कश्मीर: 'रिपोर्टिंग का मतलब गुस्सा सहें, मार खाएं'

कश्मीर हिंसा

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    • Author, रियाज़ मसरूर
    • पदनाम, बीबीसी संवाददाता, श्रीनगर

अपने हाथ में कैमरा रखना या नोटबुक रखना भारत प्रशासित कश्मीर में पहले कभी भी ख़तरनाक़ नहीं रहा.

घाटी में एक चरमपंथी कमांडर बुरहान वानी की मौत के बाद पिछले छह दिन से विरोध-प्रदर्शन हो रहे हैं.

लेकिन इस दौरान क़रीब आधा दर्जन कैमरामैनों को भी चोट आई है.

पत्रकारों को या तो क्रोधित पुलिसकर्मियों के गुस्से का सामना करना पड़ता है या उग्र भीड़ का.

मुझे अपने कुछ सहकर्मियों के साथ दो बार अस्पताल में भर्ती लोगों के परिजनों के गुस्से की वजह से भागना पड़ा है.

श्रीनगर के एसएमएचएस अस्पताल में अपने भाई का इलाज करा रहे 40 साल के एक व्यक्ति ने हमें कहा, "ऐ मिस्टर, कोई रिकॉर्डिंग या शूटिंग नहीं. हम जानते हैं कि आप हमारे घावों को बेच रहे हैं. आप यहां से चले जाओ, वरना आपके लिए ठीक नहीं होगा."

कश्मीर अस्पताल

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इस व्यक्ति के भाई की आंखों में पुलिस के पैलेट्स या छर्रे से गंभीर चोटें आई हैं. पुलिस और अर्धसैनिक बल अक्सर भीड़ पर पैलेट्स का इस्तेमाल करते हैं.

ख़तरे को भांपते हुए जब मैं एसएमएचएस अस्पताल से वापस आ रहा था तो वहां की पगडंडियों पर मैंने एक फ़ोटो जर्नलिस्ट को अपनी आंखों पर पड़े बैगनी निशान को छिपाते देखा.

नाम न छापने की शर्त पर उन्होंने बताया, "वो लोग बहुत क्रोधित हैं. वो आपकी संस्था के बारे में नहीं पूछते हैं. उन्हें भड़काने के लिए प्रेस या मीडिया कहना ही काफी है."

गोली या पैलेट्स लगने की वजह से क़रीब 1500 लोग घायल हुए हैं, जिनका विभिन्न अस्पतालों में इलाज चल रहा है.

एसएमएचएस अस्पताल में 92 लोगों की आंखों का ऑपरेशन हुआ है और डॉक्टरों के मुताबिक इनमें से क़रीब आधे लोगों की आंखों की रोशनी चली गई है.

कश्मीरी लोग मीडिया से इतने नाराज़ क्यों हैं? यही सवाल मैंने थोड़ा शांत दिख रहे जावेद नाम के एक व्यक्ति से पूछा.

उन्होंने कहा, "आप लोग जानते कुछ नहीं हो. उन लोगों ने पहले हमारे जुलूस पर फ़ायर किया. जब हम एंबुलेंस का इंतज़ाम कर घायलों को अस्पताल पहुंचाने की तैयारी कर रहे थे, तो पुलिस और अर्धसैनिक बलों ने एंबुलेंस को रोका, उसे नुक़सान पहुंचाया और उसमें सवार लोगों को पीटा. क्या मीडिया ने यह दिखाया."

कश्मीर विरोध

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जावेद के दो भाइयों का एसएमएचएस अस्पताल में इलाज चल रहा है.

स्वास्थ्य विभाग के अधिकारियों के मुताबिक़ भारतीय सुरक्षाबलों ने कथित तौर पर अस्पताल जा रही क़रीब 50 एंबुलेंसों को नुक़सान पहुंचाया.

डॉक्टर्स एसोसिएशन ऑफ़ कश्मीर के प्रमुख डॉक्टर निसारूल हसन ने कहा कि लोगों को भारतीय मीडिया से विश्वास उठ चुका है.

वो कहते हैं, "वो आमतौर पर टीवी देखते हैं. आप जानते हैं कि किस तरह के कुछ टीवी चैनल घटनाओं को घुमा-फिरा कर दिखा रहे हैं. वे लोग यह नहीं जानते हैं कि कौन क्या है. उनका मानना है कि हर पत्रकार टाइम्स नाऊ, न्यूज़ एक्स या आजतक से है."

