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किसी क़ीमत पर कांग्रेस को समर्थन नहीं: कराट | ||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||
मार्क्सवादी कम्युनिस्ट पार्टी महासचिव प्रकाश कराट ने स्पष्ट शब्दों में कह दिया है कि उनकी पार्टी इस बार कांग्रेस को किसी क़ीमत पर समर्थन नहीं देगी, भले ही उन्हें विपक्ष में बैठना पड़े. मगर इसके साथ ही वह ये कहने से नहीं चूके कि ज़रूरत पड़ने पर कांग्रेस से समर्थन लेने में उन्हें कोई परेशानी नहीं होगी. बीबीसी हिंदी सेवा से विशेष बातचीत में कराट ने कहा, "वापस कांग्रेस के साथ काम करना हमारी पार्टी के लिए विकल्प नहीं है, दूसरों के लिए मैं नहीं कह सकता. कांग्रेस की सरकार को हम समर्थन नहीं देंगे और ज़रूरत हुई तो हम विपक्ष में बैठेंगे." माकपा महासचिव का कहना था कि इस बार उनकी पार्टी कांग्रेस को हटाने के नारे के साथ लड़ रही है और 2004 के चुनाव में ये स्थिति नहीं थी. उन्होंने कहा, "2004 में हमने कांग्रेस हटाने का नारा नहीं दिया था, हमने भाजपा को हटाने और सेक्युलर सरकार की बात कही थी." 'कांग्रेस तय करे' कराट का कहना था कि अगर कांग्रेस चुनाव हारती है तो सरकार के लिए उसका दावा नहीं रहेगा, ऐसे में उसे तीसरे मोर्चे का समर्थन करना होगा. उन्होंने कहा, "कांग्रेस को तय करना होगा कि वह धर्मनिरपेक्ष सरकार चाहती है या नहीं. वर्ष 2004 में हमने इसी मुद्दे पर उनका समर्थन किया था. अब उन्हें तय करना होगा." कराट की बात बहुत स्पष्ट थी कि कांग्रेस को समर्थन किसी क़ीमत पर नहीं दिया जाएगा और कांग्रेस से समर्थन लेने के लिए उनका दरवाज़ा खुला है. ये पूछे जाने पर कि इस आम चुनाव में वह वामपंथी पार्टियों की स्थिति कैसी देखते हैं उन्होंने कहा, "हमारी ताक़त इतनी होगी कि हम राष्ट्रीय राजनीति में अहम भूमिका निभा सकें." कराट ने तीसरे मोर्चे की सरकार बनने की स्थिति में प्रधानमंत्री पद के लिए किसी का नाम लेने से परहेज़ किया. उनका कहना था, "पसंदीदा उम्मीदवार सभी पार्टियों से बात करके आम सहमति से चुना जाएगा. बहुदलीय प्रणाली में सभी पार्टियों को उम्मीदवार स्वीकार्य होना चाहिए." बहुजन समाज पार्टी नेता मायावती की प्रधानमंत्री पद से जुड़ी महत्त्वाकाँक्षा के बारे में पूछे जाने पर कारत ने कहा कि इस बारे में कोई भी सोच सकता है और पार्टियाँ अपने नेता को आगे कर सकती हैं मगर इसका फ़ैसला तो चुनाव के बाद ही होगा. कराट का कहना था कि प्रधानमंत्री पद के नाम पर उनका कोई भी पूर्वाग्रह नहीं है उनके लिए अधिक महत्त्वपूर्ण वैकल्पिक नीतियाँ और नई सरकार के कार्यक्रम होंगे. प्रधानमंत्री पद के लिए तीसरे मोर्चे में जो भी नेता सबको मान्य होगा वह उनकी पार्टी को भी स्वीकार्य होगा. कूटनीतिक फ़ैसला माकपा के वयोवृद्ध नेता ज्योति बसु को एक समय प्रधानमंत्री बनने से रोकने संबंधी पार्टी की केंद्रीय समिति के फ़ैसले पर उनका कहना था कि उस समय का मूल्यांकन करते हुए पार्टी ने ये फ़ैसला किया था मगर साथ ही उस समय ये फ़ैसला हुआ था ये कोई अंतिम फ़ैसला नहीं है और परिस्थितियों के साथ फ़ैसले बदले जा सकते हैं. इस बार ख़ुद उनके प्रधानमंत्री बनने की संभावना पर कराट का कहना था, "पार्टी का महासचिव तो सांसद भी नहीं होता. उनके लिए संगठन का काम ज़रूरी होता है." कराट ने बल्कि ये कहा कि वो तो पार्टी महासचिव ही रहना चाहते हैं. उनका कहना था कि सभी सक्षम लोग हैं और प्रधानमंत्री पद के लिए योग्य नेता मौक़े पर चुन लिया जाएगा. कांग्रेस सरकार से समर्थन वापसी के बारे में कराट ने कहा कि मतभेद सिर्फ़ परमाणु क़रार पर ही नहीं था. अमरीका के साथ कूटनीतिक साझेदारी का जो सरकार ने फ़ैसला किया वामपंथी दल उसका विरोध कर रहे थे. उन्होंने कहा, "हम आर्थिक नीतियों, सैन्य सहयोग और परमाणु क़रार पर अमरीका के साथ कूटनीतिक साझेदारी का विरोध कर रहे थे. कांग्रेस पर हम अब भरोसा नहीं कर सकते." 'संसद सबसे ऊपर' परमाणु क़रार के मुद्दे पर कराट ने कहा कि सत्ता में आने पर उस क़रार पर फिर से चर्चा होगी और भविष्य के बारे में उनका कहना था कि अब सिर्फ़ मंत्रिमंडल ही बड़े फ़ैसले नहीं किया करेगी बल्कि संसद सबसे ऊपर होगी और किसी भी क़रार के लिए संसद की सहमति ज़रूरी होगी. कट्टरपंथी या अवसरवादी होने संबंधी आरोपों के बारे में ख़ुद कराट का कहना था, "हम तो नरमपंथी हैं. हम तो परिस्थितियों को देखते हुए सिद्धान्त लागू करने की बात करते हैं." उनका कहना था कि लोग तीसरे मोर्चे को अवसरवादी गठबंधन कह रहे हैं मगर तीसरे मोर्चे में शामिल सभी पार्टियाँ आर्थिक नीतियों, परमाणु क़रार और संघीय ढाँचे को लेकर एकमत हैं अब तक पार्टी की कमज़ोरी पर चर्चा करते हुए कराट ने कहा कि वामपंथी पार्टियाँ सांप्रदायिकता का तो सामना कर सकी हैं मगर इस दौर में जातिवाद का सामना करने में थोड़ी कमज़ोरी रह गई है. साथ ही उन्होंने इस बात पर भी अफ़सोस जताया कि जो पार्टी कभी उत्तर भारत में प्रासंगिक होती थी आज उसका महत्त्व वहाँ कम हो गया है. |
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