'भारत के मुसलमानों के लिए वेक-अप कॉल'

ढाका

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    • Author, ज़ुबैर अहमद
    • पदनाम, बीबीसी संवाददाता, दिल्ली

ढाका की होली आर्टिसन बेकरी पर दुस्साहसी हमला भारत के लिए वेक-अप कॉल है. बल्कि ये कहें कि भारतीय मुसलमानों की आंखें खोलने के लिए काफ़ी है.

भारत के मुस्लिम समाज के एक ज़िम्मेदार नागरिक की हैसियत से मैं ये कह सकता हूँ कि तथाकथित इस्लामिक स्टेट या आईएस हमारे दरवाज़ों पर अगर अपनी बंदूकों से दस्तक नहीं दे रहा है तो विचारधारा की गुहार ज़रूर लगा रहा है.

भारत के मुस्लिम समाज

मुझे ऐसा लगता है कि भारत का मुस्लिम समाज सपने में रहने का आदी हो चुका है. हम सब ये सोचते हैं कि सरकार तो है ही, पुलिस और खुफ़िया एजेंसियां तो हैं ही. हमें चिंता करने की क्या ज़रूरत है.

हमें जल्द समझ लेना चाहिए कि हमारे पश्चिम में तथाकथित आईएस की पकड़ मज़बूत होती जा रही है. और ढाका के हमले के बाद ये साबित हो गया है कि अब पूर्व में भी तथाकथित आईएस वाली विचारधारा ने जन्म ले लिया है. (बांग्लादेशी सरकार ने ये ज़रूर कहा है कि हमलावर स्थानीय मुस्लिम थे लेकिन तथाकथित आईएस की संस्थापक उपस्थिति ज़रूरी नहीं है, इसकी विचारधारा संगठन से पहले पहुंच जाती है).

अगर हम अब नहीं जागे तो बहुत देर हो जाएगी.

राष्ट्रीय जांच एजेंसी

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पिछले हफ़्ते हैदराबाद में राष्ट्रीय जांच एजेंसी ने कुछ मुस्लिम युवाओं को गिरफ़्तार करके इन्हें तथाकथित आईएस का हिस्सा बताया. हम सब जानते हैं कि इस तरह के सरकारी दावे पहले अदालत में ग़लत साबित हो चुके हैं. लेकिन हैदराबाद वाला दावा अगर सही साबित हुआ तो?

क्या हमें भारत में तथाकथित आईएस की मौजूदगी का ठोस सबूत चाहिए? क्या हम अदालत के फ़ैसलों का इंतज़ार करें? क्या भारत के मुसलमानों के लिए ये काफी नहीं है कि उनके दोनों पड़ोसी देशों में तथाकथित आईएस और इसकी घातक विचारधारा मौजूद है?

तथाकथित आईएस

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इतना कहना काफ़ी नहीं कि इस विचारधारा से बचके रहो, तथाकथित आईएस से होशियार रहो. नहीं, इसका अब समय नहीं रहा.

एक भारतीय मुसलमान की हैसयत से मैं कह सकता हूँ कि तथाकथित आईएस विचारधारा का इसपर दबाव बढ़ रहा है. इंटरनेट गुरु इसका पाठ पढ़ा रहे हैं. व्हाट्स एप्प ग्रुप्स हैं जिनपर जिहादी विचारधारा पनप रही है.

ये ऑनलइन गुरु हिन्दुओं और हिंदुत्व में फ़र्क़ न दिखाकर सीधे-साधे मुस्लिम युवाओं को बहकाने में लगे हैं. आम धार्मिक प्रवचन में हमें ये बताया जा रहा है कि भारत का मुसलमान डरपोक हो चुका है, वो आधा हिन्दू बन चुका है. अपनी ज़बान उर्दू को छोड़ कर हिन्दी बोलने लगा है.

भारत के मुसलमान

यानी भारत के मुसलमान की पहचान ख़तरे में है. शायद इसी लिए अब बुर्क़ापोश महिलाएं पहले से कहीं अधिक नज़र आती हैं. और शायद इसीलिए आज का युवा मुसलमान सिर पर गोल टोपी, कमीज़ लम्बी और ऊंचा पायजामा पहन कर गर्व से बाहर निकल रहा है, कम से कम ग्रामीण इलाकों में हम ऐसे युवाओं को ज़रूर देखते हैं.

