अब रावत को नकार नहीं पाएगा कांग्रेस आलाकमान

इमेज स्रोत, Shiv Joshi

    • Author, प्रदीप कुमार
    • पदनाम, बीबीसी संवाददाता

हरीश रावत उत्तराखंड के मुख्यमंत्री पद पर क़ाबिज़ हो ही गए, ये बात दूसरी है इसके लिए बीते एक महीने और तीन सप्ताह में उन्होंने अपना सबकुछ दांव पर लगा दिया.

ये लड़ाई उनके लिए आर-पार की लड़ाई थी. अतीत में वे दो बार मुख्यमंत्री बनने से चूक गए थे. इस बार मुख्यमंत्री पद हाथ में आकर निकला जा रहा था.

लिहाज़ा उन्होंने राजनीति के हर पैंतरे का इस्तेमाल किया और केंद्र सरकार और बीजेपी के रणनीतिकारों को राजनीति के बिसात पर चित करके दिखाया.

67 साल के हरीश रावत की यही सबसे बड़ी ख़ासियत है, वे हमेशा मुश्किलों से घिरने के बाद मज़बूती से उभरने वाले नेता रहे हैं. रावत के साथ पिछले पांच-छह साल से काम कर रहे उनके एक निकट सहयोगी ने बीबीसी को बताया, "वे मुश्किल हालात में भी उम्मीद नहीं छोड़ते और ना ही अपना आपा खोते हैं."

अल्मोड़ा के एक किसान परिवार में जन्में हरीश रावत का बचपन पहाड़ और मिट्टी में बीता. पहाड़ी इलाक़ों की चढ़ाई और उतार भरे रास्तों का अनुभव राजनीति में उनके बेहद काम आया.

लखनऊ यूनिवर्सिटी से वकालत की पढ़ाई के साथ-साथ उन्होंने युवा कांग्रेस और ग्रामीण स्तर पर राजनीति शुरू की. 1973 से 1980 के दौरान रावत ज़िला स्तर से राज्य स्तर तक युवक कांग्रेस के विभिन्न पदों पर रहे.

इमेज स्रोत, PTI

कहा जाता है कि इस दौरान उन पर संजय गांधी की नज़र पड़ी और 1980 में उन्हें अल्मोड़ा से कांग्रेस का टिकट मिल गया. इसके बाद तो रावत ने पीछे मुड़कर नहीं देखा. 1984, 1989 और 2009 में भी वो लोकसभा का चुनाव जीतने में कामयाब रहे.

हालांकि वो 1991, 1996, 1998, 1999 और 2004 में कामयाबी नहीं दोहरा पाए. लेकिन इस दौरान उत्तराखंड की राजनीति में उनका क़द मज़बूत होता गया.

जब उत्तराखंड अलग राज्य बना तो रावत पार्टी के प्रदेश प्रमुख थे. वो मुख्यमंत्री पद के प्रबल दावेदार थे, लेकिन कांग्रेस आलाकमान ने वरिष्ठ नेता एनडी तिवारी को राज्य का मुख्यमंत्री बना दिया.

एनडी तिवारी.

इमेज स्रोत, AP

उस दौरान रावत ख़ेमे के कुछ विधायकों ने कांग्रेस मुख्यालय में नारेबाज़ी भी की थी. इसने रावत को कांग्रेस आलाकमान से थोड़ा दूर कर दिया.

हालांकि उनके निकट रहे लोगों का कहना है कि उत्तराखंड में उनके प्रभाव को देखते हुए यूपीए-वन की सरकार के दौरान 2006 में हरीश रावत को वित्त मंत्रालय में राज्य मंत्री का दर्जा दिया जा रहा था. उनका नाम राष्ट्रपति के पास मंज़ूरी के लिए भेजा जा चुका था.

लेकिन रावत से पार्टी के किसी नेता का संपर्क नहीं हो पाया. इस वजह से उनका नाम मंत्रियों की सूची से हटाना पड़ा.

रावत की राजनीति पर नज़र रखने वालों के मुताबिक़ 2007 के राज्य विधानसभा चुनाव को देखते हुए रावत जानबूझकर मंत्री नहीं बनना चाहते थे.

इमेज स्रोत, PTI

साल 2007 में उनकी उम्मीदों पर पानी फिर गया क्योंकि राज्य में पार्टी सरकार बनाने की स्थिति में नहीं थी. रावत ने उठा-पटक की कोशिश की. लेकिन कांग्रेस आलाकमान ने बदनामी से बचने के लिए उन्हें ऐसा कुछ करने से रोक दिया.

