शीला दीक्षित दोबारा..'पी' फ़ैक्टर से मदद होगी?

शीला दीक्षित और सोनिया गांधी

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    • Author, रशीद किदवई
    • पदनाम, राजनीतिक विश्लेषक, बीबीसी हिंदी डॉट कॉम के लिए

वो 1998 का दौर था, और प्रधानमंत्री अटल बिहारी वाजपेयी का करियर पूरे शबाब पर था. ये वही समय था जब सोनिया गांधी ने कांग्रेस अध्यक्ष का कार्यभार संभाला था.

इससे ठीक पहले जिस तरह सीताराम केसरी को पार्टी अध्यक्ष पद से हटाया गया था उससे कांग्रेस में विरोध के कुछ स्वर ज़रूर उठने लगे थे.

उसी साल आम चुनावों में कांग्रेस का प्रदर्शन बेहद निराशाजनक रहा था. आपातकाल के बाद 1977 आम चुनावों में भी इससे ज्यादा सीटें कांग्रेस को मिली थीं.

सोनिया खुद को साबित करने और पार्टी का भरोसा जीतने के भरसक प्रयास में जुटी थीं. दिल्ली, उत्तर प्रदेश और राजस्थान में विधानसभा चुनाव नज़दीक थे.

सोनिया गांधी

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दिल्ली कांग्रस में ख़ासतौर पर फूट साफ़ दिख रहा था. पार्टी बूढ़े हो चले एचकेएल भगत के समर्थक और विरोधियों में बंटी हुई थी.

1984 सिख दंगों के कारण दिल्ली का सिख समुदाय सज्जन कुमार और जगदीश टाइटलर का विरोध कर रहा था और इसलिए उन्हें पार्टी का चेहरा नहीं बनाया जा सकता था.

इंदिरा गांधी मेमोरियल ट्रस्ट की बैठक थी जिसमें पहली बार शीला दीक्षित 10 जनपथ पहुंचीं और तभी प्रियंका गांधी को विचार आया "शीला फॉर दिल्ली".

सोनिया को भी ये प्रस्ताव अच्छा लगा, लेकिन शीला दीक्षित को इसके लिए तैयार करने में नटवर सिंह को ख़ासी मेहनत करनी पड़ी. बाकी इतिहास है...

प्याज़ के बढ़ते दामों के बीच शीला ने दिल्ली में सोनिया के लिए काम करके दिखाया.

इस फ़ैसले पर सुषमा स्वराज और वाजपेयी से ज्यादा कुछ कांग्रेसी हैरान हुए. ये एचकेएल भगत और कांग्रेस का वो गुट था जिसने कांग्रेस को बर्बाद करने में कोई कसर नहीं छोड़ी थी.

शीला की सच्चाई, मध्यम वर्गीय लोगों में पकड़, सादगी और उनकी दिल्ली के लिए बड़ी योजनाओं की वीज़न - बड़े फ्लाईओवर, मेट्रो, मॉल्स और पार्कों ने उन्हेंने सभी दिक्कतों से पार पाने में मदद की.

हालांकि 2016 में शीला दीक्षित को 1998 से भी ज्यादा बड़ी चुनौतियों का सामना करना पड़ेगा.

शीला दीक्षित

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उत्तर प्रदेश, देश का सबसे ज्यादा आबादी वाला राज्य है. वो बुज़ुर्ग हो चुकी हैं. दिल्ली से बिल्कुल उलट यूपी की कांग्रेस इकाई एकदम हतोत्साहित और ठप है.

कांग्रेस का ना केवल एक मज़बूत भाजपा से मुकाबला है, बल्कि एक व्यवस्थित बसपा और सत्तारूढ़ समाजवादी पार्टी से भी उनकी लड़ाई है.

सोनिया का शीला पर विश्वास कोई नई बात नहीं है. मुसीबत की घड़ी में हर बार उन्होंने शीला की तरफ ही देखा है.

2012 में जब प्रणब मुखर्जी राष्ट्रपति बन गए और पी चिदांबरम को वित्त मंत्रालय दिया गया, सोनिया चाहती थीं कि शीला देश की गृह मंत्री बनें.

लेकिन ऐसा कहा जाता है कि शीला दीक्षित ने इस प्रस्ताव को अस्वीकार कर दिया था.

ऐसा भी कहा जाता है कि उन्हें उम्मीद थी कि वो रिकॉर्ड चौथी बार 2013 के दिल्ली चुनावों में जीत हासिल करेंगी.

प्रियंका गांधी

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उनका कहना था, "कौन जाए दिल्ली की गलियां छोड़कर."

लेकिन उनका गणित पूरी तरह फेल हो गया जब शीला को अरविंद केजरीवाल से हार का सामना करना पड़ा.

गृह मंत्री भी न बनीं, और यहां तक कि वो पूरी तरह से दिल्ली की राजनीति से बाहर हो गईं.

वर्ष 1998 में प्रियंका गांधी ने उनमें एक भावी विजेता को देखा था. 2016 में एक बार फिर एक 'पी' फैक्टर उनकी मदद कर रहा है.

ये राजनीतिक सलाहकार प्रशांत किशोर के दिमाग की उपज है कि उत्तर प्रदेश की राजनीति में शीला दीक्षित को उतारा जाए.

किशोर के पास ज़रूर इसके पीछे कोई सोच होगी जो ज्यादातर राजनीतिक विश्लेषकों को दिखाई नहीं दे रही है.

लेकिन जो बात तारीफ़ करने लायक है, वो ये कि 78 साल की उम्र में भी शीला में कुछ कर दिखाने की इच्छा बाकी है.

वो भारतीय राजनीति की एवरग्रीन देव आनंद हैं, इसलिए शीला दीक्षित दोबारा...

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