लगता है कि लोगों का यह गुस्सा तब और बढ़ गया जब हाल ही में यह दिखाया गया कि 21 साल के चरमपंथी बुरहान वानी का प्रेम संबंध था.

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शूटिंग के लिए जब हमने लड़कों के एक समूह से पूछा तो एक सुर में उन्होंने कहा, "वो खबरें नहीं दिखाते हैं, वो हमारे नेताओं को कलंकित करते हैं."

दूसरी तरफ़ की कहानी की भी एक अजीब विडंबना है. पुलिस का मानना है कि पत्रकार प्रदर्शनकारियों पर लगाम लगाने की जगह उनका महिमामंडन करने में लगे हैं.

जब मैंने एक वरिष्ठ पुलिस अधिकारी से कहा कि पुलिस को अस्पताल के अंदर से रिपोर्टिंग करने की सुविधा देनी चाहिए, तो उनका अलग ही जवाब था.

उन्होंने कहा, "हो सकता है कि आप सहमत न हों. लेकिन यह कैमरामैंन ही असली भड़काने वाले हैं. प्रदर्शनकारी दूर से ही कैमरा देखकर उग्र हो जाते हैं. आप लोगों को नाटकीय तस्वीरें चाहिए और आप लेंस के ज़रिए प्रदर्शनकारियों को भड़काते हैं."

एक वरिष्ठ फ़ोटोग्राफ़र ने बताया कि लगभग हर फ़ोटो जर्नलिस्ट पेशेवर जीवन में एक बार पुलिस या अर्धसैनिक बलों से पिटा ज़रूर है.

फाइल फोटो

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इमेज कैप्शन, 2010 में कश्मीर में पत्रकारों पर हुए हमलों के विरोध में प्रदर्शन (फाइल फोटो)

यह संकट मुझे नौ जुलाई 2010 की याद दिलाता है. कश्मीर इसी तरह के अवरोधों से गुजर रहा था और मृतकों की संख्या बढ़ रही थी.

सरकार ने पत्रकारों से कहा कि कर्फ़्यू पास के लिए सूचना कार्यालय से संपर्क करें, मैं चेकपोस्टों पर सुरक्षा सुनश्चित करने वाली गुलाबी पर्ची लेकर अपने घर से निकला.

मैं अभी मुश्किल से 50 क़दम ही जा पाया था कि सीआरपीएफ़ के दर्जन भर जवानों ने मुझे दबोच लिया और बांस की लाठियां दिखाईं.

इस घटना में मेरी बांह टूट गई. इस साल छह दिन के कर्फ़्यू के दौरान कर्फ़्यू पास का ज़िक्र तक नहीं किया गया.

हालांकि पूरे श्रीनगर के चेकपोस्ट पर तैनात सुरक्षाकर्मी तुलनात्मक रूप से कम उग्र है, लेकिन कोई इस बात को लेकर सुनिश्चित नहीं हो सकता कि उसकी पिटाई नहीं होगी.

ख़बरें जुटाने के ख़तरों के अलावा एक पत्रकार के लिए यहां से खबरों को भेजना भी कठिन काम है.

सड़कों पर अलगाववादी प्रदर्शनों के दौरान अधिकारी इंटरनेट की सेवा बंद कर देते हैं और फ़ोन नेटवर्क में काट-छांट कर देते हैं.

कश्मीर विरोध

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इससे पत्रकार दुविधा में पड़ जाते हैं. यह उस समय निराशाजनक लगता है, जब ख़बरें जुटाने की प्रक्रिया ही बदल जाती है.

हम ट्विटर और वॉट्सएप पर ख़बरे खोजते हैं. प्रशासन जब ई-कर्फ़्यू लगा देता है तो हमारे पास बाहर जाने और लोगों से बातचीत करने और मार खाने का विकल्प ही रह जाता है.

वहां हमें लोगों की नाराज़गी का सामना करना पड़ता है, क्योंकि हो सकता है कि किसी ने ग़लत रिपोर्टिंग की हो.

मैंने सरकार के एक वरिष्ठ मंत्री से कहा कि इंटरनेट और फ़ोन सेवाओं पर पाबंदी से अफवाहें फैलने को बढ़ावा मिलेगा.

इस पर उन्होंने ज़ोर से कहा, "अफवाह हिंसा से बेहतर है."

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