इतनी ज़्यादा रोशनी अंधेरे की तरफ़ ले जाएगी

इमेज स्रोत, Thinkstock

    • Author, सोपान जोशी
    • पदनाम, बीबीसी हिन्दी डॉटकॉम के लिए

"तमसो मा ज्योतिर्गमय" जब लिखा गया था तब सूरज डूबने के बाद दिए जलते थे. आकाश जगमगाता रहा होगा तारों और नक्षत्रों से.

मुसाफ़िर और नाविक सितारों के इशारों से अपनी मंजिल तक पहुंच जाते होंगे. अंधकार से प्रकाश की ओर जाना तब उपमा थी असत्य से सत्य की ओर जाने के लिए, मृत्यु से अमरता की ओर भी.

किसे कितना सत्य मिला, कौन अमर हुआ, यह तो जानने वाले ही बता सकते हैं. लेकिन हमारी दुनिया में अंधेरा बहुत कम बचा है. चारों ओर बिजली के चमचमाते प्रकाश ने हमारी दुनिया बदल दी है.

हमारे शहरों में तो अब घुप्प अंधेरा ढूंढ़े नहीं मिलता है, रोशनी की ऐसी बाढ़ आई रहती है. दिल्ली जैसे शहरों में तारे इसलिए नहीं दिखते हैं कि धुंआ ज़्यादा होता है.

अब <link type="page"><caption> वैज्ञानिकों की एक अंतरराष्ट्रीय मंडली</caption><url href="http://advances.sciencemag.org/content/2/6/e1600377.full" platform="highweb"/></link> ने दुनिया भर में प्रकाश प्रदूषण का मानचित्र बनाया है. अंतरिक्ष में तैरते उपग्रहों से लिए चित्रों की सहायता से उन्होंने नाप कर पाया कि दुनिया भर में प्रकाश प्रदूषण इतना बढ़ गया है कि 80 फ़ीसदी लोग इसकी चपेट में हैं.

एक-तिहाई आबादी को आकाशगंगा दिखाई ही नहीं देती है. वैज्ञानिकों के दल का कहना है कि इस चकाचौंध से होने वाली सांस्कृतिक हानि अभूतपूर्व और कल्पना के परे है.

आकाशगंगा अंतरिक्ष का वह हिस्सा है जिसके एक छोटे से हिस्से में हमारा सौर मंडल तैर रहा है. मनुष्य की दुनिया की समझ उसकी कल्पना पर टिकी है. हमारी कल्पना का उदय ही तारों को, आकाशगंगा को देखने से जुड़ा है. सूरज के ढल जाने के बाद टिमटमाते, जगमगाते आकाश को देख कर हमें यह आभास रहा है कि हम एक विशाल सृष्टि का एक भाग हैं.

इमेज स्रोत, Thinkstock

यह भान ही हमें अपने सीमित जीवन और संदर्भों के पार देखने के लिए प्रेरित करता है. यह विश्वास दिलाता है कि हमारे सुख-दुख, हानि-लाभ, राग-द्वेष से कहीं बड़ा यह संसार है. अगर यह कल्पना नहीं होती तो हम अपनी-अपनी सीमित और क्षणिक अनुभूतियों में ही डूबे रहते.

जो बचपन और जो विश्व दर्शन हमारे से पहले की पीढ़ियों को मिला वह हमें आज नहीं मिल सकता. अंधकार के दूर होने से हमारी दुनिया छोटी हो गई है, क्योंकि प्रकाश प्रदूषण हमें उन संदर्भों से दूर ले जा रहा है जो मनुष्यता का मूल हैं.

वैज्ञानिकों का कहना है कि मनुष्यता आज अपने ही बनाए प्रकाश की चादर में ढंक गई है, एक कोहरा छा गया है हमारे चारों ओर.

