पटेलों और भाजपा के बीच तलवारें खिंच रहीं हैं?

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- Author, सलमान रावी
- पदनाम, बीबीसी संवाददाता, दिल्ली
जिसे कहा जा रहा था कि ये गुजरात में भारतीय जनता पार्टी की तरफ पाटीदारों के रुझान का सबसे बड़ा शक्ति प्रदर्शन है, उस सभा ने पार्टी को अब सोचने पर मजबूर कर दिया है.
जानकारों को लगता है कि सूरत की जनसभा, पाटीदार समाज द्वारा राष्ट्रीय अध्यक्ष अमित शाह और गुजरात के नए मुख्यमंत्री विजय रूपाणी के अभिवादन के लिए आयोजित की गयी थी, मगर सभा के बाद टूटी हुयी कुर्सियों ने साफ़ संकेत देने शुरू दिए कि सब कुछ उतना ठीक भी नहीं है जितना सभा के बहाने बताने की कोशिश की गयी थी.
आंकड़े साफ़ थे. प्रदेश अध्यक्ष जीतूभाई सौजीभाई वघानी सबसे ज़्यादा 17 मिनटों तक बोले.

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केंद्रीय मंत्री पुरूषोत्तम रुपाला भी लगभग 15 मिनटों तक बोले, मगर मुख्यमंत्री और अमित शाह को अपने भाषणों को चार से पांच मिनट के भीतर ही समेटना पड़ा क्योंकि सभा से 'जय सरदार, जय पाटीदार' के नारे लगने शुरू हो गए और कुर्सियां भी तोड़ी जाने लगीं.
राजनीतिक मामलों के जानकार अच्युत याग्निक को लगता है कि इस सभा के दौरान पूर्व मुख्यमंत्री आनंदीबेन पटेल और अमित शाह के बीच की दूरी भी साफ़ तौर पर सामने आ गयी.

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याग्निक कहते हैं : "अमित शाह ने उसी को मुख्यमंत्री बनाना बेहतर समझा जो उनके क़रीब है इसलिए विजय रूपाणी अचानक नितिन पटेल को पिछाड़ते हुए मुख्यमंत्री घोषित कर दिए गए. भाजपा ने सोचा कि हार्दिक पटेल के आंदोलन और आनंदीबेन पटेल के हटाये जाने के बाद किसी पटेल को मुख्यमंत्री नहीं बनने के बाद पाटीदार समाज के ज़ख्मों पर महरहम लगाए जाएँ. इसलिए उन्होंने सूरत के कुछ उद्योगपतियों को साथ लेकर इस तरह की सभा की. मगर पाटीदार समाज के युवा वर्ग ने अपनी नाराज़गी साफ़ तौर पर ज़ाहिर कर दी."
याग्निक कहते हैं कि सौराष्ट्र के पाटीदार भी भाजपा से नाराज़ चल रहे हैं.
कुछ अन्य जानकारों को लगता है कि अमित शाह के काम करने का यह अपना तरीका है.
वो कहते हैं कि भारतीय जनता पार्टी के बड़े नेताओं को लगा कि मुख्यमंत्रियों के चयन में जो 'फार्मूला' उन्होंने हरियाणा और झारखंड में अपनाया, वो गुजरात में भी सफल रहेगा.

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मगर उनकी आशंका है कि गुजरात में यह फार्मूला कहीं संगठन के 'गले की हड्डी' ना बन जाए.
मगर भारतीय जनता पार्टी ने सूरत की जनसभा में हुए हंगामे को 'कांग्रेस और आम आदमी पार्टी की साज़िश' बताया है.
गुजरात में संगठन के प्रवक्ता भरतभाई पंड्या ने बीबीसी से बात करते हुए कहा कि पहले ही इन दोनों संगठनों ने पहले ही जनसभा को प्रभावित करने की घोषणा कर दी थी.

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वो कहते हैं: "चंद लोगों ने ही हंगामा किया है. बाक़ी सब शांति से नेताओं को सुन रहे थे. पुलिस ने भी काफी संयम बरता और एक घंटे तक हंगामा करने वालों के साथ कोई सख्ती नहीं की गयी."
वहीं महेसाणा से पार्टी के विधायक और संगठन में राज्य कार्यकारिणी के सदस्य रजनीभाई पटेल कहते हैं कि ऐसा कहना ग़लत होगा कि भाजपा ने पटेल समाज को दरकिनार कर दिया है.
वो कहते हैं कि उपमुख्यमंत्री के अलावा संगठन के राज्य अध्यक्ष भी पटेल समाज से ही हैं.

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गुजरात में पटेलों का राजनीतिक दबदबा हमेशा से ही रहा जिस वजह से कांग्रेस और भारतीय जनता पार्टी राज्य की सत्ता पर क़ाबिज़ होते रहे हैं.
वर्ष 1960 में गुजरात के अलग राज्य बनने के बाद से यहाँ की राजनीति में पटेल ही हावी रहे और ज़्यादातर मुख्यमंत्री भी इसी समाज से रहे.
चाहे वो चिमनभाई पटेल हों जो दो बार मुख्यमंत्री रहे या फिर बाबूभाई जसभाई पटेल हों, जो आपातकाल के दौरान मुख्यमंत्री थे. केशूभाई पटेल या फिर आनंदीबेन पटेल भी इसी कड़ी के हिस्से थे.
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