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शहर के बीच की झुग्गियों का सच! | ||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||
सिटी ब्यूटीफ़ुल...भारत के सबसे सुंदर शहरों मे से एक है चंडीगढ़. हाल ही में टाइम मैगज़ीन ने अपने सर्वेक्षण में चंडीगढ़ को एशिया का सबसे बेहतरीन शहर बताया है. सुनियोजित तरीके से बने विभिन्न सेक्टर, पार्क, हरे भरे पेड़....कोई भी प्रभावित हुए बगैर नहीं रहता. भारत के सभी शहरों में चंडीगढ़ की प्रति व्यक्ति आय भी सबसे ज़्यादा है. लेकिन पॉश कोलोनियों वाले इस शहर का एक दूसरा चेहरा भी है. यहाँ बनी हज़ारों झुग्गियाँ शहरीकरण की एकदम अलग तस्वीर पेश करती हैं- कामचलाऊ कच्चे मकान या झुग्गियाँ, साफ़ और शुद्ध पेयजल के अलावा बिजली की भी कमी और हर ओर गंदगी ही गंदगी. चंडीगढ़ और पंजाब में बड़ी संख्या में उत्तर प्रदेश और बिहार जैसे राज्यों के लोग रोज़गार के लिए आकर बसे हुए हैं. इनमें से और ज़्यादातर लोग इन्हीं झुग्गी झोपड़ियों में रहते हैं. यहाँ ये जानना अहम है कि पंजाब-चंडीगढ़ के बाहर से आकर झुग्गियों में बसे ये लोग नेताओं के लिए बड़ा वोक बैंक हैं. आदर्श कालोनी इसका प्रमाण यह है कि वोट बटोरने के लिए पार्टियों ने पंजाब और चंडीगढ़ के लिए बिहार से नीतीश कुमार, शत्रुघ्न सिन्हा और शेखर सुमन जैसे लोगों को बुलाया है.
चंडीगढ़ में करीब 5.2 लाख मतदाता हैं जिनमें से करीब डेढ़ लाख लोग झुग्गियों में रहते हैं. शहरी छवि के बावजूद बहुत हद तक चंडीगढ़ में चुनाव जीतने के लिए यही वोट निर्णायक साबित होते हैं. यहाँ रहने वाले लोगों की शिकायत है कि नेता साहब वोट जुटाने तो आते हैं लेकिन झुग्गियों के लिए कुछ नहीं करते. करीब 25 साल पहले गोरखपुर से चंडीगढ़ आकर बसे अंसारी मिस्त्री का काम करते हैं और आदर्श कालोनी की झुग्गी में रहते हैं. ये पूछने पर कि उनके इलाक़े की समस्याएँ क्या हैं तो वे मानो फट पड़ते हैं. वे कहते हैं, " दिक्कतों का क्या बताएँ. न बिजली है और न पानी. शौचालय तक का साधन नहीं है. कमियाँ तो बहुत सारी हैं." नाराज़ अंसारी कहते हैं कि उन्हें इलाक़े में रहते बरसों बीत गए लेकिन यहाँ कुछ ख़ास बदलाव नहीं आया. कुंडी कनेक्शन क़मोबेश यही दास्तां मुन्ना लाल की है जो ऐसे ही कच्चे मकान में रहते हैं. उत्तर प्रदेश से काम की तलाश में आए मु्न्ना लाल को चंडीगढ़ आए दस साल हो चुके हैं.
वे कहते हैं, " मेरी कॉलोनी में दिक्कत यही है कि नेता तो आते हैं, मीठी मीठी बातें करते हैं और चले जाते हैं. जिसको हाथ नहीं भी जोड़ना हो वो भी हाथ जोड़ता है. इतने सालों में बस किसी तरह पानी का नल लग पाया है यहाँ. गंदगी तो पहले जितनी थी उससे कहीं ज़्यादा हो गई है.'' बिजली के बारे में वो साफ़गोई से कहते हैं कि केवल कुंडी कनेक्शन से काम चलता है. टीकाकारों का कहना है कि झुग्गियों में रहने वाले ये लोग किसी भी पार्टी के लिए बड़ा वोटबैंक हैं और पार्टियाँ इनकी सामूहिक शक्ति का इस्तेमाल वोट बटोरने के लिए करती हैं. वोंट बैंक की राजनीति सवाल ये है कि अगर लोगों को इतनी शिकायत है तो क्या वे इस बात को समझते हैं कि उन्हें अपनी वोट की ताकत का इस्तेमाल सही तरीके से करना चाहिए ताकि वे वोटबैंक की राजनीति का शिकार न बनें.
पंजाब और चंडीगढ़ में कांग्रेस और भाजपा के अलावा बसपा की भी कुछ पैठ बढ़ी है. अंसारी कहते हैं कि इस बार झुग्गियों में रहने वालों में बसपा की लोकप्रियता बढ़ी है. वे मानते हैं कि वोट बैंक के तौर पर उनका इस्तेमाल होता है पर उन्हें यकीन है कि अब की बार ऐसा नहीं होगा. हमने मुन्ना लाल से पूछा कि इस बार वे किसे वोट देंगे? मुन्ना कहते हैं कि अभी मन नहीं बनाया लेकिन सोचसमझकर ही मताधिकार का प्रयोग करेंगे जो झुग्गियों में रहने वालों को समस्याओं को तरजीह दे और सिर्फ़ शहरी इलाक़ों तक ही सीमित न हो. वे कहते हैं, " सच है कि दारू इत्यादि का प्रलोभन दिया जाता है. लेकिन हम 40-50 लोग हैं जो एक ही ज़िले से हैं. चुनाव से पहले हम सब बैठकर विचार करेंगे, हर नेता की बात सुन ली है, सामूहिक फ़ैसला करेंगे. '' चंडीगढ़ शहर के बीच बनीं ये झुग्गियाँ तो केवल एक मिसाल हैं. हर बड़े शहर की अमूनन यही दास्तां है जो शहरीकरण की समस्याओं को उजागर करता है. स्लमडॉग मिलियनेयर ने भले ही भारत की चारों ओर 'जय हो' और विजय करवाई हो लेकिन शहरों के बीच बसीं इन बदहाल झुग्गियों में रहने वाले लोगों की समस्याएँ और आप बीती में तो इस जय की गूँज कम ही सुनाई देती है. |
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