संगीतकार रहमान पर क्यों मचा है हंगामा?

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पैग़ंबर मोहम्मद पर बनी फ़िल्म में संगीत देने के कारण एआर रहमान की आलोचना पर बीबीसी हिंदी के पाठकों ने जमकर प्रतिक्रिया दी है.
ऑस्कर पुरस्कार से सम्मानित रहमान ने माजिद मजीदी की फ़िल्म में संगीत दिया है जिसके बाद मुंबई के एक संगठन रज़ा एकेडमी ने रहमान का विरोध किया था.
सोमवार को रहमान ने फ़ेसबुक के ज़रिए इसका जवाब दिया था.
उन्होंने कहा था कि उन्होंने अच्छी नियत से फ़िल्म संगीत दिया था और उनका मक़सद किसी की भावना को ठेस नहीं पहुंचाना था.
इस बारे में बीबीसी हिंदी के फ़ेसबुक पन्ने पर जमकर बहस हुई है.
ज़्यादातर पाठकों ने एआर रहमान की बात का समर्थन किया है तो कुछ लोगों ने विरोध भी किया है.
रज़ा एकेडमी का रुख़
दरअसल मुसलमानों की मुंबई स्थित एक संस्था रज़ा अकादमी ने एआर रहमान की पैग़ंबर मोहम्मद पर बनी फ़िल्म 'मोहम्मद: मैसेंजर ऑफ़ गॉ़ड' में संगीत देने के कारण आलोचना की थी.
आलोचकों के मुताबिक़ फ़िल्म, इस्लाम की ग़लत छवि पेश करती है.
जिसके बाद रहमान ने फ़ेसबुक पर लिखा था, "मैं इस्लाम का विद्वान नहीं हूं. मैं पश्चिम और पूर्वी संस्कृति दोनों को जीता हूं और सभी लोगों को जैसे वो हैं, वैसे ही प्यार करता हूं."
उन्होंने ये भी लिखा था कि भारत में पूरी धार्मिक आज़ादी है.
प्रतिक्रिया

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बीबीस हिंदी के फ़ेसबुक पन्ने पर भानु प्रताप लिखते हैं, "ये फ़िल्म ईरान में बनी है जो मुस्लिम देश है. जब उन्हें कोई समस्या नहीं है तो यहां क्यों हंगामा मचाया जा रहा है. हम रहमान से सहमत हैं."
बीबीसी के पाठक प्रकाश भारती ने लिखा, "भारत में पूरी धार्मिक आज़ादी है. लेकिन धर्म से जुड़े कुछ लोग इसका ग़लत फ़ायदा उठाते हैं."
सुधीर कुमार राणा ने लिखा, "ये दिखाता है कि एक महान संगीतकार होने के साथ-साथ रहमान एक महान सोच भी रखते हैं."
मोहम्मद शकील ने लिखा, "वाक़ई भारत में पूरी आज़ादी है."
तो इरफ़ान ने लिखा, "रहमान को संगीतकार होने के नाते पूरी आज़ादी है कि वो किस फ़िल्म का संगीत दें, किसका नहीं. उनकी इस मुद्दे पर आलोचना बेकार है."
सैय्यद कामरान ने भी रहमान के आलोचकों की आलोचना की और लिखा, "रहमान साहब आप बिलकुल ठीक कह रहे हैं. लेकिन धर्म के नाम पर लोगों को लड़ाने वाले लोग इस देश पर धब्बा हैं."
मीनाक्षी बिष्ट कहती हैं, "पहले मुझे लगता था कि भारत में लोगों को धार्मिक आज़ादी नहीं है लेकिन अब दूसरे देशों के हालात देखकर लगता है कि भारत कई देशों से बहुत बेहतर है."
असहमत

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लेकिन कई लोग रहमान की बातों से सहमत नज़र नहीं आए. सरफ़राज़ लिखते हैं, "कैसी आज़ादी? कहां की आज़ादी? बकवास बात है. लेकिन ऐसा कहना रहमान की मजबूरी है."
केतु डोडिया तंज़ कसते हुए लिखते हैं, "मीट बैन करना महान आज़ादी है. कौन सा खाना कब खाना, ये टाइम टेबल लगाना आज़ादी है."
जसीम अंसारी लिखते हैं, "कोई आज़ादी नहीं है. छोटी-छोटी बातों पर लोग आलोचना करते रहते हैं. हिंदू-मुसलमानों को लड़ाते रहते हैं."
ननमुन मोहम्मद कहते हैं, "आज़ादी का मतलब इसका ग़लत इस्तेमाल करना नहीं है. रहमान ने ठीक नहीं किया."
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