इस विधेयक से लोगों को सरकारी कामकाज के बारे में जानकारी मिल सकेगी और सरकार और लोगों के बीच की खाई को पाटा जा सकेगा. सदन में रखे गए इस सूचना का अधिकार विधेयक, 2004 के मुख्य बिंदुओं की जानकारी देते हुए उन्होंने कहा कि इस विधेयक के प्रभावी होने के बाद लोग तमाम सरकारी विभागों से सूचनाएँ हासिल कर सकेंगे. इन तमाम विभागों में रक्षा व सुरक्षा से संबंधित विभागों को भी शामिल किया गया है. विधेयक के अनुसार इन विभागों से केवल मानवाधिकारों या भ्रष्टाचार के मामलों से संबंधित सूचनाएँ माँगी जा सकेंगी. इस विधेयक को केंद्रीय कैबिनेट ने इसी वर्ष 4मई को मंज़ूरी दे दी थी. ग़ौरतलब है दिल्ली, राजस्थान, मध्यप्रदेश, महाराष्ट्र, गोवा, तमिलनाडु और आँध्रप्रदेश समेत देश के तकरीबन 10 राज्यों में यह क़ानून लागू है. इससे पहले दिसंबर 2002 में भी तत्कालीन केंद्र सरकार ने सूचना स्वातंत्र्य विधेयक को सदन में मंज़ूरी तो दी थी लेकिन वो लागू नहीं किया जा सका था. विशेषज्ञ मानते हैं कि पिछला विधेयक तमाम ख़ामियों भरा था और उसके लागू होने पर भी लोगों को इस अधिकार का फ़ायदा नहीं मिलने वाला था. इन्ही ख़ामियों के चलते केंद्रीय सरकार की राष्ट्रीय सलाहकार परिषद की ओर से मसौदे में तब्दीलियों का सुझाव दिया गया और पिछले विधेयक में ज़रूरी बदलाव करके यह नया प्रारूप तैयार किया गया है. मज़बूत व्यवस्था रोमन मैगसेसे पुरस्कार से सम्मानित अरुणा रॉय ने देशभर में सूचना का अधिकार अभियान चलाने में प्रमुख भूमिका निभाई है. उनका कहना है, “राष्ट्रीय सलाहकार परिषद की सदस्य होने के नाते हमने जिन बातों की सिफ़ारिशें की थीं, उनको विधेयक में जगह दी गई है और इससे हम एक बेहतर कानून पाएंगे.'' वर्तमान विधेयक की क्या ख़ास बातें हैं, इस बारे में वो कहती हैं, “इस प्रावधान के आने के बाद सूचना माँगने का दायरा और इसका प्रभाव बढ़ गया है. रक्षा और सुरक्षा से संबंधित सूचनाओं के लिए पहले कोई प्रावधान नहीं था लेकिन अब हम मानवाधिकारों और भ्रष्टाचार के मुद्दों पर यहाँ भी सूचना माँग सकेंगे.” अरुणा राय बताती हैं, “पहले सूचना न मिलने पर कोई दंड का प्रावधान नहीं था पर अब जानबूझ कर सूचना छिपाने का मामला आपराधिक मामले के रूप में देखा जाएगा और सूचना न देने की स्थिति में संबंधित अधिकारियों को दंड दिया जाएगा.” ग़ौरतलब है कि पिछले मसौदे में यदि कोई सरकारी विभाग या अधिकारी सूचना देने से मना कर देता, तो उसके लिए अपनी गुहार लगाने के लिए कोई स्वतंत्र इकाई नहीं थी. पर अब जानकारी हासिल करने से संबंधित सभी शिकायतों के लिए एक स्वतंत्र इकाई बनाई गई है जहाँ लोग अपील कर सकेंगे. इस इकाई के लिए एक सूचना आयुक्त की नियुक्ति की जाएगी जिसे भारत के चुनाव आयुक्त के समान अधिकार प्राप्त होंगे. इस बारे में पत्रकारों को जयपाल रेड्डी ने बताया कि मुख्य सूचना आयुक्त राज्य स्तर पर नियुक्त किए जाएँगे जिनके अधीनस्थ 10 की अधिकतम संख्या में सूचना आयुक्त हो सकते हैं. उन्होंने बताया कि इसके लिए 65 करोड़ रूपए का वार्षिक बजट अनुमानित है. सूचना का अधिकार भारत दुनिया का 61वाँ देश हो जाएगा जहाँ सूचना माँगने की व्यवस्था है. सबसे पहले स्वीडन में वर्ष 1766 में सूचना स्वातंत्र्य विधेयक लागू हुआ था. इसके 200 वर्षों बाद यानी 1966 में यह कानून अमरीका में लागू हुआ और वो दुनिया का दूसरा ऐसा देश बना जहाँ लोग सरकारी कामकाज पर निगरानी रख सकते थे. पिछले पाँच दशकों में दुनियाभर में मानवाधिकारों को लेकर चले अभियानों और भ्रष्टाचार की जटिलताओं से निपटने के लिए हुए प्रयासों के चलते तमाम देशों में यह कानून लागू हो सका. हालांकि भारत में इस अभियान के संगठित रूप से शुरू होने का इतिहास कोई दो दशक पुराना ही है. विशेषज्ञ और सूचना का अधिकार अभियान से जुड़े लोगों का मानना है कि तमाम राज्यों और केंद्र स्तर पर भी कानून के आने का श्रेय पिछले दो दशकों में देशभर में चले सूचना के अधिकार के माँग के अभियान को जाता है. पर कानून को लागू करने और उसके पूरी तरह से क्रियान्वयन में तमाम चुनौतियाँ भी हैं. वजह हैं लोगों में साक्षरता और जागरूकता की कमी. |
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