'अब भारत को पाक के चश्मे से नहीं देखता सऊदी अरब'

इमेज स्रोत, PIB
- Author, सिराज वहाब
- पदनाम, रियाद से बीबीसी हिंदी डॉट कॉम के लिए
पहले जब भारत और सऊदी अरब के रिश्तों की बात होती थी तो कहा जाता था कि भारत को पाकिस्तान के प्रिज्म से देखा जाता है लेकिन 2001 में अमरीका पर हुए चरमपंथी हमले के बाद स्थितियां पूरी तरह बदल गई हैं.
शीतयुद्ध की समाप्ति और अमरीका में 2001 में हुए चरमपंथी हमले के बाद से सभी देशों ने अपनी विदेश नीति की समीक्षा की है और अपने व्यावसायिक हितों को प्राथमिकता दी है.
सऊदी अरब तेल का बहुत बड़ा उत्पादक है लेकिन उसे ख़रीदार भी चाहिए. इन ख़रीदारों में भारत की भूमिका अहम है. चीन और भारत की अर्थव्यवस्थाएं तेज़ी से उभर रही हैं और सऊदी अरब उनकी तेल ज़रूरतों को पूरा करना चाहता है.
सऊदी अरब तेल बाज़ार में अपनी हिस्सेदारी बरक़रार रखना चाहता है. ऐसे में सऊदी अरब भारत को पाकिस्तान और सियासी नज़रिए से नहीं बल्कि आर्थिक नज़रिए से देखता है.

इमेज स्रोत, PIB
आर्थिक दृष्टि से भारत का पलड़ा बहुत भारी है क्योंकि उसकी तेल ज़रूरत का 20 प्रतिशत हिस्सा सऊदी अरब से आता है. इस तरह तेल के मामले में दोनों देशों के संबंध बहुत अहम हैं.
सऊदी अरब में करीब 30 लाख भारतीय रहते हैं. इन लोगों ने सऊदी अरब के विकास में अहम भूमिका निभाई है. इन्हीं लोगों की मेहनत के कारण सऊदी अरब में भारत के लिए बहुत सम्मान है.
दोनों देशों के ऐतिहासिक रिश्ते रहे हैं लेकिन साल 2000 के बाद इसमें गर्माहट आई. साल 2001 में तत्कालीन विदेश मंत्री जसवंत सिंह यहां आए थे और उन्होंने इन रिश्तों को नई ऊंचाई दी.

इमेज स्रोत, PIB
उसके बाद से दोनों देशों के रिश्ते लगातार बेहतर हो रहे हैं. सऊदी अरब के शाह अब्दुल्ला 2006 में गणतंत्र दिवस में मुख्य अतिथि बने थे और दोनों देशों के संबंध अब रणनीतिक स्तर पर आ गए हैं.
भारत और सऊदी अरब के रिश्ते अब केवल आर्थिक नहीं रह गए हैं. उनमें राजनीतिक और रक्षा सहयोग के अलावा आपसी हित के मुद्दे भी शामिल हैं. दोनों देशों के रिश्तों में अब पाकिस्तान की कोई अहमियत नहीं है.

इमेज स्रोत, PIB
रविवार को मोदी की मुलाक़ात शाह सलमान से होगी और साथ ही वह दो शहजादों से भी मिलेंगे. इस दौरान कई अहम समझौतों पर हस्ताक्षर होने की उम्मीद है. इससे दोनों देशों के बीच राजनीतिक, रक्षा और आर्थिक रिश्ते मजबूत होंगे.
इससे पहले मोदी शनिवार को भारतीय कंपनी लार्सन एंड टुब्रो के कैंप में गए. उन्होंने वहां भारतीय कामगारों की समस्याएं सुनी और उनके साथ खाना भी खाया.

इमेज स्रोत, PIB
यहां काम करने वाले भारतीय हर साल अरबों डॉलर भारत भेजते हैं जिसकी वहां की अर्थव्यवस्था में अहम भूमिका है.
अरब देशों में काम कर रहे भारतीयों को लगता है कि उन्हें भारतीय मीडिया या सरकार में उतनी तवज्जो नहीं दी जाती है जितनी कि पश्चिमी देशों में रहने वाले भारतीयों को मिलती है.
पश्चिमी देशों में रहने वाले भारतीयों को तो वहां की नागरिकता मिल जाती है लेकिन सऊदी अरब या दुबई आने वाले भारतीयों को यहां नागरिकता नहीं मिलती है.
इन लोगों का कहना है कि खाड़ी देशों में रहने वाले लोग अपनी सारी कमाई भारत भेजते हैं जबकि अमरीका में रहने वाले भारतीय अपनी कमाई वहीं ख़र्च करते हैं.

इमेज स्रोत, PIB
खाड़ी देशों में भारतीयों के बच्चे केवल 12वीं तक पढ़ सकते हैं लेकिन इसके बाद उच्च शिक्षा के लिए यहां कोई अंतरराष्ट्रीय संस्थान नहीं है. स्थानीय संस्थाओं में उन्हें दाखिला नहीं मिलता है.
इन लोगों की मांग है कि खाड़ी देशों में रहने वाले भारतीयों के बच्चों की पढ़ाई के लिए भारत में कोई योजना होनी चाहिए.
(बीबीसी संवाददाता इक़बाल अहमद से बातचीत पर आधारित)
(बीबीसी हिन्दी के एंड्रॉएड ऐप के लिए आप <link type="page"><caption> यहां क्लिक</caption><url href="https://play.google.com/store/apps/details?id=uk.co.bbc.hindi" platform="highweb"/></link> कर सकते हैं. आप हमें <link type="page"><caption> फ़ेसबुक</caption><url href="https://www.facebook.com/bbchindi" platform="highweb"/></link> और <link type="page"><caption> ट्विटर</caption><url href="https://twitter.com/BBCHindi" platform="highweb"/></link> पर फ़ॉलो भी कर सकते हैं.)












