सुधार आंदोलनों में तवायफ़ों का था योगदान

    • Author, मृणाल पांडे
    • पदनाम, लेखिका और वरिष्ठ पत्रकार

बीसवीं सदी में महाराष्ट्र की धरती पर कई मशहूर और उत्तम महिला गायिकाओं का रंग देखने को मिला. इनमें गोवा में जन्मी केसरबाई केरकर और मोघूबाई कुरडीकर का नाम सबसे ऊपर है.

जयपुर अतरौली परंपरा के जीनियस गुरु उस्ताद अल्लादिया खां की यह दोनों शिष्याएं रसिकों के गले का हार बनीं किंतु अपनी-अपनी वजहों से उम्र दराज़ होने पर दोनों ने महफिल में गायन छोड़ दिया.

अलबत्ता मोघूबाई की सुपुत्री किशोरी अमोनकर आज भी घराने तथा अपनी मां का नाम रोशन किए हुए हैं. बिसरे नामों की फेहरिस्त इनसे कहीं लंबी है.

बिहार में गया की ढेलाबाई को जिन्होंने सुना है उनके अचर्चित रह जाने पर अफ़सोस करते हैं. दिल्ली की बीबीजान का नाम भी लोग भूल चुके हैं जिन्होंने सितार के गुरु मसीतखां से शिक्षा ली थी और जिनके घर से उस्ताद ने सितार का मशहूर मसीतखानी बाज़ तैयार किया.

तबले तथा ढोल बजाने वाली निचली जाति की मानी जाने वाली उन प्रतिभावान डोमिनियों तथा मीरासिनों के नाम तो बिलकुल ही काल की धुंध में खो चुके हैं जो बड़ी तबियत से गा बजा कर हिंदू तथा मुसलमानों के पूजा स्थलों और त्योहारों, उत्सवों में रौनक पैदा करती रहीं.

पिछले दो सौ सालों की शास्त्रीय संगीत की दुनिया में हिंदू मुस्लिम समुदाय के अंतरंग राग विराग भरे रिश्तों, असाधारण प्रतिभा, मेहनत, खुद्दारी और प्रशंसा के साथ राज समाज के दोमुंहे बर्ताव से उपजी खिन्नता और कड़वाहट को मिलाकर ही हमारी पिछली दो सदियों की उत्तर भारतीय महिला गायिकाओं की जीवन गाथा और प्रतिभा की शक्ल बनी है.

शुरुआत में सभी गायिकाएं अक्सर किसी न किसी बड़े महाराजा, नगर सेठ या उस्ताद की दरियादिली पर निर्भर रहती आईं जिनकी प्रसार की क्षमता तो सीमित थी लेकिन प्रतिभा और महत्वाकांक्षा असीमित थी.

कुछ ने शादी कर घरबार बसाया और भले घर की कुलवधू बनने की इच्छा के चलते संगीत से दूर हो रहीं. कई ने संगीतज्ञ पिता की विरासत थामी और बेवा होने के बाद लखनऊ के उस्ताद मोघू खां की पत्नी की तरह खुद गुमनाम बनी रह कर पति के मरणोपरांत बडी उदारता से दूसरे संप्रदाय के (बनारस के तबलावादक रामसहाय सरीखे) कई नामी पुरुष शिष्य भी तैयार किए.

बीसवीं सदी के तीसरे दशक तक कुछेक ऐतिहासिक घटनाओं ने संगीत को आम मध्यवर्गीय महिलाओं तक पहुंचाने में बहुत मदद की. एक, गांधी जी का महिलाओं से देश की आज़ादी के लिए घरों की चारदीवारी से बाहर आकर उनके साथ जुड़ने का आह्वान. दो, महाराष्ट्र, बंगाल और पंजाब के प्रार्थना समाज, ब्रह्म समाज और आर्य समाज जैसे सुधारवादी आंदोलन.

ब्रह्म समाज के काम में टैगोर परिवार अग्रणी था. देवेंद्रनाथ टैगोर की बेटी स्वर्णकुमारी की बेटी सरलाकुमारी इसी धारा की एक गीतकार थीं. जिनके बारे में कहा जाता है कि उन्होंने वंदे मातरम के (पहले दो पदों को छोड़कर) पदों का संगीत रवींद्रनाथ के निर्देशन में तैयार किया.

कहते हैं कि जलियांवाला बाग घटना के बाद उस पर लिखी उनकी एक रचना को सुन कर कवि कुलगुरु ने ब्रितानिया सरकार से मिली ‘नाइट’ की उपाधि त्याग दी थी पर दुर्भाग्यवश वह रचना अब अनुपलब्ध है.

रवींद्रनाथ की ही भतीजी इंद्राणी देवी रवींद्र संगीत गायन करती थीं. देशबंधु चितरंजन दास की पुत्री और पश्चिम बंगाल के बड़े राजनेता सिद्धार्थ शंकर रे की मां अपर्णादेवी कीर्तन पदावली की आधिकारिक गायिका थीं और उन्होंने लड़कियों को इसकी तालीम देने को बृजमाधुरी संघ का गठन किया था.

कालांतर में इसी उदारवादी पृष्ठभूमि के बूते बंगाली मध्यवर्ग से आगरा घराने की दीपाली नाग ने उस्ताद बशीर खां से, कंकना बनर्जी ने उस्ताद अमीर खां से, संध्या मुखर्जी ने टी कानन, बड़े गुलाम अली खां साहिब तथा परवीन सुल्ताना ने स्वर्गीय चिन्मय लाहिड़ी से संगीत शिक्षा हासिल की और शीर्ष कलाकारों में शुमार हुईं.

(बीबीसी हिन्दी के एंड्रॉएड ऐप के लिए आप <link type="page"><caption> यहां क्लिक</caption><url href="https://play.google.com/store/apps/details?id=uk.co.bbc.hindi" platform="highweb"/></link> कर सकते हैं. आप हमें <link type="page"><caption> फ़ेसबुक</caption><url href="https://www.facebook.com/bbchindi" platform="highweb"/></link> और <link type="page"><caption> ट्विटर</caption><url href="https://twitter.com/BBCHindi" platform="highweb"/></link> पर फ़ॉलो भी कर सकते हैं.)