'ममता के लिए नहीं था जनादेश'

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- Author, प्रसेनजीत बोस
- पदनाम, पूर्व सीपीएम नेता
पश्चिम बंगाल विधानसभा चुनाव में कांग्रेस और वाम दलों का गठबंधन नहीं चल पाया. बल्कि वाम दलों को ज़्यादा ही नुक़सान उठाना पड़ा है.
लेकिन ये जनादेश ममता के लिए नहीं था, बल्कि वाम के ख़िलाफ़ था.
25 साल तक सरकार में रहने के बाद पश्चिम बंगाल में वाम सरकार का पतन हुआ. जनता नाराज थी.
वाम दलों को जनता के बीच जाना चाहिए था और पूछना चाहिए था कि क्या सिंगूर और नंदीग्राम में हम ज़मीन अधिग्रहण को लेकर ग़लत थे. यदि हां, तो माफ़ी मांगे.

एक समय यहां के अल्पसंख्यक, ख़ासतौर से मुस्लिम वामपंथियों के साथ थे.
लेकिन फिर जब सच्चर कमिटी आई तो उन्हें एहसास हुआ कि उन्हें ज़मीन तो मिली मगर नौकरियां और बराबरी का अधिकार नहीं मिला. फिर वे भी नाराज़ हो गए. लेकिन हम उनके पास भी नहीं गए.
क्या वाम दल यहां की जनता को फ़ालतू समझती है? आज बंगाल में जो कम्युनिस्ट नेता हैं ये उनका रवैया ग़लत है. वे जनता को अपना अहंकार दिखा रहे हैं.
चुनाव में वाम का चेहरा बने सूर्यकांत मिश्रा का कहना है कि हमारे साथ गेम हुआ है. यह बयान दुखद है. और यह सरासर झूठ है.

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लोकसभा चुनाव में यदि आप वामपंथियों और कांग्रेस के वोट को जोड़ें तो उस हिसाब से इस गठबंधन को अभी 99 सीट मिलनी चाहिए थी.
बताया जा रहा है कि वाम को चुनाव में 28 सीट पर बढ़त मिली और कांग्रेस को भी 28 सीट पर.
56 से 77 बढ़ने का आंकड़ा ग़लत बताया जा रहा है. बल्कि वाम दलों की सीट जो 2014 में भी 99 थी घटकर 77 हो गई है.
पश्चिम बंगाल में इस बार सबसे ज़्यादा नोटा वोट पड़ा है. सीपीएम के समर्थकों के अनुसार उन्होंने नोटा में वोट किया है.

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सांसद मोहम्मद सलीम कह रहे हैं कि भाजपा जो एक ताक़त के रूप में उभर रही है, उसे रोकने के लिए वाम ने कांग्रेस के साथ गठबंधन किया है.
वाम दलों का यह बयान जनता को बेवक़ूफ़ बनाने वाला है.
भाजपा के ख़िलाफ़ कांग्रेस के साथ जो वाम दल गठबंधन बना रहा है उसे यह काम केंद्र में करना चाहिए. पश्चिम बंगाल में तो भाजपा की सरकार ही नहीं है.
अब चुनाव नतीजों के आने के बाद नई परिस्थितियां बनी है.

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अब वाम को यदि अपना भविष्य सुधारना है तो उसे भूमंडलीकरण के इस दौर में पुरानी हठधर्मिता को छोड़ते हुए गरीब, मज़दूरों और मेहनतकश के लिए आवाज़ उठानी होगी.
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