एक तीसरा मोर्चा भी था बिहार चुनावों में!

सीपीआई एमएल के महासचिव दीपांकर भट्टाचार्य

इमेज स्रोत, Manish Shandilya

इमेज कैप्शन, सीपीआई एमएल के महासचिव दीपांकर भट्टाचार्य
    • Author, पंकज प्रियदर्शी
    • पदनाम, बीबीसी संवाददाता, पटना से

बिहार विधानसभा चुनावों में एनडीए और महागठबंधन के अलावा एक तीसरा मोर्चा भी था, जिसका नेतृत्व समाजवादी पार्टी कर रही है.

हालांकि चुनाव के दौरान वाम दलों वाले गठबंधन की चर्चा कम ही रही.

क्या बिहार में वाम दल अपना रास्ता भटक गए हैं, या, फिर उनका एजेंडा दूसरे दलों ने हथिया लिया है.

वाम दलों के गठबंधन में प्रमुख दल सीपीआई, सीपीएम और सीपीआई एमएल हैं.

चुनावी शोर से अलग सीपीआई एमएल कार्यालय में महासचिव दीपंकर भट्टाचार्य से मुलाक़ात हुई.

भाजपा, जनता दल यू और राजद के कार्यालय से अलग न गाड़ियों की लंबी क़तारें, न भारी संख्या में समर्थक, न लंगर और न पत्रकार.

दीपंकर कहते हैं, "चुनाव में निश्चित तौर पर हमारा प्रदर्शन कमज़ोर हुआ है. वो भी 2010 में. लेकिन पार्टी के जनाधार और आंदोलन में कोई ठहराव नहीं है, उसमें विस्तार ही हैं."

इमेज स्रोत, MUKESH KUMAR

मगर सीपीएम के वरिष्ठ नेता अरुण मिश्रा मानते हैं कि "सच्चाई है कि पिछले दिनों वामपंथी जनाधार में कमी आई है और इसकी कई वजहें रही हैं."

उन्होंने बताया, "यहाँ क्षेत्रीय शक्तियों के उभार में हमारी जो भूमिका रही, उससे हमारी संघर्षशील छवि और वर्ग संघर्ष को तेज़ करने का जो हमारा कार्यक्रम था, वो कहीं न कहीं कमज़ोर हुआ."

लेकिन जानकारों कहते हैं कि इस चुनाव में वामदलों के एजेंडे की चर्चा ही नहीं हुई तो ज़ाहिर है वो पिछड़ते चले गए. अगर उन्होंने कुछ मुद्दे उठाए भी, तो कई वजहों से वो चर्चा में न आए पाए.

वरिष्ठ पत्रकार सुरूर अहमद कहते हैं, "उनके उठाए हुए मुद्दे बहुत दिनों तक बिहार में ज़िंदा रहे. भूमि सुधार, उत्पीड़न, खेतिहर मज़दूर से जुड़े मुद्दे इनमें प्रमुख थे."

अहमद कहते हैं, "दुर्भाग्य से उनके मुद्दे भी इस चुनाव में नहीं रह सके. अगर उन्होंने ये मुद्दे उठाए भी तो पता नहीं चला. न उनको मीडिया कवरेज़ मिला और न ही उन्हें किसी ने महत्व दिया."

इमेज स्रोत, PTI

एक तर्क ये भी है कि उनके एजेंडे दूसरी पार्टियों ने हथिया लिए और बिहार में वामदलों का वोट बैंक कहा जाने वाले तबका दूसरे दलों की ओर आकर्षित होने लगा.

जनता दल यू के प्रवक्ता वशिष्ठ नारायण सिंह कहते हैं, "वाम दलों का संगठन खेत मज़दूर समेत कई लोगों के बीच सक्रिय था. जिनके बीच में वे सक्रिय रहते थे, उनमें हमारी पार्टी का भी विस्तार हुआ."

सिंह बताते हैं, "लालू यादव की पार्टी का भी विस्तार हुआ है. इसलिए उन्होंने वामदलों से अच्छा विकल्प इन पार्टियों के नेताओं और नीतियों को मानना शुरू कर दिया है."

कई जानकार मानते हैं कि विश्व भर में साम्यवाद के पतन का असर बिहार और बंगाल पर भी पड़ा और सैद्धांतिक रूप से उन विचारों की अहमियत भी कम हुई.

इमेज स्रोत, MUKESH KUMAR

सुरूर अहमद कहते हैं, "बिहार और बंगाल में नुक़सान के बाद भी इन दलों ने सेक्युलर पार्टियों का साथ छोड़कर ग़लती की, क्योंकि तब इन्हें कुछ सीटें मिल जाती थी."

वह बताते हैं, "लेकिन इस बार कोई समझौता नहीं हो पाया क्योंकि वाम दलों ने लचक नहीं दिखाई. वो शायद ज़्यादा सीटें मांग रहे होंगे. वाम दलों को वास्तविकता समझनी होगी."

क्या वाम दलों ने अलग मोर्चा बनाकर कोई ग़लती की है या वे अपनी अलग धारा स्थापित करने की नई कोशिश में लगे हैं.

भट्टाचार्य कहते हैं, "हम समझते हैं कि इस बार का चुनाव वाम दलों के फिर से अपने को स्थापित करने का चुनाव है. फिर से हम लोग आगे बढ़ेंगे. बिहार में एक तीसरी ताक़त की आवश्यकता है. क्योंकि विकल्पहीनता की राजनीति बिहार के लिए नुक़सानदेह है."

वो कहते हैं, "भाजपा गठबंधन बिहार को बिगाड़ने वाला गठबंधन है जबकि नीतीश की सरकार ने भी लोगों को निराश किया है. इस चुनाव में वामपंथी विकल्प के निर्माण की शुरुआत है."

इमेज स्रोत, MANISH SHANDILYA

बिहार भाजपा के अध्यक्ष मंगल पांडे कहते हैं कि बिहार की राजनीति में कांग्रेस और वामदलों का कोई वजूद नहीं है.

कुछ मानते हैं कि कांग्रेस, राष्ट्रीय जनता दल और जनता दल यू के साथ वामदलों का बुरा अनुभव भी वही इन दलों को साथ लेकर आया है.

लेकिन भट्टाचार्य कहते हैं कि "वामदलों की जो स्वतंत्र पहचान है, स्वतंत्र एजेंडा है और जन आंदोलन का रास्ता है, उसका कोई विकल्प नहीं है. वामपंथियों को इसी रास्ते पर आगे बढ़ना है."

वो कहते हैं कि अगर भाजपा दो सांसदों से यहां तक पहुंची है तो वामदलों को भी ख़ुद पर भरोसा कर आगे बढ़ते रहना चाहिए.

<bold>(बीबीसी हिन्दी के एंड्रॉएड ऐप के लिए आप <link type="page"><caption> यहां क्लिक</caption><url href="https://play.google.com/store/apps/details?id=uk.co.bbc.hindi" platform="highweb"/></link> कर सकते हैं. आप हमें <link type="page"><caption> फ़ेसबुक</caption><url href="https://www.facebook.com/bbchindi" platform="highweb"/></link> और <link type="page"><caption> ट्विटर</caption><url href="https://twitter.com/BBCHindi" platform="highweb"/></link> पर फ़ॉलो भी कर सकते हैं.)</bold>