'न इंसान कहलाने लायक हैं और न मुसलमान'

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- Author, अशोक कुमार
- पदनाम, बीबीसी संवाददाता
पाकिस्तान के ख़ैबर पख़्तूनख़्वाह प्रांत में पिछले दिनों एक जिरगे के आदेश पर एक लड़की की हत्या का मामला पाकिस्तानी उर्दू मीडिया में छाया हुआ है.
रोज़नामा दुनिया लिखता है कि अंबरीन को सिर्फ़ इसलिए मौत के घाट उतार दिया गया है कि उसने अपनी सहेली साइमा को अपनी मर्ज़ी से शादी करने में मदद की थी.
अख़बार कहता है कि एबटाबाद में इस तरह का जघन्य काम करने वाले इंसान और मुसलमान कहलाने के लायक नहीं हैं.
अख़बार के मुताबिक़ इस्लाम इस बात की इजाज़त देता है कि लड़की की मर्ज़ी के बिना उसकी शादी नहीं की जा सकती है, लेकिन इन लोगों ने मर्जी से शादी में मदद करने के लिए ही एक मासूम की जिंदगी ले ली.

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अख़बार लिखता है कि अगर अतीत की तरह इस घटना को भी नज़रअंदाज़ कर दिया गया तो फिर हमें ऐसी और घटनाओं के लिए तैयार रहना चाहिए.
रोज़नामा पाकिस्तान लिखता है कि अबंरीन के गांव से उसकी मां और 14 अन्य लोगों को गिरफ़्तार किया गया है.
अबंरीन की मां की गिरफ़्तारी की वजह बताते हुए अख़बार लिखता है कि डर के मारे वो ही अपनी बेटी को जिरगे के सामने ले गई थी. वहां पहले फंदा डालकर अंबरीन का गला घोंटा गया और फिर उसी गाड़ी में रखकर उसकी लाश को जला दिया गया जिसका इस्लेमाल उसकी सहेली ने भागने के लिए किया था.

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अख़बार कहता है कि सरकार को ऐसे जिरगों को रुकवाना चाहिए और उनके ख़िलाफ़ कार्रवाई करनी होगी.
जंग लिखता है कि अबंरीन के मामले में जो दिल को दहलाने वाला ब्यौरा सामने आया है, उससे पता चलता है कि पाकिस्तान के कुछ इलाक़ों में ग़ैरत के नाम पर खुली वहशत और दरिंदगी का राज है.

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अख़बार इस घटना को पूरे पाकिस्तान के लिए शर्मनाक बताते हुए लिखता है कि इस मामले के सभी दोषियों को कानून के कठघरे तक पहुंचाने के साथ-साथ भविष्य में ऐसी वारदातों पर पूरी तरह रोक के लिए जो भी जरूरी कदम हों वो उठाए जाएं.
दूसरी तरफ़ पाकिस्तान में भारतीय उच्चायुक्त गौतम बम्बावले के इस बयान पर भी पाकिस्तानी मीडिया में चर्चा है कि भारत और पाकिस्तान की बातचीत के लिए माहौल अभी साजगार नहीं है.
अख़बार के मुताबिक, भारत के साथ बातचीत के लिए पाकिस्तान की एकतरफा कोशिशें जारी हैं और भारत उनका जवाब दिए बिना लगातार बहाने बना रहा है.
अख़बार लिखता है कि भारत जहां पाकिस्तान को आर्थिक तौर पर अस्थिर करने में लगा है, वहीं पाकिस्तान मोदी सरकार की खुशामद में मसरूफ है.
एक तरफ़ अख़बार जहां भारत पर पाकिस्तान का पानी रोके जाने का आरोप लगाता है, वहीं चीन के साथ पाकिस्तान की परियोजनाओं में रोड़े अटकाने की बात भी कहता है.

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वहीं नवा-ए-वक़्त भारतीय उच्चायुक्त के बयान पर कहता है कि भारत की नीयत साफ होने तक बातचीत के लिए माहौल कभी साजगार नहीं होगा.
अख़बार लिखता है कि भारत कश्मीर मुद्दे पर कभी बातचीत के लिए तैयार नहीं होता बल्कि इस पर सवाल किए जाना भी उसे गंवारा नहीं है.
वहीं एक्सप्रेस ने बांग्लादेश में जमात-ए-इस्लामी पार्टी के मुखिया मोतिउर रहमान निज़ामी की मौत की सज़ा के ख़िलाफ़ अर्जी सुप्रीम कोर्ट में खारिज होने पर संपादकीय लिखा है- बांग्लादेश की सरकार होश से काम ले.
1971 में पाकिस्तान से बांग्लादेश की आज़ादी की जंग में युद्ध अपराधों के दोषी क़रार दिए गए 73 साल के निज़ामी के बारे में अख़बार कहता है कि अब उनके पास सिर्फ़ राष्ट्रपति से रहम की अपील का विकल्प ही बचा है.

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अख़बार कहता है कि निज़ामी ही नहीं, बांग्लादेश में जमात-ए-इस्लामी के कई और नेताओं को भी फांसी दी जा चुकी है.
अख़बार लिखता है कि बांग्लादेश की प्रधानमंत्री शेख़ हसीना युद्ध अपराध ट्राइब्यूनल का इस्तेमाल अपने राजनीतिक दुश्मनों का सफ़ाया करने के लिए कर रही हैं.
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