फ़रवरी महीना नहीं भूल पाएगा फ़ेसबुक

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    • Author, प्रशांतो कुमार रॉय
    • पदनाम, वरिष्ठ टेक्नोलॉजी लेखक

फ़ेसबुक फ़रवरी का महीना भूलना चाहेगा. इसी महीने अमरीकी कंपनी के फ्री बेसिक्स को भारत में ज़बरदस्त झटका लगा.

फ़ेसबुक ने भारत में इंटरनेट कनेक्टिवटी की समस्या और डिजिटल में सबको शामिल करने के लिए फ्री बेसिक्स ऐप का क़रीब तीन महीने तक खूब प्रचार किया था.

इसके तहत इंटरनेट डॉट ऑर्ग पर यह ऐप यूज़र्स को फ़ेसबुक और दूसरे कई डेटा का मुफ़्त इस्तेमाल करने देता. रिलायंस इसमें साझीदार था.

दूसरे क़रार के तहत एयरटेल मोबाइल का इस्तेमाल करने वाले फ़ेसबुक डेटा मुफ़्त ले सकते थे.

कहते हैं कि फ़ेसबुक ने अपने प्रचार अभियान पर 300 करोड़ रुपए ख़र्च किए. भारत के दूरसंचार नियामक 'ट्राई' ने नेट न्यूट्रेलिटी के मज़बूत दिशानिर्देश जारी किए, जिससे फ़्री बेसिक्स का कामकाज नामुमकिन हो गया.

फ़ेसबुक

अंतरराष्ट्रीय कंपनी की बड़े पैमाने पर हुई किरकिरी का अमूमन नतीजा यह होता है कि भारत में उसका प्रबंधन बदल जाता है, जैसा माइक्रोसॉफ़्ट ने एक से अधिक बार किया.

ट्राई के इस फ़ैसले के एक दिन बाद इसकी भारत प्रमुख कीर्तिगा रेड्डी ने अपने इस्तीफ़े की घोषणा कर दी. वे इस पद पर बीते पांच साल से थीं.

फ़ेसबुक ने बाद में सफ़ाई दी कि रेड्डे के हटने से फ़्री बेसिक्स पर फ़ैसले का कोई लेना-देना नहीं है.

यह तकनीकी रूप से सही भी हो सकता है क्योंकि रेड्डी फ़्री बेसिक्स के मामले से जुड़ी हुई नहीं थीं. यह प्रचार अभियान फ़ेसबुक मुख्यालय के मुख्य कार्यकारी अधिकारी के दफ़्तर से चलाया जा रहा था.

'फ़्री बेसिक्स' का आक्रामक प्रचार अभियान

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भारत में बातचीत फ़ेसबुक इंडिया की पब्लिक पॉलिसी निदेशक अनखी दास कर रहीं थीं.

पर फ़ेसबुक के क़दम से यह तो साफ़ हो गया कि कंपनी भी मानती है कि उसे भारत में मज़बूत और सशक्त प्रबंधन चाहिए.

यदि फ़्री बेसिक्स फ़ेसबुक की ओर से भारत में किया जा रहा सबसे बड़ा काम था और इसकी भारत प्रमुख इससे जुड़ी हुई ही नहीं थीं, तो ज़रूर कुछ न कुछ गड़बड़ थी.

शायद यह नई कंपनी भारत में कामकाज का तरीका अभी सीख ही रही है. दूसरी ओर, इस देश में इंटेल, माइक्रोसॉफ़्ट और आईबीएम जैसी कंपनियों का दशकों से मज़बूत प्रबंधन रहा है.

इंटरनेट.ऑर्ग का प्रचार अभियान

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साल 2014 के आम चुनावों में फ़ेसबुक की भारतीय जनता पार्टी के प्रचार अभियान में बड़ी भूमिका थी. फ़ेसबुक के ज़रिए ही सरकार और राजनेता लोगों तक आसानी से अपनी पहुँच बना पाते हैं.

बीते साल सितंबर में फ़ेसबुक मुख्यालय में प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के साथ टाउन हॉल कार्यक्रम अभूतपूर्व था.

