गोंडा में बारिश बंद लेकिन हालात ख़राब

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- Author, समीरात्मज मिश्रा
- पदनाम, लखनऊ से बीबीसी हिंदी के लिए
बाढ़ का दंश झेल रहे गोंडा ज़िले के कई गांवों में बारिश रुकने और घाघरा का जलस्तर कुछ कम होने के बावजूद लोग अब भी अपने घरों को लौट नहीं पा रहे हैं.
गोंडा की करनैलगंज तहसील में घाघरा के तट पर बना एल्गिन चरसडी बांध गत आठ अगस्त की रात नदी में अचानक बढ़े जलस्तर के कारण टूट गया था जिससे कई गांव पानी में डूब गए थे.

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क़रीब दो हफ़्ते बीतने के बाद अब प्रशासन का दावा है कि लोग अपने घरों को लौट आए हैं लेकिन बड़ी संख्या में लोग अभी भी प्लास्टिक (बरसाती) के बने अस्थाई शिविरों में रहने को मजबूर हैं.
तटबंध टूटने के बाद घाघरा का पानी करनैलगंज क्षेत्र के क़रीब बीस गांवों और छह सौ मजरों यानी छोटे गांवों तक पहुंच गया और हज़ारों की संख्या में लोग एक झटके में बेघर हो गए. यहां तक कि पड़ोसी ज़िले बाराबंकी के भी कई गांव इसकी चपेट में आ गए.

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पिछले तीन चार दिनों से बरसात नहीं हो रही है इसलिए घाघरा का पानी कुछ कम हुआ है. प्रशासन ने गांवों के भीतर घुसे पानी को निकालने की कोशिश की और काफ़ी हद तक पानी निकाल भी दिया गया है लेकिन कुछ घर अभी भी पानी में डूबे हैं.
जो नहीं भी डूबे हैं वो रहने लायक़ नहीं हैं क्योंकि न सिर्फ़ आस-पास अभी कीचड़ है बल्कि तमाम तरह की बीमारी फैलने की भी आशंका है.
बड़ी संख्या में अभी भी लोग तटबंध के ऊपर बने टूटे फूटे तंबुओं में रह रहे हैं. लोगों की शिकायत है कि इनकी खोज ख़बर लेने कोई नहीं आ रहा है लेकिन गोंडा के ज़िलाधिकारी आशुतोष निरंजन ये नहीं मानते.

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बीबीसी से बातचीत में उन्होंने दावा किया कि लोगों को बराबर राहत सामग्री बाँटी जा रही है. आशुतोष निरंजन इस बात पर भी आश्चर्य जताते हैं कि लोग अपने घरों को क्यों नहीं लौट रहे हैं जबकि घर लौटने लायक़ हो गए हैं.
लेकिन लोगों का कहना है कि पूरे के पूरे गांव में या तो पानी है या कीचड़ और तमाम कीड़े मकोड़े भी वहां हैं, बीमारी का ख़तरा अलग. ऐसे में लोग वहां से दूर रहने में ही भलाई समझ रहे हैं.
वहीं प्रशासन के इस दावे पर भी सवाल उठे कि राहत सामग्री अभी भी बांटी जा रही है. करनैलगंज से चरसडी की दूरी क़रीब दस किलोमीटर है और ये दूरी तय करने में हमें क़रीब दो घंटे लगे, लेकिन इस दौरान हमें पूरे रास्ते कोई ऐसा व्यक्ति नहीं मिला जो कि किसी स्तर पर राहत कार्य से जुड़ा हो.

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दूसरी ओर एल्गिन चरसडी तटबंध के टूटने पर भी कई सवाल उठ रहे हैं. तकनीकी विशेषज्ञों, प्रशासन के आला अधिकारियों और स्थानीय लोगों के देखते देखते यह एक झटके में टूट गया, लेकिन इसकी मरम्मत पर ही पिछले कुछ सालों में सरकार करोड़ों रुपये ख़र्च कर चुकी है.
स्थानीय लोगों का कहना है कि समय रहते यदि कोशिश की जाती तो इसे बचाया जा सकता था. डीएम आशुतोष निरंजन इस सवाल से पल्ला झाड़ लेते हैं और कहते हैं इसका रखरखाव सिंचाई विभाग का काम है.
बहरहाल, तंबुओं में रह रहे लोग घाघरा नदी के प्रकोप के आगे सरकारी राहत और अपने घरों में लौटने का इंतज़ार कर रहे हैं. पानी में डूबी गन्ने और धान की फ़सलें आज भले ही तबाही का मंज़र पेश कर रही हों लेकिन इन्हीं लहलहाती फ़सलों से यहां की समृद्धि और ख़ुशहाली के अतीत का भी पता चल रहा है.
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