वो पांच कदम जो भारत को पदक दिला सकते हैं

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- Author, ज़ुबैर अहमद
- पदनाम, बीबीसी संवाददाता, दिल्ली
रियो ओलंपिक खेलों में भारत को केवल दो पदक मिले. अभिनव बिंद्रा और दीपा कर्मकार चौथे नंबर पर आने की वजह से पदक हासिल करने से रह गए.
भारतीय खिलाड़ी टेनिस के मिक्स्ड डबल्स में सेमी-फाइनल और तीरंदाजी में क्वार्टर-फाइनल तक पहुँचने में सफल रहे.
हॉकी में भी प्रदर्शन बुरा नहीं रहा.
अगले ओलंपिक खेल चार साल बाद जापान में होंगे. क्या जापान में भारत का प्रदर्शन रियो से बेहतर होगा ?

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चीन की आबादी भारत से थोड़ी ही अधिक है लेकिन रियो में चीन पदक तालिका में अमरीका के बाद दूसरे नंबर पर रहा.
चीन की प्रगति सराहनीय है क्योंकि उसे पहला ओलंपिक पदक 1984 के लॉस एंजिलस खेलों में मिला था.
भारत को ऐसे पांच कौन से क़दम उठाने चाहिए कि उसकी चीन से बराबरी न सही कम से कम पदक तालिका बेहतर हो पाए.
कुछ समय पहले 2008 के स्वर्ण पदक विजेता अभिनव बिंद्रा ने ट्वीट करके कहा कि टीम जीबी के हर पदक के पीछे 50 लाख पौंड स्टर्लिंग का निवेश होता है.
उन्होंने भारत को पदक जीतने से पहले खेलों में ढेर सारे पैसे निवेश करने की सलाह दी.

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अभिनव बिंद्रा टीम जीबी के बारे में सोलह आने सही हैं.
ब्रिटिश सरकार नेशनल लाटरी के ज़रिये बहुत पैसे कमाती है.
इस कमाई का एक बड़ा हिस्सा खेलों को बढ़ावा देने पर खर्च किया जाता है.
सरकार 18 साल की एक योजना के तहत लाटरी की कमाई खेलों में झोंक रही है.नतीजा सब के सामने है.
भारत सरकार भी स्पोर्ट्स अथॉरिटी ऑफ़ इंडिया को पैसे देती है ताकि खेलों को बढ़ावा मिले. लेकिन ये पैसे न केवल कम हैं बल्कि सिस्टम में भ्रष्टाचार के कारण पूरे पैसे खेलों में खर्च भी नहीं हो पाते हैं.

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केवल ढेर सारे पैसों का निवेश काफी नहीं होगा. पदक का लक्ष्य तय करना होगा और इसकी ज़वाबदेही भी तय करनी पड़ेगी.
जैसे डॉक्टर और इंजीनियर बनने के लिए युवा और उनके परिवार वाले पूरी ताक़त लगा देते हैं वैसे ही खेलों को भी अगर वो करियर की तरह देखें तो देश में खेल संस्कृति पैदा होगी.
खेलों को बड़ी कंपनियों की अधिक स्पॉन्सरशिप मिल सकेगी. अगर टारगेट 2020 या 2024 में कुछ खेलों में स्वर्ण पदक हासिल करना है तो काम अभी से शुरू करना होगा.

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अगर क्रिकेट ओलंपिक खेलों में शामिल होता तो भारत को स्वर्ण पदक मिल सकता था. लेकिन क्रिकेट एक टीम स्पोर्ट है.
ये आपको केवल एक ही पदक दिला सकता है. इसके बावजूद पूरा देश क्रिकेट का दीवाना है.
अगर ओलंपिक में पदक हासिल करना है तो ये दीवानगी थोड़ी कम करनी पड़ेगी.
खेलों के कई विशेषज्ञ कहते हैं कि भारतीय खिलाड़ियों में कुछ कर दिखाने की प्रवृति नहीं दिखाई देती.
जीत की मानसिकता और किलर स्टिंक्ट के कारण चौथे स्थान पाने वाले खिलाड़ी तीसरे नंबर पर आ सकते हैं और पदक तालिका बढ़ाई जा सकती है.
यह मानसिकता पैदा करने के लिए यूरोप और अमरीका में अलग से प्रोग्राम चलाये जाते हैं.

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अगरतला में दीपा कर्मकार को हासिल सुविधाएं अफ़सोसनाक हैं. अगर ये सुविधाएँ अन्तरराष्ट्रीय स्तर की होती तो शायद दीपा आज एक पदक लेकर देश वापस लौटती.
ये सभी जानते हैं कि भारत में खेलों की सुविधाएं बहुत कम हैं. लेकिन ओलंपिक खेलों के बाद इस पर चर्चा तक नहीं होती.
क्या आपको मालूम है कि 2024 ओलंपिक खेलों को आयोजित करने की भारत में सलाहियत क्यों नहीं है ?
क्योंकि यहाँ ओलंपिक स्तर की सुविधाएं नहीं हैं.
भारत को अगर ओलंपिक की महिमा चाहिए तो सुविधाओं में इज़ाफ़ा करना होगा.
इसके इलावा अच्छे कोच, अच्छी ख़ुराक और अच्छी वर्ज़िश पर भी ध्यान देना होगा.
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