इससे लगा कि भारत में फ़ेसबुक की महत्वाकांक्षी परियोजना को सरकार का समर्थन हासिल है और फ़ेसबुक भारत को लेकर आत्मविश्वास से भर गया.

इसने नेट न्यूट्रलिटी जैसे गूढ़ विषय पर जनता के ग़ुस्से को कम करके आंका. साथ ही इसने उन लोगों को भी कम करके आंका, जो स्वेच्छा से इस काम में लगे थे.

टाउन हॉल कार्यक्रम में नरेंद्र मोदी और मार्क ज़करबर्ग

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फ़ेसबुक ने ज़बरदस्त विज्ञापन अभियान चलाकर स्थिति और बदतर कर ली क्योंकि इससे लोगों को कंपनी की नीयत पर संदेह होने लगा.

हालत ख़ासकर और बुरे हो गए जब इसने असली बात बताने के बजाय फ़्री बेसिक्स को परोपकार की तरह पेश किया. फ़ेसबुक का असली मक़सद तो एक अरब लोगों को फ़ेसबुक से जोड़ना था.

और अंत में, फ़्री बेसिक्स के पक्ष में पहले से ड्राफ़्ट किए हुए लाखों ई-मेल भेजे जाने से दूरसंचार नियामक ट्राई बुरी तरह चिढ़ गया.

ट्राई ने कहा कि इसने जो सवाल पूछे थे, उस पर भेजे गए जवाब अप्रासंगिक थे. यह फ़ेसबुक के लिए वाक़ई बुरा था.

भारत में 30 करोड़ लोग मोबाइल फ़ोन पर इंटरनेट चलाते हैं

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फ़्री बेसिक्स का मामला फ़ेसबुक के भारत में होने वाले कामकाज के लिए एक अड़चन ज़रूर था, पर इससे यह पटरी से उतर नहीं जाएगा.

यह तो तय है कि भारत में इंटरनेट को आगे बढ़ाने के क्षेत्र में फ़ेसबुक एक बड़ा नाम है.

भारत में इंटरनेट का इस्तेमाल करने वालों में से 91 फ़ीसदी लोग मोबाइल पर इंटरनेट चलाते हैं और ऐसे लोगों की तादाद 30 करोड़ है.

ऐप्स

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यहां मोबाइल फ़ोन पर डेटा का इस्तेमाल करने वाले तीन में से दो लोग व्हाट्सऐप या फ़ेसबुक का ही इस्तेमाल करते हैं.

वे लोग ट्राई के नेट न्यूट्रलिटी दिशा निर्देशों के तहत ही सही, पर मोबाइल इंटरनेट अपनाने के मामले में अपना दबदबा बनाए रखेंगे.

इसमें यह हो सकता है कि वे लोग गिगैटो जैसे ऐप के ज़रिए पैसे देकर भी डेटा रिचार्च कराने को राज़ी हो जाएं.

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ट्राई के फ़ैसले के बाद फ़ेसबुक के मुख्य कार्यकारी अधिकारी मार्क ज़करबर्ग ने एक ब्लॉग में लिखा था कि कंपनी भारत में पीछे नहीं हटेगी.

उन्होंने यह भी कहा कि इंटरनेट डॉट ऑर्ग की और कई योजनाएं हैं. उसकी योजना सौर ऊर्जा से चलने वाले हवाई जहाज़ों, उपग्रहों और लेज़र के ज़रिए नेटवर्क बढ़ाने की भी है.

कंपनी ऐप के ज़रिए डेटा यूज़ कम करने और स्थानीय उद्यमियों के साथ मिलकर सस्ती वाई-फ़ाई सुविधा भी देना चाहती है.

नेट न्यूट्रलिटी के समर्थन में लोग

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यह सही है कि भारत फ़ेसबुक के लिए महत्वपूर्ण बना रहेगा. मगर अगली बार कोई बड़ी योजना शुरू करने से पहले फ़ेसबुक को फ़रवरी महीना अच्छी तरह याद रखना होगा.

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