रावत बाद में मनमोहन सिंह मंत्रीमंडल में स्वतंत्र प्रभार वाले राज्य मंत्री बनाए गए. साल 2012 के चुनाव में हरीश रावत ने एक बार फिर पार्टी की नैया पार कराई.

लेकिन कांग्रेस आलाकमान ने इस बार उनकी अनदेखी कर विजय बहुगुणा को मुख्यमंत्री बनवा दिया. उत्तराखंड की राजनीति कवर करने वाले राजनीतिक विश्लेषकों को यह लगा कि रावत के साथ नाइंसाफ़ी हुई है.

लेकिन रावत की एक बड़ी ख़ासियत ये भी है कि उनमें सब्र बहुत है, वे अपनी बारी आने का इंतज़ार करते हैं. विजय बहुगुणा जब उम्मीदों पर खरे नहीं उतरे और लोकसभा चुनाव सिर पर आया तो कांग्रेस आलाकमान के पास हरीश रावत पर भरोसा करने के सिवा दूसरा रास्ता ही नहीं बचा था.

रावत की ज़मीनी स्तर तक पहुंच और आम लोगों से संवाद के चलते उत्तराखंड के लोगों को उनसे काफ़ी उम्मीदें थीं, लेकिन मुश्किल यही हुई कि रावत राज्य की तस्वीर नहीं बदल पाए.

राज्य में हर ओर खनन माफ़िया से लेकर भू माफ़िया का दबदबा है. संसाधनों की लूट का सिलसिला नहीं थमा. रावत अहम फ़ैसलों के लिए अपनी किचन कैबिनेट पर निर्भर हो गए.

इमेज स्रोत, PTI

इन सबका परिणाम हुआ कि 18 मार्च को नौ विधायकों ने रावत के ख़िलाफ़ विद्रोह कर दिया. रावत के निकट सहयोगी बताते हैं, "वे लोगों पर भरोसा जल्दी कर लेते हैं. ऐसे लोग उनके साथ विश्वासघात भी करते रहे हैं."

बहरहाल, विधायकों के ख़रीद-फ़रोख़्त और सरकार बचाने के लिए किसी भी भ्रष्टाचार से अपनी आंखें मूंदने के बयान वाले स्टिंग ने अब तक की उनकी अपेक्षाकृत ईमानदार छवि को दाग़दार ज़रूर किया है. लेकिन उत्तराखंड की राजनीति में उनका क़द बढ़ गया है.

एक तो राज्य की बागडोर एक बार फिर उनके हाथों में आ गई है. वहीं राज्य में ही नहीं बल्कि कांग्रेस के अंदर भी उनका क़द काफ़ी बढ़ जाएगा. वे भारतीय जनता पार्टी के ख़िलाफ़ कांग्रेस का चेहरा बनकर उभरेंगे.

अब तक जिस आलाकमान का भरोसा वे जीत नहीं पाए थे, आज की तारीख़ में राजनीति का अजीब खेल यह है कि वही आलाकमान उन्हें अपने सबसे बड़े सूरमे के तौर पर पेश कर रहा है. कांग्रेस आलाकमान के लिए रावत को नकार पाना अब आसान नहीं होगा.

बहरहाल, मुश्किलों से उभरकर रावत वापसी को तैयार हैं. लेकिन उनके सामने सीबीआई जांच की नई चुनौती है. उनके सामने ये चुनौती यह भी होगी कि वो अपनी छवि को राज्य के भ्रष्ट मुख्यमंत्रियों में शामिल होने से बचाएं. वक़्त कम है और शायद समय से पहले रावत चुनाव में जाने का विकल्प चुनें.

लेकिन तब तक के लिए हरीश रावत ने ये तो बता ही दिया है कि वे उत्तराखंड के सबसे बड़े नेता हैं, कम से कम कांग्रेस पार्टी के लिए.

(बीबीसी हिन्दी के एंड्रॉएड ऐप के लिए आप <link type="page"><caption> यहां क्लिक</caption><url href="https://play.google.com/store/apps/details?id=uk.co.bbc.hindi" platform="highweb"/></link> कर सकते हैं. आप हमें <link type="page"><caption> फ़ेसबुक</caption><url href="https://www.facebook.com/bbchindi" platform="highweb"/></link> और <link type="page"><caption> ट्विटर</caption><url href="https://twitter.com/BBCHindi" platform="highweb"/></link> पर फ़ॉलो भी कर सकते हैं.)