क्या है आम महिलाओं की ' माई च्वाइस'?

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- Author, दिव्या आर्य
- पदनाम, बीबीसी संवाददाता, दिल्ली
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“तुम, जो, पत्नियों को अलग रखते हो, वेश्याओं से
और प्रेमिकाओं को अलग रखते हो, पत्नियों से
कितना आतंकित होते हो
जब स्त्री बेखौफ भटकती है, ढूंढती हुई अपना व्यक्तित्व
एक ही साथ वेश्याओं और पत्नियों और प्रेमिकाओं में!”
कई साल पहले जानेमाने हिन्दी कवि आलोक धन्वा ने अपनी कविता, ‘भागी हुई लड़कियों’ में औरतों की आज़ादी से जीने की ख़्वाहिश और कश्मकश को उभारा था.
‘वोग’ पत्रिका के लिए <link type="page"><caption> #mychoice</caption><url href="https://www.youtube.com/watch?v=KtPv7IEhWRA" platform="highweb"/></link> वीडियो में बॉलीवुड ऐक्टर दीपिका पाडुकोण ने अब एक नए तेवर में औरतों के हक़ और अपनी शर्तों पर ज़िन्दगी जीने की बात सामने रखी है.
वीडियो में कई और मुद्दों के अलावा दीपिका कहती हैं कि, “शादी के बाहर यौन संबंध बनाने, शादी के बग़ैर यौन संबंध बनाने और शादी ना करने की मर्ज़ी उनकी है.”

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ढाई मिनट के काले-सफ़ेद रंगों में बने इस वीडियो में 99 महिलाएं दिखती हैं. शहरी वर्ग की पढ़ी-लिखी महिलाएं पहनावे से लेकर काम करने की आज़ादी की बात कह रही हैं.
सवाल ये कि जब मर्ज़ी और आज़ादी की बात आती है तो उसकी हद क्या है? उसमें सही और जायज़ क्या है? और उसमें सबसे ज़रूरी क्या है?
मैंने दिल्ली की कुछ महिलाओं से पूछा कि उन्हें मौका मिले अपने मन की करने का, तो वो क्या चाहेंगी? कौन सी ऐसी दहलीज़ लांघना चाहेगी जिसके पीछे उन्हें रोक दिया गया है?
जैसे वीडियो में कई मुद्दे सामने आते हैं वैसे ही सड़क पर आम महिला की सोच और ख़्वाहिशें अलग निकलीं. पर ध्यान से बुनो तो एक कहानी उभर आती है.

नूर जो आठ साल से घरों में बरतन धोने और खाना बनाने का काम करती हैं, अब पढ़ना चाहती हैं. अब भी, 40 साल की उम्र में, वो ख़्वाहिश ज़िंदा है.
अब भी पढ़ने के अपने हक़ को, मां-बाप की तंगी और भाई पर किए लाड़ से, वो वापस खींच लेना चाहती हैं. कहती हैं, “खुद पढ़ना-लिखना जानती तो किसी पर निर्भर नहीं रहना पड़ता, अब अपने बेटे के साथ अपनी दोनों बेटियों को स्कूल भेजती हूं.”

कोमल जिसे पढ़ने का मौका मिला, जो दिल्ली विश्विद्यालय से एम.ए. कर रही है, उसकी उड़ान कुछ और है. उसे शादी ना करने की आज़ादी चाहिए.
कहती हैं, “ज़िद है कि दुनिया को दिखाना है कि जीने के लिए एक मर्द का सहारा नहीं चाहिए. मैं ख़ुद अपना ख़याल रख सकती हूं.”

गरिमा जिसने पसंद से शादी की, दो बच्चों की मां है और घर संभालती हैं. वो भी नाराज़ हैं. उन्हें भी विकल्प चाहिए ये तय करने का कि वो मां बने या नहीं. बनें तो कितने बच्चे पैदा करें और कब.
गरिमा के मुताबिक, “आप चाहे जो समझें, सच्चाई तो ये है कि शादी के बाद बच्चों की ज़िम्मेदारी मां पर पड़ती है तो पति, परिवार या समाज ये फ़ैसला क्यों ले कि मुझे कितनी ज़िम्मेदारी लेनी है?”

सलोनी इंजीनिटर हैं. साल भर पहले मां बनीं और अब एक और बच्चे की तमन्ना है. पर ये विकल्प उन्हें अपनी शर्त पर चाहिए. सलोनी कहती हैं, “बच्चों और घर की देख-रेख मेरे पति करें और मैं बाहर जाकर कमाऊं.”
अगर कमाने और घर-परिवार संभालने की ज़िम्मेदारियां पलट दी जाएं तो इसमें असहजता कैसी. पति भी तो ‘होममेकर’ हो सकते हैं.

और राजकुमारी, जो झांसी से दिल्ली आईं और बड़े शहर की महंगाई से जूझने के लिए पति बेलदारी का काम करते हैं, वो फल बेचने का.
अब 35 साल हो गए, बेटियों की शादी भी की, वो घर में रहना चाहती हैं. “क्यों मैं सारी ज़िम्मेदारियां संभालूं? पति कमाए और वो पूरा पड़े तो मैं सिर्फ़ घर-परिवार ही देखना चाहती हूं.”

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पांच महिलाओं की ख़्वाहिश भारत की आधी आबादी की ज़िन्दगी की एक झलक भर ही हो सकती है.
पर इतना तय है कि ‘च्वाइस’ की इस तमन्ना को सही, जायज़ या ज़रूरी के खांचों में नहीं बांधा जा सकता. ये दायरा तो हर महिला के अपने अनुभव और ज़िन्दगी की सच्चाई से तय होता है.
साफ़ है तो इतना कि बहस छिड़ी ही इसलिए है क्योंकि बहुत कुछ अब भी दबा है. ख़ुले आसमान के कई हिस्सों में अब भी बादलों का साया है. ख़वाहिश बस अपने-अपने हिस्से की धूप की है.
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