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गुरुवार, 07 मई, 2009 को 06:47 GMT तक के समाचार
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पश्चिम बंगाल में वाम दलों को मिलती चुनौती

दीवार पर लिखे नारे
पश्चिम बंगाल में चारो तरफ़ झंडे, बैनर, हाथ से बने पोस्टर और हाथ से लिखे नारे नज़र आते हैं

देश के कई शहरों में चुनाव प्रचार का रंग फीका दिखा लेकिन पश्चिम बंगाल में प्रवेश करते ही झंडे, बैनर और हाथ से बने पोस्टर नज़र आए.

पहली नज़र में लगता है कि आप सीधे 10 साल पीछे चले गए हों जब पार्टियाँ दीवारों पर अपने नारे लिखती थीं और लोग अपने घरों पर पार्टियों का झंडा लगाते थे.

स्थानीय पत्रकार बताते हैं कि बंगाल ऐसा ही है क्योंकि यहाँ राजनीतिक दल सिर्फ़ चुनाव में ही नहीं बल्कि साल भर सक्रिय रहते हैं.

दिल्ली से जब मैं चला था तो कई लोगों ने कहा था कि इस बार पश्चिम बंगाल में वाम दलों के प्रभुत्व के अंत की शुरुआत हो सकती है लेकिन वाम दल ऐसा मानने को तैयार नहीं हैं.

काम पर भरोसा

सीपीएम नेता वासुदेव आचार्य कहते हैं, "हमने बहुत काम किया है. ग़रीबों के लिए भी और मध्य वर्ग के लिए भी. ज़मीनी स्तर पर किया गया हमारा काम हमें वोट दिलाता रहा है और इस बार भी दिलाएगा. हमें पूरा विश्वास है कि इस बार भी हम अभूतपूर्व जीत दर्ज करेंगे."

 हमने बहुत काम किया है. ग़रीबों के लिए भी और मध्य वर्ग के लिए भी. ज़मीनी स्तर पर किया गया हमारा काम हमें वोट दिलाता रहा है और इस बार भी दिलाएगा. हमें पूरा विश्वास है कि इस बार भी हम अभूतपूर्व जीत दर्ज करेंगे
वासुदेव आचार्य, माकपा नेता

पश्चिम बंगाल में तीन दशक से अधिक समय से मार्क्सवादी कम्युनिस्ट पार्टी (माकपा) का एकछत्र राज है. उसे चुनौती देने के लिए इस बार तृणमूल कांग्रेस और कांग्रेस का गठजोड़ भरपूर प्रयास कर रहा है.

तृणमूल कांग्रेस नेता साधन पांडे कहते हैं, "वाम दलों ने नंदीग्राम में क्या किया सबको पता है. विकास के नाम पर किसानों की ज़मीनें छीनी जा रही हैं. लोगों में नाराज़गी है और इस बार हम बेहतरीन प्रदर्शन करने वाले हैं."

माकपा राज्य में 1977 से सत्ता में है और लोकसभा की 40 में से अधिकतर सीटें वही जीतती है. भूमि सुधार माकपा की बड़ी उपलब्धि रही है लेकिन पिछले एक दशक में पहले तो उन्होंने आर्थिक सुधारों का विरोध किया और अब नए-नए उद्योग लगाने की पूरी कोशिश कर रहे हैं.

तृणमूल कांग्रेस झंडे, बैनर, नारों और जनसभाओं के मामले में माकपा को कड़ी चुनौती देती दिखी लेकिन क्या मतदाता उसके साथ जाएँगे.

ज़मीनी हक़ीक़त

जब मैंने रवींद्र भारती विश्वविद्यालय में दक्षिण एशिया मामलों के प्रोफ़ेसर सव्यसाची बासु रायचौधरी से यही सवाल पूछा तो वे बोले बंगाल की राजनीति को ज़मीनी स्तर पर समझने की ज़रुरत है.

 लोगों को, मीडिया को और नेताओं को सिंगुर और नंदीग्राम दिखता है लेकिन वाम दलों ने पिछले कई वर्षों में ज़मीनी स्तर पर जिस तरह से संगठन खड़ा किया है उसकी ताक़त को कोई नहीं आंक रहा है
प्रोफ़ेसर सव्यसाची बासु रायचौधरी

उन्होंने मुस्कुराते हुए कहा, "लोगों को, मीडिया को और नेताओं को सिंगुर और नंदीग्राम दिखता है लेकिन वाम दलों ने पिछले कई वर्षों में ज़मीनी स्तर पर जिस तरह से संगठन खड़ा किया है उसकी ताक़त को कोई नहीं आँक रहा है."

वाम दलों की आलोचना करने वाले सव्यसाची साफ़ शब्दों में कहते हैं, "वाम दलों की हड़बड़ी में बनाई गई विकास की नीतियों से पार्टी के कई लोग ख़ुश नहीं हैं. अंदरुनी लड़ाई तो है जिसका नुक़सान पार्टी को होगा लेकिन विरोधियों के पास माकपा को नुक़सान पहुँचाने की क्षमता फ़िलहाल ज़्यादा नहीं है."

सव्यसाची कहते हैं कि वाम दल पश्चिम बंगाल के लोगों के जीवन में अहम भूमिका निभाते हैं और वे परिवार, समाज और राजनीतिक सोच पर हावी हैं जिसे बदलने में तृणमूल या कांग्रेस को अभी काफ़ी समय लगने वाला है.

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