चुनाव के बाद भी लाल रहेगा बेहाल?

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    • Author, सुबीर भौमिक
    • पदनाम, राजनीतिक विश्लेषक, बीबीसी हिंदी डॉट कॉम के लिए

पश्चिम बंगाल में वामपंथी राजनीतिक दल तृणमूल कांग्रेस को हटाकर सत्ता में वापस आने की जीतोड़ कोशिश कर रहे हैं.

बंगाल में हो रहे छह चरणों के चुनाव में सोमवार को पहले चरण के लिए मत डाले गए.

वामदल पश्चिम बंगाल में तीन दशक से भी ज्यादा समय तक सत्ता में रहे लेकिन 2011 में वे ममता बनर्जी के हाथों हार कर सत्ता से बाहर हो गए.

ममता बनर्जी इस बार भी सत्ता में वापसी को लेकर आश्वस्त दिख रही हैं जबकि वामदल कांग्रेस के हाथ मिलाकर आश्वस्त दिख रहे हैं.

2011 में कांग्रेस ममता बनर्जी के साथ थी.

सीपीएम के सांसद मोहम्मद सलीम का कहना है, "इससे समीकरण में थोड़ा बदलाव आएगा."

बंगाल में कांग्रेस के पास 10 फ़ीसदी वोट शेयर है और 2014 में उसने लोकसभा की चार सीटों पर जीत दर्ज की थी.

सलीम कहते हैं, "हमारे पास 30-35 फ़ीसदी वोट शेयर है और कांग्रेस के पास करीब 10 फ़ीसदी. और हमारा गठबंधन ममता बनर्जी के ख़िलाफ़ बने सत्ता विरोधी लहर के बदौलत वापसी करेगा."

हाल ही में हुए चुनाव पूर्व सर्वे इस बात की ओर इशारा करता है कि गठबंधन तृणमूल कांग्रेस के 45-46 फ़ीसदी वोट शेयर से सिर्फ़ 1-2 फ़ीसदी पीछे है.

सलीम का कहना है, "हमारी तरफ पलड़ा थोड़ा सा झुक सकता है और ममता सत्ता से बाहर हो सकती हैं."

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लेकिन वामपंथी विचारधारा के दूसरे राजनीतिक दल इतने विश्वास से भरे हुए नहीं हैं.

नाम ना बताने के शर्त पर सीपीएम के एक शीर्ष नेता ने कहा, "हमें वोटों की हेराफेरी और वोटरों को डराने धमकाने की आशंका है. अगर ये होने से हम रोक पाए तो हम जीत जाएंगे नहीं तो हम नहीं जितेंगे."

विशेषज्ञों का मानना है कि बंगाल में चुनावी जीत वामदलों के लिए राष्ट्रीय राजनीति में मौजूदगी के हिसाब से अहम है.

पिछले एक दशक में संसद में कम्युनिस्टों की मौजूदगी तेज़ी से घटी है. लोकसभा में 2004 में जहां उनकी तायदाद 60 सीटों से ज्यादा थी अब वो घटकर 2014 में 11 सीटों तक पहुंच गई है.

राजनीतिक विश्लेषक रानाबीर सामादार इस बारे में कहते हैं, "ऐसा मुख्य तौर पर बंगाल में उनके ख़राब प्रदर्शन की वजह से हुआ. अगर वो दोबारा यहां हारते हैं तो भारतीय राजनीति में अपनी प्रासंगिकता बनाए रखना उनके लिए मुश्किल होगा."

विश्लेषक बिनोद मिश्रा कहते हैं कि गठबंधन की हार कांग्रेस और वामदलों को अपनी राजनीतिक रणनीति पर एक बार फिर से सोचने पर मजूबर कर देगा.

बिनोद मिश्रा कहते हैं, "इस गठबंधन पर सिर्फ वैसे कम्युनिस्ट कट्टरपंथी जो बीजेपी और कांग्रेस से समान दूरी बनाए रखने की वकालत करते हैं, ही नहीं सवाल उठाएंगे बल्कि यह हार कांग्रेस में कइयों को तृणमूल के साथ फिर से जाने के विकल्प पर सोचने को मजबूर कर देगा. "

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बिनोद मिश्रा आगे कहते हैं कि बीजेपी तृणमूल को जीत की कामना करेगी लेकिन बहुमत के साथ नहीं.

वो कहते हैं, "बीजेपी 10 से ज्यादा सीटों पर जीत दर्ज करने के लिए उतावली है और अगर तृणमूल बिना बहुमत पाए सबसे बड़ी पार्टी बनकर आती है तो यह बीजेपी के लिए अच्छा होगा. वे तब तृणमूल के साथ सरकार बनाने को लेकर सौदेबाज़ी कर सकते हैं. "

ऐसा लगता है कि बीजेपी तृणमूल कांग्रेस के ख़िलाफ़ आक्रमक नारे देने के बाद भी यह नहीं चाहती है कि तृणमूल को हराकर कांग्रेस और वामदल चुनाव जीते क्योंकि उन्हें यह डर सता रहा है कि यह गठबंधन बीजेपी के ख़िलाफ़ एक धर्मनिरपेक्ष धुरी में तब्दील हो सकता है.

हालांकि कांग्रेस इस गठबंधन को लेकर काफी आशान्वित है.

कांग्रेस के उपाध्यक्ष राहुल गांधी ने पश्चिम बंगाल के मतदाताओं से यह अपील की है कि वे तृणमूल को बंगाल से उखाड़ फेंके.

उन्होंने आरोप लगाया कि ममता बनर्जी की सरकार का "रिकॉर्ड भ्रष्टाचार से भरा हुआ है और उनकी सरकार पूरी तरह से नाकामयाब साबित हुई है. "

एक चुनावी रैली में राहुल गांधी ने कहा, "हमने तृणमूल कांग्रेस का जिन वजहों से 2011 में समर्थन किया उन्हीं वजहों से अब हम लेफ्ट फ्रंट का समर्थन कर रहे हैं क्योंकि ममता बनर्जी असफल रही हैं."

चुनावी रैलियों में वामपंथी नेता - ख़ासतौर पर सीपीएम के लीडर, राहुल गांधी के साथ दिख रहे हैं.

सूर्यकांत मिश्रा कहते हैं, "गठबंधन तय होने के बाद मिलने वाला समर्थन उत्साहित करने वाला है. अगर साफ-सुथरा चुनाव होता है तो इस गठबंधन से फायदा मिलेगा. हमें कोई नहीं रोक सकता है."

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