यह हमारी दृष्टि के लिए बाधा है. दृष्टिबाधित होना अंधापन है. यह प्रकाश हमें सत्य से असत्य की ओर नहीं ले जा सकता. उलटा यह हमें अपने छोटे-छोटे असत्यों की सीमा में बांध रहा है. इतना प्रकाश कि उसके सामने सत्य की आंखे भी चौंधिया जाएं.

इस प्रदूषण की शुरुआत 19वीं शताब्दी में हुई रात को सार्वजनिक इलाकों में बिजली की बत्तियां लगनी से. विकसित माने जाने देशों में प्रकाश प्रदूषण सबसे ज़्यादा है. संयुक्त राज्य अमेरिका और यूरोप के देशों में 99 प्रतिशत लोगों के लिए आकाशगंगा अदृश्य हो चुकी है.

इमेज स्रोत, Thinkstock

पेरिस में रहने वाले अगर आकाशगंगा देखना चाहें तो उन्हें 900 किलोमीटर की दूरी चल कर स्कॉटलैंड जैसी जगहों तक जाना पड़े. अविकसित और पिछड़े कहे जाने वाले देशों में यह समस्या अभी नहीं है. मध्य अफ्रीका और ग्रीनलैंड में आकाशगंगा के दर्शन अभी भी हो सकते हैं.

रात को जलती बिजली की बत्तियों से जो उजाला निकलता है वह आकाश की ओर फिक जाता है. वायुमंडल में मौजूद सूक्ष्म कणों से टकरा कर यह प्रकाश यहां-वहां फैल जाता है. इससे एक बनावटी दमक पैदा हो जाती है, कोहरे की तरह. यह अंतर संगीत और शोर का है.

मान लीजिए कि हमने इतनी आवाज़ अपने आसपास पैदा कर ली है कि हम बहरे होते जा रहे हैं. ध्वनि प्रदूषण पर तो फिर भी ध्यान जाता है, लेकिन वैज्ञानिकों का कहना है कि प्रकाश प्रदूषण के प्रति हम एकदम लापरवाह हैं.

समय के साथ यह समस्या और बिगड़ ही रही है. अगर सोडियम की सभी पीली बत्तियों को बदल कर एलईडी की नीली बत्तियां से बदल दिया जाए, तो इससे बिजली की खपत में कटौती निश्चित ही होगी. लेकिन इससे प्रकाश प्रदूषण दोगुना हो जाएगा.

इसके परिणाम केवल सांस्कृतिक ही नहीं हैं. कई पक्षी, कीड़े और दूसरे प्राणियों पर इसका बुरा असर होता है. वैज्ञानिकों का अनुमान है कि मनुष्य के स्वास्थ्य पर भी इसका असर होना तय है. रात की नींद पर तो जरूर ही.

इमेज स्रोत, Thinkstock

हमारा शरीर दिन और रात के अंतर के हिसाब से बना है. इस प्रकाश प्रदूषण का असर क्या होगा यह अभी इसलिए नहीं पता क्योंकि प्रकाश प्रदूषण पर शोध होना हाल ही में शुरू हुआ है.

शोध होने के बाद हमें क्या पता चलेगा, कोई नहीं कह सकता. हो सकता है कि जिनकी आंखों में ज्योति है वे अपाहिज मान लिए जाएं. असली दृष्टि और कल्पना केवल अंधे लोगों के पास ही बचे.

(पर्यावरण और विज्ञान पत्रकार सोपान जोशी दिल्ली के गांधी शांति प्रतिष्ठान से जुड़े हैं.)

(बीबीसी हिन्दी के एंड्रॉएड ऐप के लिए आप <link type="page"><caption> यहां क्लिक</caption><url href="https://play.google.com/store/apps/details?id=uk.co.bbc.hindi" platform="highweb"/></link> कर सकते हैं. आप हमें <link type="page"><caption> फ़ेसबुक</caption><url href="https://www.facebook.com/bbchindi" platform="highweb"/></link> और <link type="page"><caption> ट्विटर</caption><url href="https://twitter.com/BBCHindi" platform="highweb"/></link> पर फ़ॉलो भी कर सकते हैं.)