गौहर जान की ठसक रानियों जैसी थी

- Author, मृणाल पांडे
- पदनाम, लेखिका और वरिष्ठ पत्रकार
पूर्वी भारत में शहर बनारस उन्नीसवीं सदी में संगीतज्ञों का महातीर्थ बन कर उभरा. इस प्राचीन नगर की सांगीतिक शास्त्रीय विरासत को बनाने और सँजोने में वहां की गानेवालियों की हिस्सेदारी बहुत बड़ी रही है.
कई कजरी दादरे और ठुमरियाँ तैयार करनेवाली बड़ी मैनाबाई, हुस्ना को तो तत्कालीन राजा प्रभुनारायण सिंह के दरबार में जगह मिली थी. मैना को राजा जी ने कुइरी की ज़मींदारी दी थी और राजगायिका का ओहदा.

उसी समय भारतेंदु हरिश्चंद्र के मित्र शहर के ही एक रसिक बच्चूबाबू ने तब की मशहूर पेशेवर गायिकाओं को लेकर एक अष्टोत्तरी भी रची थी जिसका ज़िक्र जब तब लोगबाग किया करते थे.
इन्हीं गायिकाओं की जमात में कई घुटे हुए राजदरबारी पखावजियों को शर्मिंदा कर उनका अहंकार तोडनेवाली विलक्षण ध्रुपद धमार गायिका सरस्वतीबाई थीं जिन्होंने हस्सू खाँ के शिष्य पं. सखाराम से शिक्षा ली थी.
दूसरी तरफ गाँधी जी की भक्त विद्याधरी देवी भी थीं जिन्होंने 1930 में गाँधी के विदेशी बहिष्कार आंदोलन में सक्रिय भूमिका निभाई और उनकी प्रेरणा से वेश्या संघ की स्थापना की. ये वेश्या संघ स्वतंत्रता संग्रामियों को हर संभव मदद देता रहा.
पूर्वी भारत की एक अनन्य प्रतिभा थीं गौहरजान जिन पर पहले बनारस और फिर कलकत्ता के रईस रसिकगण न्योछावर होते रहे. सौभाग्य से गौहर के जीवन काल में रिकॉर्ड उद्योग का भारत में प्रवेश हो गया था.
उसकी वजह से इस अनन्य गायिका के अनेक रिकॉर्ड हमको आज भी उपलब्ध हैं.
उनके गाने को सुनने के लिए इस <link type="page"><caption> यू ट्यूब लिंक</caption><url href="https://www.youtube.com/watch?v=SWuuHdf0ssg" platform="highweb"/></link> पर क्लिक करें.

आर्मीनियाई पिता और पेशेवर गायिका माँ की औलाद गौहर की जीवनी उस समय के राज समाज के माहौल और आत्मनिर्भर डेरेदार तवायफों के शोषण की दुख भरी दास्तान है.
तब का रसिक समाज इन गायिकाओं पर रुपया तो भरपूर लुटाता था किंतु बड़ी से बड़ी पेशेवर गायिका को राज समाज में न तो ब्याहता का दर्जा मिलता था और न सम्मानित पुरुष कलाकारों जैसा आदर भरा व्यवहार दिखाता था, ख़ास तौर पर तब जब उनकी गायकी और यौवन ढलाव पर आ जाएं.
प्रतिभा के साथ ही गौहर में एक दुर्लभ व्यावहारिकता भी थी. उसके कारण गायन तथा रिकॉर्डिंग उद्योग के शुरुआती दिनों वह एक प्रसिद्ध करोड़पति बनी जो अंग्रेज़ अफसरों से भी ठसक से मिलती जुलती थी और जिसके पहनावे और ज़ेवरात तत्कालीन रानियों को मात देते थे.
उसने अपनी पूँजी का निवेश ज़ायदाद खरीदने में किया जिसके पीछे कहीं न कहीं बचपन के बेसहारा दिनों में भोगी उनकी तथा उनकी मां की गरीबी की यादें रही होंगी. गौहर की अनेक कोठियाँ कलकत्ता में थीं.

पर दबंग होते हुए भी स्त्रियोचित नर्माई भी उसके दिल में बनी रही और जवानी में वह अपने कई विश्वस्त किंतु कतई नाकारा भाइयों तथा परिजनों पर पैसा तथा प्यार लुटाती रही.
बार बार उनसे धोखा खा कर वह प्रौढावस्था में अपनी उम्र से आधे एक पठान के प्रेम में पड़ी किंतु वैवाहिक सुख उसके नसीब में न था. पति से कडवाहट बढी और दोनों अलग हुए पर पति की नज़र तो उसकी ज़ायदाद पर थी जो प्रेममय दिनों में उसने अपने नाम करा ली थी.
होते होते बात कचहरी तक गई और गौहर की वह शानदार विरासत और ज़ायदाद मुकदमेबाज़ी के दौरान वकीलों की भेंट चढ गई.
अपने अंतिम दिनों में कटु और एकाकी बन गई यह महान गायिका लगभग अचर्चित हालात में दक्षिण भारत जाने को मजबूर हुई और वहीं दिवंगत हुई.

बनारस की ही ज़द्दनबाई (नरगिस की माँ), मेनकाबाई (शोभा गुर्टू की माँ ) तथा सिद्धेश्वरी देवी (सविता देवी की माँ) इस मायने में अधिक भाग्यवान थीं. उन्होंने खुद अपने वक्त में बडा नाम कमाया और उनके बाद उनकी प्रतिभाशालिनी बेटियों ने.
ज़द्दनबाई के गाने को सुनने के लिए <link type="page"><caption> इस यूट्यूब</caption><url href="https://www.youtube.com/watch?v=kiGN2HACtKc" platform="highweb"/></link> लिंक पर क्लिक करें.
दोमुँहे भद्र समाज के विपरीत इन गायिकाओं की असंदिग्ध प्रतिभा के कारण इन सभी का उस समय के पुरुष गायक वादकों के बीच गहरा सम्मान बना रहा. वे अक्सर संगीत की बारीकियों पर चर्चा करते और जानकारियों का आदानप्रदान करते थे.
शहनाईनवाज़ उस्ताद बिस्मिल्लाह खाँ भी अपने वाद्य में मुरकी, खटका मींड आदि ला सकने की अपनी सामर्थ्य का श्रेय तत्कालीन दो बनारसी गायिकाओं रसूलनबाई और बतूलन बाई को ही देते थे.
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