सेक्स वर्करों के जीवन में है ये 'क्रांति'
- Author, सुशांत एस मोहन
- पदनाम, बीबीसी संवाददाता, मुंबई
मुंबई के वकोला इलाके में मौजूद एक संकरी मगर तीन मंज़िला इमारत का नाम है 'वाकोलॉफ़्ट' और आसपास के लोगों को मालूम है कि इस जगह सिर्फ़ लड़कियां ही रहती हैं.
लेकिन बहुत कम लोगों को पता है कि यहां रहने वाली लड़कियां सेक्सकर्मियों की बेटियां हैं और 'क्रांति' नामक ग़ैर सरकारी संस्था इनके जीवन में बेहतरी की कोशिश कर रही है.

क्रांति की सह-संस्थापक रॉबिन चौरसिया कहती हैं, "पिछले 5 साल में हम 7 बार घर बदल चुके हैं क्योंकि लोगों को 'सेक्स वर्कर' के टैग से दिक्क़त है. आप 'मिल वर्कर', 'रोड वर्कर' किसी भी वर्कर के बच्चों को लाओ लेकिन सेक्स वर्कर नहीं चलेगा."
रॉबिन चौरसिया को वार्की फ़ाउंडेशन की ओर से 'ग्लोबल टीचर प्राईज़' के लिए नॉमिनेट किया गया है. वो इस तरह की 18 लड़कियों के साथ संस्था चला रही हैं.
रॉबिन बताती हैं,"हमारे पास जो 18 लड़कियां हैं उनमें से ज्यादातर कि मां मुंबई में सेक्सकर्मी हैं, कई मानवीय तस्करी का शिकार हुई हैं. इन लड़कियों को हम इनके टैलेंट के दम पर सामाजिक बदलाव का हिस्सा बनाना चाहते हैं."

रॉबिन अमरीकी वायु सेना में काम करती थीं. लेकिन उन्हें समलैंगिक होने के कारण वहां से निकाला गया.
उन्होनें इसके ख़िलाफ़ आवाज़ उठाई, "वायु सेना में समलैंगिको के ख़िलाफ़ कोई कानून नहीं था लेकिन यह एक अघोषित नियम था कि आप इसे उजागर नहीं करेंगे."
वो कहती हैं, "मेरे समलैंगिक होने की शिकायत किसी ने अधिकारियों को दे दी और मुझे निकाल दिया गया. इस क़दम के विरोध के बाद मुझे पता लगा कि दुनिया में समलैंगिको और सेक्स वर्कर्स के साथ कितना भेदभाव है. और, अमरीकी सेना की पॉलिसी का विरोध करते-करते ही मैंने ठान लिया कि मैं आगे कोई सामाजिक कार्य ही करुंगी."

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'वाकोलॉफ़्ट' नाम के इस घर में रॉबिन के साथ उनकी दोस्त और 'क्रांति' की सह संस्थापक बानी दास भी रहती हैं और जहां रॉबिन बच्चों की शिक्षा और उनकी ट्रेनिंग को देखती हैं वहीं बानी का काम मैनेजमेंट संभालना है.
बानी कहती हैं, "मैं और रॉबिन सेक्सकर्मियों के रेस्क्यू के लिए काम कर रही एक एनजीओ में वॉलंटियर थे और हमने इनके बच्चों की ज़िंदगी के दर्द को महसूस किया."

वो जोड़ती हैं, "सेक्स वर्कर के बच्चों को लोग हेय दृष्टि से देखते हैं, उनके साथ भेदभाव होता है लेकिन यह सामने नहीं आता. भेदभाव का सूबूत है कि हमें हमारी संस्था के लिए 5 साल में सातवीं बार घर बदलना पड़ा है."
बानी ने बताया कि लड़कियों को लेकर काम करने की शुरूआत इसलिए की गई क्योंकि एक रेड लाईट एरिया में एक लड़की के लिए रिस्क फ़ैक्टर ज्यादा होते हैं. इसलिए इन्हें बाहर लाना ज़रुरी था.

इन लड़कियों में से एक, 17 वर्षीय दानिश शेख की मां एक सेक्स वर्कर थीं.
दानिश कहती हैं, "मैं एक अलग शख़्स हूं तो क्यों मेरे टैलेंट को मेरी मां के अतीत से जोड़ा जाए. क्या एक ग़रीब आदमी के बेटे के आईएस बन जाने पर ऐसा कहा जाता है? वेश्या की बेटी कुछ बड़ा क्यों नहीं बन सकती?"

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रॉबिन शीतल जैन का उदाहरण देती हैं.
शीतल की मां एक बार डांसर थी जिस वजह से उसकी पढ़ाई पूरी नहीं हो पाई थी. शीतल को ड्रम्स से लगाव था और 9 महीने अमरीका में पढ़ने और ड्रम्स सीखने के बाद आज वो पुणे में 'ताल इंक' के साथ मिलकर बच्चों को ड्रम्स सिखाती है.

आर्थिक कारणों की वजह से बच्चों की तादाद 18 पर अटकी है.

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वो कहती हैं, "मैं जानती हूं कि औरतों कि चुनौतियां अभी और आज ही ख़त्म नहीं हो जाएंगी लेकिन उनके जज्बे, चुनौतियों से लड़ने की उनकी ताक़त की इज्ज़त होनी चाहिए और उन्हें मौक़ा मिलना चाहिए ताकि वो आगे न निकलें तो पीछे भी न रह जाएं."
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