ये सच है कि कट्टर इस्लामिक विचारधारा की छाप नज़र आने लगी है. इसका मतलब हरगिज़ ये नहीं कि ये भविष्य के चरमपंथी हैं. कहने का मतलब ये है हम अब तक अल-क़ायदा और तथाकथित इस्लामिक स्टेट के बताए हुए इस्लाम से बचते आए हैं.

हमारा उदाहरण नरेंद्र मोदी ने दुनिया वालों को दिया है. हमारी तारीफ़ बुश और ओबामा ने भी की है. हमें इस बात पर गर्व है कि आतंकी विचारधारा से बचे रहने पर हमारी प्रशंसा दुनिया भर में की गई है.

हिंदुत्व से अगर किसी को शिकायत है या डर है तो ये नहीं भूलना चाहिए कि हम अगर शांति पसंद हैं तो इसमें हमारे समाज का योगदान भी है जो 80 प्रतिशत हिन्दुओं पर आधारित है और जो सदियों से शांतिप्रिय धर्म रहा है.

मुस्लिम समाज

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देश भर में मुस्लिम समुदाय से मिलने-जुलने से ये एहसास होता है कि मुस्लिम समाज में तथाकथित आईएस को लेकर कोई ख़ास चिंता नहीं है. उससे भी बढ़कर इसकी ख़तरनाक विचारधारा के बारे में अधिक जानकारी भी नहीं. उन्हें अक्सर ये भी नहीं मालूम होता कि उनके बच्चे इंटरनेट पर क्या देख रहे हैं, किस धार्मिक गुरु से सीख ले रहे हैं.

भारत के मुसलमान

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जब इसराइल ने 1967 में येरुशलम पर क़ब्ज़ा किया था तो दुनिया भर के मुसलमानों के अलावा भारत के मुसलमानों ने एक साथ, एक समय, कंधे से कंधा मिलाकर क़ब्ज़े के ख़िलाफ़ जुलूस निकाला था. इसी तरह जब अमरीका ने 2003 में इराक़ पर चढ़ाई की थी भारत का मुसलमान सड़कों पर निकल आया था.

भारत के मुसलमान

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कभी भारत के मुसलमानों ने तथाकथित आईएस या जिहादी तत्वों के ख़िलाफ़ पूरे देश में एक साथ शांति मार्च निकालने के बारे में सोचा है?

ज़रा सोचिये, कल्पना कीजिए, कश्मीर से कन्याकुमारी तक और गोवा से असम तक एक साथ हरी झंडी लेकर मुसलमान सड़कों पर शांति मार्च करें तो इसका असर क्या होगा? तथाकथित आईएस विचारधारा दुम दबाकर भागेगी. मुस्लिम समाज की इस कोशिश का असर पड़ोस के देशों पर भी हो सकता है.

अगर ये शांति मार्च संभव नहीं तो कम से कम अपने बच्चों पर कड़ी नज़र रखें. कुछ समय पहले पुणे की एक युवा मुस्लिम लड़की इराक़ जाकर तथाकथित आईएस से जुड़ना चाहती थी. उसके माता-पिता ने पुलिस और ख़ुफ़िया एजेंसियों की मदद ली. एजेंसियों ने 16 वर्षीय लड़की को कट्टरपंथी विचारधारा से बाहर निकालने में कामयाबी हासिल की.

दूसरे मुस्लिम माता-पिता भी ये रास्ता अपना सकते हैं.

भारत के मुसलमान

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मस्जिदों में इमाम तथाकथित आईएस की विचारधारा के ख़िलाफ़ आवाज़ उठा सकते हैं. मुस्लिम बच्चों को एक अच्छा नागरिक बनाने में मदद कर सकते हैं.

विदेश में चरमपंथी मुस्लिम संगठन जिहादियों को भारत भेजने से पहले एक बड़े झूठ का सहारा लेते हैं और वो ये कि 'हिन्दू इंडिया में मुस्लिम पिस रहा है, उसे मज़हबी आज़ादी नहीं, वो मस्जिद नहीं बना सकता, वो क़ुरान नहीं पढ़ सकता.' मुझे खुद दो विदेशी चरमंपथी जिहादियों ने जेल में ये बात बताई है. भारत के मुसलमान ऐसे विदेशियों से सावधान रहें.

सबसे महत्वपूर्ण ये है कि जिहादी विचारधारा की सप्लाई लाइन काट देनी चाहिए और इस पर सभी ज़िम्मेदार मुसलमानों और संगठनों को काम करना चाहिए.

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