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वोट दे देंगे, फ़कत रस्म निभाने के लिए... | |||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||
बनारस के रंग से चुनाव का रंग ग़ायब है. लगता ही नहीं कि लोगों को इस देश के सबसे अहम फ़ैसले के लिए अपने को तैयार करना है और अपनी ज़िम्मेदारियों के लिए किसी को चुनकर संसद तक भेजना है. रास्तों, दीवारों से बैनर, पोस्टर गायब हैं. बनारस के ऑटो रिक्शों पर अब भी काशी विद्यापीठ के चुनावों के ही नारे और अपील लगी हुई हैं. सार्वजनिक स्थानों पर संतानों से लेकर ‘ताक़त’ हासिल करने की दवाओं के ही विज्ञापन दिख रहे हैं, राजनीतिक प्रत्याशियों के बहुत कम, या न के बराबर. लोगों के बीच पहुँचिए तो बात खाने-पीने की है, बात काम-धंधे की है. तकलीफ़ और कमियों की है. बनारसी कलेवर की फ़ब्तियाँ, गालियाँ, चुहलबाज़ियाँ... बहुत कुछ है, पर जनाब, चुनाव कम ही है. फ़ीका प्रचार उतना ही कम, जितने कम टीवी चैनलों पर जलवायु परिवर्तन, किसानों की आत्महत्या, मानवाधिकार हनन या शिक्षा और स्वास्थ्य से जुड़े कार्यक्रम हैं. प्रचार के लिए छप रहे प्रत्याशियों में मुरली मनोहर जोशी से पहली मुलाक़ात एक पान की दुकान पर हुई. एक स्टीकर पर वो छपे हुए थे और वोट मांग रहे थे. पानवाला उनकी पार्टी के प्रति प्रतिबद्ध था और इसलिए वो वहाँ मौजूद थे. इस फीके चुनावी सीज़न का एक असर यह है कि जन मन की टोह लेना किसी भी प्रत्याशी या पारखी से पारखी आदमी के लिए भी आसान नहीं है. शहर अपनी गति से चल रहा है. किसी से पूछिए कि वोट किसे देंगे तो जवाब मिलता है कि क्या फ़र्क पड़ता है. पर चिंताजनक यह है कि राजनीतिक रूप से सदा उर्वरक दिखने वाले बनारस में भी स्थिति ऐसी क्यों दिखाई दे रही है. क्यों लोकतंत्र का सबसे बड़ा पर्व इस कदर फीका पड़ा है. जवाब भी अधिकतर मतदाताओं की बातों या आंखों में तैरता दिख जाता है. यही, कि यहाँ बगुलों में हंस कौन है. किसकी बातों पर यकीन करने की एक और ग़लती दोहरा बैठें. चतुष्कोणीय मुक़ाबला इस सीट पर चार प्रत्याशी चुनाव मैदान में एक-दूसरे को टक्कर देते नज़र आ रहे हैं. एक कानपुर जेल में बंद मुख़्तार अंसारी हैं.
अंसारी के लिए बनारस के आम जन में शंका यह है कि ये जीतेंगे तो उसे किसकी जीत माना जाएगा. चिंता राजनीति के अपराधीकरण को लेकर है. दूसरे प्रत्याशी हैं भाजपा के वरिष्ठ नेता मुरली मनोहर जोशी. जोशी चुनाव से ठीक पहले बनारस आए हैं. विपक्षी और कई आम नागरिक यह भी सवाल उठाने से नहीं चूकते कि इलाहाबाद से हारने के बाद बनारस आए जोशी यहाँ के लोगों को कितना वक़्त देंगे. तीसरे प्रत्याशी अजय राय समाजवादी पार्टी के टिकट पर चुनाव लड़ रहे हैं. पर अजय राय भाजपा के विधायक भी हैं. मुसलमानों को इसे लेकर कुछ असहजता महसूस हो रही है. राजेश मिश्र कांग्रेस से प्रत्याशी हैं. पिछली बार वही चुनाव जीतकर संसद में पहुँचे थे, पर कुछ लोग उन्हें ‘आश्वासन मिश्र’ कहकर भी बुलाते हैं. बनारस में कई लोगों का कहना है कि व्यक्ति अच्छे हैं, सबको आश्वासन भी देते हैं पर काम कितना किया पांच साल में, इसपर हाथ की उंगलियाँ भी पूरी नहीं होतीं. चुनाव में ऐसा कोई व्यक्तित्व साथ उभरता हुआ नहीं दिखता जिसके समर्थन में लोग उमड़ें, जिसकी छवि, प्रतिबद्धता या काम को लेकर लोग आशान्वित हों. पाबंदियाँ उदासीनता की एक वजह कुछ स्थानीय लोग इस तरह भी समझाते हैं कि चुनाव आयोग की नकेल के कारण ज़्यादा खर्च करने पर पाबंदियाँ लगी हैं. इससे ऐसा नहीं हुआ है कि प्रत्याशी कम खर्च कर रहे हैं, करोड़ों में पैसा बह रहा है पर आम लोगों की पहुँच से बाहर है. कुछ गिनती के लोगों के बीच तैर रहा है. दरअसल, पहले दिखाई पड़ने वाले खर्च में आम आदमी पोस्टर, बैनर बनाने, लगाने से लेकर प्रचार करने, गाड़ी चलाने, बाकी बंदोबस्तों के ज़रिए रोज़गार और खर्च का ज़रिया खोज लेता था. चुनाव कई परिवारों के लिए अगले कुछ महीनों की रोटी जुगाड़ता था. अब यह खर्च बाहर है सो लोग भी बाहर हैं. आज के दौर का मतदाता ज़्यादा समझदार मालूम देता है. ग़रीब, किसान, मजदूर, बेरोज़गार... सबको मालूम है कि उन्हें किससे कितनी उम्मीद रखनी चाहिए. फिर भी, मतदान होगा. लोग निकलेंगे, वोट देंगे...पर उसकी ज़्यादातर वजह जाति और सांप्रदायिकता के आधार पर, विचारधारा के स्तर पर या सामाजिक ज़रूरतें हैं. भेलूपुर में लोगों के एक समूह से बात करते-करते एक के मुँह से अनायास निकलता है- चुनाव है तो वोट देने तो जाएंगे ही. वो अपनी ज़िम्मेदारी न समझें, हम तो समझते हैं. वोट देंगे.... पर रस्म निभाने के लिए. |
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