बीजेपी पर क्यों तीर बरसा रही है शिवसेना?

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    • Author, वात्सल्य राय
    • पदनाम, बीबीसी संवाददाता, दिल्ली

'प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के सामने देश के न्यायाधीश रो पड़े, इसे सफलता मानें या असफलता ? महंगाई, भ्रष्टाचार, कालेधन के बारे में चुनाव से पहले दिए गए वचनों का क्या हुआ?'

केंद्र की नरेंद्र मोदी सरकार से ये सवाल किसी विरोधी दल नहीं बल्कि केंद्र और महाराष्ट्र की सरकार में शामिल शिवसेना ने पूछे हैं.

शिवसेना ने अपने मुखपत्र सामना में केंद्र सरकार के कामकाज पर सवालिया निशान लगाते हुए कहा, "देश के सूखाग्रस्त इलाकों में सरकारी योजनाएं दो साल में नहीं पहुंच सकीं, इसे पिछली सरकार की नाकामी बताने से काम नहीं चलेगा."

सामना में ये भी कहा गया है कि बीजेपी के वरिष्ठ नेता ये बयान दे रहे हैं- "प्रधानमंत्री मोदी ईश्वर के अवतार हैं. नेताओं और ईश्वर को उनके भक्त ही मुसीबत में डालते हैं."

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सत्ता में रहते हुए विपक्षी दल जैसे तेवर शिवसेना ने पहली बार नहीं दिखाए हैं. शिवसेना प्रमुख उद्धव ठाकरे और पार्टी के दूसरे नेता केंद्र और महाराष्ट्र सरकार पर लगातार निशाना साधते रहे हैं.

कुछ दिन पहले ही शिवसेना प्रमुख ने कहा था कि जेएनयू छात्र संघ कन्हैया कुमार को देशद्रोही कहना गलत था. इसके पहले पार्टी ने उत्तराखंड में राष्ट्रपति शासन लगाए जाने के फैसले पर सवाल उठाए थे.

संसद में भले ही इस मुद्दे पर शिवसेना एनडीए के साथ हो लेकिन बाहर वो बीजेपी के रुख का खुलकर विरोध कर रही है.

शिवसेना सांसद संजय राउत ने कहा, "शिवसेना ने कभी लुकाछिपी नहीं की है. उत्तराखंड को लेकर हमने अपना नजरिया रखा है कि बहुमत साबित करने की जगह विधानसभा या संसद है. जो भी कीजिए विधानसभा के अंदर कीजिए."

शिवसेना केंद्र सरकार की पाकिस्तान नीति, प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की पाकिस्तान यात्रा और भारतीय जनता पार्टी के पीडीपी के साथ गठबंधन की भी तीखी आलोचना करती रही है.

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पार्टी सूखे की स्थिति को लेकर भी केंद्र और महाराष्ट्र सरकार की आलोचना करती रही है. भारतीय जनता पार्टी को शिवसेना के ये तेवर रास नहीं आ रहे. बीजेपी के नेता इसे महाराष्ट्र विधानसभा चुनाव के नतीजों से उपजी हताशा बताते हैं.

भारतीय जनता पार्टी के प्रवक्ता श्रीकांत शर्मा कहते हैं, "शिवसेना हमारा वरिष्ठ सहयोगी था, उन्हें अपने बारे में ग़लतफहमियां भी थीं. चुनाव के बाद हम बड़ी पार्टी हैं और वे छोटी पार्टी. लगता है कि वे इस सच्चाई को स्वीकार नहीं कर पाते हैं, उसकी टीस रहती है."

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उधर, बीजेपी-शिवसेना की तकरार ने कांग्रेस को दोनों पार्टियों पर निशाना साधने का मौका दे दिया है. कांग्रेस का कहना है कि दोनों ही पार्टियां कई मोर्चों पर नाकाम हो चुकी हैं और नाकामी की जिम्मेदारी एक-दूसरे पर डालने की कोशिश में दिखती हैं.

कांग्रेस नेता संजय निरुपम कहते हैं, "ऐसा नहीं है कि शिवसेना बीजेपी पर हमले कर रही है बल्कि बीजेपी भी उतनी ही बुरी तरह से शिवसेना पर हमला करती रही है. दोनों अपनी अपनी सरकार की नाकामियों से जान बचाने के लिए सहयोगी पार्टी की आलोचना करती है, जो अनुचित है."

वहीं, शिवसेना का कहना है कि वो सरकार में सहयोगी जरुर है लेकिन केंद्र में सरकार नरेंद्र मोदी और महाराष्ट्र में बीजेपी की है, शिवसेना की नहीं. पार्टी नेता राउत का दावा है कि शिवसेना सत्ता छोड़ सकती है लेकिन जनता से जुड़े मुद्दे उठाना बंद नहीं कर सकती.

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संजय राउत कहते हैं, "सत्ता में हैं इसका मतलब ये नहीं है कि हम जन भावनाओं से मुंह मोड़ ले. सत्ता छोड़ सकते हैं, जनभावनाओं को नहीं."

वरिष्ठ पत्रकार समर खड़स दोनों पार्टियों के संबंधों को लेकर कहते हैं कि भारतीय जनता पार्टी से शिवसेना सिर्फ नाराज़ नहीं बल्कि बहुत नाराज़ है.

खड़स कहते हैं,"शिवसेना को अच्छे मंत्रालय नहीं दिए गए हैं. स्थानीय निकाय की सत्ता को लेकर भी दोनों पार्टियों में संघर्ष है. सिर्फ सत्ता के लिए दोनों पार्टियां साथ हैं."

शिवसेना जानती है कि उसे सरकार से अलग होने में फायदा नहीं मिलेगा लेकिन पार्टी नेताओं के तेवरों से इतना साफ है कि फिलहाल वो अपने रुख में बदलाव नहीं करने जा रही. ऐसे में बीजेपी और उसके रिश्तों को लेकर सवाल उठते ही रहेंगे.

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