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सीपीएम में मुखर होते मतभेद के स्वर | ||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||
मार्क्सवादी कम्युनिस्ट पार्टी (सीपीएम) ने विश्वास मत से पहले 19 और 20 जुलाई को केंद्रीय समिति की बैठक आयोजित की है. लेकिन इस बैठक से पहले सरकार गिराने के मुद्दे पर पार्टी में कई स्वर सुनाई दे रहे हैं. पार्टी महासचिव प्रकाश कारत केंद्रीय समिति से सरकार गिराने की अपनी मुहिम पर केंद्रीय समिति की मुहर लगवाना चाहेंगे. लेकिन ज्योति बसु और सोमनाथ चटर्जी और उनसे जुड़े कई नेता भारत-अमरीका परमाणु समझौते के तो विरोधी हैं लेकिन वो सरकार गिराने में भारतीय जनता पार्टी के साथ खड़े नहीं दिखाई देना चाहते हैं. इस सप्ताह ही ज्योति बसु ने कहा था,'' परमाणु समझौते का विरोध किया जाना चाहिए लेकिन सांप्रदायिक शाक्तियाँ ज्यादा बड़ा ख़तरा हैं.'' सीपीएम के एक वरिष्ठ नेता ने नाम न छापने की शर्त पर कहा,'' कई वरिष्ठ नेता अब खुलकर सरकार गिराने के ख़िलाफ़ बोल रहे हैं, इसलिए पार्टी नेतृत्व केंद्रीय समिति में इस क़दम के लिए समर्थन हासिल करने की कोशिश कर सकता है.'' ऐसी स्थिति 1996 में भी उत्पन्न हुई थी, उस वक्त ज्योति बसु के प्रधानमंत्री पद स्वीकार करने के सवाल पर केंद्रीय समिति की राय ली गई थी. 'ऐतिहासिक भूल' केंद्रीय समिति ने उसे ठुकरा दिया था और ज्योति बसु प्रधानमंत्री नहीं बन पाए थे और उन्होंने सार्वजनिक रूप से उस फ़ैसले को 'ऐतिहासिक भूल' क़रार दिया था. ज्योति बसु के नजदीकी माने जानेवाले पश्चिम बंगाल के परिवहन मंत्री सुभाष चक्रवर्ती का कहना है, '' एक और ऐतिहासिक भूल की भूमिका बन रही है. यदि हम इस सरकार को गिरा देते हैं तो हम भाजपा के नेतृत्ववाली सांप्रदायिक शाक्तियों और उनके उद्देश्यों की ही मदद करेंगे.'' पश्चिम बंगाल के एक अन्य नेता बिनय कोनार भी इस बात का समर्थन करते हैं. खींचतान यहाँ तक कि लोक सभा अध्यक्ष सोमनाथ चटर्जी ने कांग्रेस नेतृत्ववाली सरकार को गिराने के फ़ैसले के विरोध में प्रकाश कारत को एक पत्र लिखा है.
पहले तो प्रकाश कारत सोमनाथ चटर्जी का भी लोक सभा अध्यक्ष पद से इस्तीफ़ा चाह रहे थे लेकिन अब उन्होंने फ़ैसला उन पर छोड़ दिया है. अब प्रकाश कारत का कहना है,'' हम लोक सभा अध्यक्ष जैसे संवैधानिक पद को विवाद में नहीं घसीटना चाहते हैं.'' लेकिन दूसरी ओर प्रकाश कारत ने यूपीए सरकार को गिराने के लिए मायावती की बहुजन समाज पार्टी से हाथ मिला लिया है. पश्चिम बंगाल के कई सीपीएम नेता इस बात को लेकर चिंतित हैं कि यदि यूपीए सरकार गिरी तो उसका चुनावों में लाभ भाजपा को मिलेगा. साथ ही पश्चिम बंगाल, त्रिपुरा और केरल राज्यों की वामपंथी सरकारों को मुश्किलों का सामना करना पड़ सकता है. पश्चिम बंगाल के हाल के पंचायत और नगरपालिका चुनावों में अनेक स्थानों पर सीपीएम को हार का मुँह देखना पड़ा था जिससे उनकी घबराहट बढ़ गई है. लेकिन दिलचस्प तथ्य ये है कि सीपीएम के सहयोगी सीपीआई, आरएसपी और फॉरवर्ड ब्लाक जैसी अन्य वामपंथी पार्टियों को इस मुद्दे पर कोई समस्या का सामना नहीं करना पड़ रहा है. |
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