हर बाढ़ में हफ़्तों टापू बना रहता है यह गांव

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- Author, समीरात्मज मिश्र
- पदनाम, इलाहाबाद से बीबीसी हिंदी डॉट कॉम के लिए
इलाहाबाद के झूंसी इलाक़े में एक गांव है बदरा-सोनौटी. गंगा के किनारे स्थित यह गांव यूं तो ऊंचाई पर बसा है, लेकिन इसके आस-पास की ज़मीन और सड़कें ज़रा सी बाढ़ में ही लोगों को धोखा दे जाती हैं और पानी में डूब जाती हैं.
क़रीब पांच हज़ार की आबादी वाला यह गांव इस वजह से बरसात के दिनों में मुख्य धारा से पूरी तरह कटा रहता है. लोगों के आवागमन का एकमात्र साधन नावें ही होती हैं.
सड़क किनारे लगी एक बड़ी नाव पर सवार होने के लिए साइकिलों और मोटर साइकिलों से लोग आते हैं, अपने वाहन कुछ दूर खड़ी करते हैं और फिर नाव पर सवार होकर गांव और घर की ओर चल पड़ते हैं.
नाव में सवार होने पर पता चला कि दो तीन मंज़िलों के मकानों की सिर्फ़ ऊपरी छत दिख रही है और पेड़ों के ऊपरी हिस्से. बाढ़ की विकरालता का अंदाज़ा इस बात से लगाया जा सकता है कि बिजले के ऊंचे- ऊंचे खंभों का सिर्फ़ ऊपरी हिस्सा दिख रहा है और इनके बीच बँधे तारों के साथ-साथ ही पानी में नाव चल रही है.

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नाव में सवार गांव वालों ने बताया कि ऐसा उनके यहां हर दूसरे-तीसरे साल होता है क्योंकि ज़रा सा पानी बढ़ा नहीं कि सड़क डूब जाती हैं और रास्ता बंद हो जाता है.
नाव में सवार कमला नाम की महिला का बच्चा बीमार था. क़रीब दो साल के अपने बच्चे को डॉक्टर को दिखाने के लिए वो झूंसी क़स्बे में आई थीं और इसके लिए उन्हें अपना आधा दिन क़ुर्बान कर देना पड़ा.
कमला बताती हैं कि गांव में न तो कोई डॉक्टर है और न ही कोई अस्पताल. सामान्य दिनों में तो इतनी दूरी नहीं खलती, लेकिन बाढ़ के समय काफ़ी दिक़्क़तें होती हैं.
बाढ़ के कारण प्रशासन ने यहां के लिए दो डॉक्टरों की तैनाती कर रखी है जिनकी ड्यूटी नियमित रूप से गांव वालों पर नज़र रखने की है ताकि आपात स्थिति में किसी को भी इलाज मुहैया कराया जा सके.
लेकिन गांव वालों का कहना है कि डॉक्टर गांव के अंदर कभी नहीं आते. हां, गांव के बाहर कुछ देर के लिए आकर अपनी ड्यूटी निभा जाते हैं.

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गांव के प्रधान संजय यादव बताते हैं कि पिछले क़रीब दो हफ़्ते से पूरा गांव अँधेरे में है. बिजली की सुविधा होने के बावज़ूद बिजली काट दी गई है. उनका कहना है कि हर बार बाढ़ के समय बिजली काट दी जाती है, लेकिन बिजली का बिल देना पड़ता है.
संजय यादव कहत हैं कि इस समस्या को प्रशासन से लेकर जनप्रतिनिधियों तक सबके सामने बार बार रखा जाता है, लेकिन आश्वासन छोड़ कुछ नहीं मिलता.
लोगों की मांग है कि यदि यहां पर एक छोटा सा पुल बना दिया जाए तो इस समस्या से छुटकारा पाया जा सकता है.
समस्या में डूबे गांव वालों ने एक दिन पहले अपना ग़ुस्सा राहत सामग्री बाँटने आए ज़िलाधिकारी पर भी उतारा और राहत लेने से मना कर दिया. इन लोगों ने ज़िलाधिकारी संजय कुमार की टीम को यह कहकर वापस भेज दिया कि उन्हें पहले रास्ते की ज़रूरत है, राहत सामग्री की बाद में.

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इलाहाबाद में सेना के तीन हेलिकॉप्टरों का राहत सामग्री बँटवाने में इस्तेमाल किया जा रहा है. ये हेलिकॉप्टर शहर और गांवों में राहत सामग्री पहुंचा रहे हैं.
हालांकि प्रशासन के इस क़दम की जमकर आलोचना भी हो रही है. बाढ़ प्रभावित इलाकों के लोगों का कहना है कि कुछ हज़ार रुपयों की राहत सामग्री बाँटने के लिए प्रशासन के लोग लाखों रुपए हेलिकॉप्टर पर ख़र्च कर रहे हैं, जबकि राहत सामग्री नावों से भी आसानी से पहुंचाई जा सकती है.
वहीं हँडिया तहसील के बाढ़ प्रभावित इलाकों में जब हेलिकॉप्टर से राहत पैकेट नीचे फेंके गए तो उसे पाने के लिए भगदड़-सी मच गई.
प्रशासन का दावा है कि राहत पैकेट में खाने-पीने के सामान के अलावा ज़रूरी दवाइयां भी दी जा रही हैं, जबकि बाढ़ग्रस्त इलाकों के लोगों का कहना है कि महज़ कुछ लोगों को लाई-चना या फिर पूरी-सब्ज़ी मिल पा रही है बाक़ी लोग अपनी तरफ़ से या निजी संगठनों की ओर से चलाए जा रहे राहत कार्यों से मदद पा रहे हैं.
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