मैं अच्छी भी हूँ, बुरी भी : इरोम शर्मिला

जेल से रिहा होने के बाद पत्रकारों से बात करतीं इरोम शर्मिला.

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"मैं और लोगों की तरह सामान्य हूँ, मैं कोई संत महात्मा नहीं हूँ. मैं अच्छी भी हूँ, बुरी भी. क्या मुझमें कमियाँ नहीं हो सकती ? मुझमें बहुत कमियाँ हैं. लोग क्यों मुझे संत बनाकर रखे हुए हैं. लोग मुझे बस अपनी ही नज़रों देखना चाहते हैं. मैं इस तरह की ज़िंदगी से तंग आ चुकी हूं "

"लोग अगर चाहते हैं कि उनकी ख़्वाहिशें मेरे ख़ून से ही धुलें, तो मैं इसके लिए तैयार हूँ...गांधीजी की तरह"

ये कहते कहते इरोम शर्मिला की आँखें नम हो जाती हैं.

जेल से छूटने के बाद इंफ़ाल में बुधवार सुबह बीबीसी को दिए विशेष इंटरव्यू में इरोम शर्मिला ने ये बातें कहीं. ये मीडिया को दिया उनका पहला इंटरव्यू था.

इरोम ने कहा, "मुझे लगता है कि लोगों को एक शहीद की तलाश है,- उन्हें शायद मेरी विजयी रूप नहीं चाहिए बल्कि एक शहीद चाहिए. कई लोग अब भी मेरे रास्ता बदलने से इत्तेफ़ाक नहीं रखते."

जेल से रिहा होने के बाद इरोम शर्मिला.

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ये पूछने पर कि 16 साल नज़बरंद होकर रहना कितना मुश्किल था इरोम ने कहा, "मुझे बहुत ज़्यादा अलग- थलग महसूस होता था. आख़िर गांधीजी ने जब आज़ादी की लड़ाई लड़ी तो वे लोगों के साथ जुड़े रहे. मैं हमेशा से लोगों से कटी हुई थी, जैसे मैं कोई अपराधी थी. मैं ऐसे हालात में भी थी जो मुझे बर्दाश्त नहीं. मेरी बातों को तोड़ मरोड़कर पेश किया गया."

इरोम ने कहा कि जब लोग उन्हें धोखा देते हैं तो मैं चुप चाप नहीं बैठी रह सकती और अगर वो आज़ाद रहेंगी तो लोग ऐसा नहीं कर पाएँगे.

राजनीति पर इरोम का कहना था, "अगर लोग वोट की इज़्ज़त करेंगे तो राजनीति से गंदगी निकल जाएगी. राजनीति में गंदगी लोगों की सोच से भी जुड़ी हुई है. लेकिन अगर मेंरे हाथ में शक्ति नहीं है तो कौन मेरी आवाज़ सुनेगा. मैं कब से झेल रही हूँ."

जेल से रिहा होने के बाद इरोम शर्मिला.

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अपनी आज़ादी के सवाल पर इरोम ने दू टूक कहा, "मुझे आज़ादी का हक़ है, एक आज़ाद परिंदे की तरह. मैं कोई बाउंडरी नहीं चाहती, जहाँ जाना चाहूँ जाऊँ, एक परिंदे की तरह इस डाल से उस डाल पर. ये जात-पात, धर्म की सीमाओं से परे.''

इरोम ने कहा कि गांधी के देश में हिंसा देखकर वे बहुत दुखी होती हैं और दिलों को दिलों से जोड़ना चाहती हूँ.

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