झुग्गी के बच्चों को संगीत सीखा रहे हैं रहमान

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- Author, वैंकटेश पेरुमल
- पदनाम, चेन्नई से बीबीसी हिंदी डॉट कॉम के लिए
भारत की आज़ादी के सत्तर साल पूरे होने पर इस साल दिग्गज संगीतकार एआर रहमान को संयुक्त राष्ट्र संघ में एमएस सुब्बालक्ष्मी को संगीतपूर्ण श्रद्धांजलि देने के लिए बुलाया गया था.
एआर रहमान ने संयुक्त राष्ट्र के उसी हॉल में परफॉर्मेंस दिया है जिसमें एमएस सुब्बालक्ष्मी ने आज से पचास साल पहले तब के महासचिव के आमंत्रण पर दिया था.
एआर रहमान ने यह परफॉर्मेंस सनशाइन ऑर्केस्ट्रा के अपने शिष्यों के साथ दिया. सनशाइन ऑर्केस्ट्रा की स्थापना एआर रहमान ने की है.
उनके जिन ग्यारह शिष्यों ने संयुक्त राष्ट्र में परफॉर्मेंस दिया है, उनके लिए यह किसी सपने के साकार होने से भी अधिक पाने जैसा है.
एआर रहमान ने समाज से जो लिया है उसे वापस समाज में लौटाने के मक़सद से सनशाइन ऑर्केस्ट्रा की शुरुआत की है.

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उन्होंने सरकारी स्कूल से ग़रीब पृष्ठभूमि वाले इन बच्चों को चुना और उन्हें पश्चिमी संगीत सिखाना शुरू किया.
वो भारत में सिम्फनी ऑर्केस्ट्रा की तर्ज़ पर इसे बनाना चाहते थे. उनका कहना है कि तार वाले म्यूज़िक इंस्ट्रुमेंट बजाना कठिन होता है इसलिए वो चाहते थे कि ये बच्चे इस पर पूरी तरह से महारत हासिल करें.
यह बात आठ साल पहले की थी. अब ये बच्चे बख़ूबी परफॉर्मेंस दे रहे हैं और वो भी इतने बड़े मंच पर.
पचास साल पहले संयुक्त राष्ट्र के हॉल में परफॉर्मेंस देने वाली सुब्बालक्ष्मी अकेली शख़्स थीं.
ऑर्केस्ट्रा के ज़्यादातर बच्चे ग़रीब और वंचित तबक़े से हैं. ये धोबी, चाय वाले, घरों में काम करने वाले नौकर और दर्ज़ी के बच्चे हैं.

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इनमें से सभी अपने परिवार के पहले ऐसे सदस्य हैं जिन्होंने संगीत सीखा है. इसलिए सनशाइन ऑर्केस्ट्रा में शामिल होने से पहले उन्होंने सिर्फ़ वायलिन ही देखा था.
वायला, सेलो और डबल बास जैसे म्यूज़िक इंस्ट्रुमेंट से तो वो पूरी तरह से अनजान थे.
लेकिन अब उन्हें सिम्फनी ऑर्केस्ट्रा में महारत हासिल हो चुका है और वे अब सिम्फनी पर कर्नाटक संगीत में दक्षता प्राप्त कर रहे हैं.
वे अब राजगोपालाचारी का लिखा वो गाना सिख रहे हैं जो सुब्बालक्ष्मी ने संयुक्त राष्ट्र में गाया था.

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पिछले 28 साल से श्रीनिवास मूर्ति, एआर रहमान की टीम के साथ जुड़े हुए हैं और पिछले साढ़े छह साल से सनशाइन ऑर्केस्ट्रा में बच्चों को संगीत सिखा रहे हैं.
उनका कहना, "हमने ग़रीब और वंचित तबक़े के बच्चों को स्कूल से चुना. हम उन्हें एक अच्छा और पेशेवर संगीतकार बनाना चाहते हैं. उन्हें संगीत सिखाकर उनका सामाजिक उत्थान करना चाहते हैं. हर कोई रचनाकार होता है. जरूरत है जो वे सोचते हैं उसे बाहर ले आना और यही हमारी कोशिश है."
ऑर्केस्ट्रा में संगीत सीख रहे एन बालाजी एक धोबी के लड़के हैं और एक छोटे से कमरे में अपने परिवार के साथ रहते हैं.
उन्होंने ऑर्केस्ट्रा में सेलो बजाने में महारत हासिल की है. उन्होंने ऑर्केस्ट्रा में आने से पहले कभी यह वाद्य यंत्र देखा भी नहीं था.
उन्होंने हाईस्कूल में 500 में से 491 अंक हासिल किए थे और बारहवीं की परीक्षा में 1200 में से 1163 अंक हासिल किए थे. लेकिन रहमान के ऑर्केस्ट्रा में शामिल होने का फ़ैसला इससे कहीं बढ़कर था.

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बालाजी का कहना है, "यहां आने से पहले मैं सिर्फ़ वायलिन के बारे में जानता था. इसलिए जब उन्होंने मुझे चुना तो मैं इसे सीखना चाहता था लेकिन यहां सिर्फ़ वायला, सेलो और डबल बास ही उपलब्ध था. मैं चूंकि सेलो की मदद से बनाए गए हॉलीवुड फ़िल्म 'पाइरेट्स ऑफ़ कैरीबियन' के बैकग्राउंड म्यूज़िक को पसंद करता था, इसलिए सेलो सीखने का फ़ैसला किया."
वो हर दिन अपने घर से पैदल सेलो सीखने के लिए अपनी झुग्गी से गुजरते हुए रहमान के म्यूज़िक स्कूल 'के एम कंजर्वेटरी' तक पहुंचते थे.
एन बालाजी जब कभी भी घर पर होते तो वे वायलिन का अभ्यास भी करते और इस तरह से उन्होंने वायलिन बजाना भी सीख लिया.
उनके लिए संगीत सिर्फ़ समर्पण का विषय नहीं बल्कि जीवन जीने का ज़रिया है. पिछले छह सालों से वो सनशाइन ऑर्केस्ट्रा के साथ जुड़े हुए हैं.
एआर रहमान ने ऑस्कर अवार्ड जीता है लेकिन उनके लिए सनशाइन ऑर्केस्ट्रा किसी भी अवार्ड से बढ़कर है.
रहमान अपने सनशाइन ऑर्केस्ट्रा के माध्यम से आज जो कर रहे हैं, उसके लिए एक ऑस्कर अवार्ड काफ़ी नहीं होगा.
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