'कवर देखकर किताब का मज़मून जान लेते हैं'

श्रीनगर, लाइब्रेरियन ओता

इमेज स्रोत, BILAL BAHADUR

    • Author, माजिद जहांगीर
    • पदनाम, श्रीनगर से, बीबीसी हिंदी डॉट कॉम के लिए

श्रीनगर में हर किसी को देखने के लिए चीज़ें हैं, मिलने के लिए कई अपनी तरह के लोग हैं और सुनने के लिए बहुत सी कहानियां हैं.

अगर आपकी किताबों, क़िस्सों या आदमियों में कोई दिलचस्पी है तो डल झील के पास कोहने खन इलाक़े की एक गली में ट्रैवलर्स लाइब्रेरी जाएं और मोहम्मद लतीफ़ ओता से मिलें.

हो सकता है कि वहां मौजूद 600 किताबों में आपको मनमाफ़िक किताब न मिले, पर ओता की ज़िंदगी की कहानी आपको रास आएगी, इसकी पूरी संभावना है.

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रोज़ी के लिए एक मामूली सी गिफ़्ट शॉप चलाने वाले ओता लाइब्रेरी के मालिक हैं, लाइब्रेरियन हैं और इसके दीवाने भी हैं.

इस लाइब्रेरी में अंग्रेज़ी, जर्मन, रूसी कई भाषाओं की किताबें हैं. 50 साल के ओता नाम भर के लिए पढ़े-लिखे हैं. लेकिन उन्हें किताबों में दबी हर कहानी याद है.

"दि ट्रैवलर्स लाइब्रेरी" से किताब लेने के लिये ओता की दो शर्तें हैं, वह यह कि एक किताब चाहिए तो दो लाइए.

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वह कहते हैं, "लेकिन यह भी ज़रूरी नहीं है. अगर देने के लिए किसी के पास किताब नहीं तो फिर भी पढ़ने के लिए ले जा सकता है और फिर वापस करे. किताब पढ़ने का मैं कोई पैसा नहीं लेता."

दूसरी शर्त है कि जो किताब लाए उसके लिए मुमकिन हो तो वह उसकी कहानी भी सुना दे.

अगर कहानी जर्मन में हो तो सुनाने वाला कुछ अनुवाद करे ताकि वह खुद भी कहानी का लुत्फ़ ले सकें और आने वालों को किताब देते समय सुझा भी सकें कि कहानी क्या है.

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ओता को हर किताब के लेखक का नाम याद नहीं है बल्कि किताबों के कवर से उनको पहचानते हैं.

वह कहते हैं, "मुझे लेखकों के नाम याद नहीं लेकिन वो लोग याद हैं जिन्होंने मुझे ये कहानियां सुनाई हैं. वो लोग मेरे लिए बहुत अर्थ रखते हैं."

किताबें न सिर्फ़ ओता को इसकी याद दिलाती हैं कि उन्होंने ज़िंदगी में क्या खोया बल्कि यह बात भी महसूस कराती हैं कि इन किताबों की वजह से उन्हें क्या मिला और किस बात का उन्हें शुक्रगुज़ार रहना चाहिए?

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इस लाइब्रेरी की शुरुआत नब्बे के दशक में हुई जब वो कामकाज के लिए कर्नाटक गए थे. वहां उनको ब्रिटेन के इब्राहीम मिले.

ओता बताते हैं, "इब्राहीम ने मुझे अरुंधति राय की एक किताब 'गॉड ऑफ़ स्माल थिंग्स' की कहानी सुनाई और किताब दे दी."

वह कहानी सुनकर निकल रहे थे, इतने में कोई और आया और उसने कहा कि वह इसे पढ़ना चाहता है. ओता ने वह किताब दी और दो किताबें ले लीं. बस शुरू हो गई ट्रैवलर्स लाइब्रेरी. साल 2006 में वह कश्मीर वापस आ गए.

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ग़रीब ओता की किताबों की दुश्मन कभी बाढ़ बनी, कभी कट्टरपंथी, तो कभी उनके निरक्षर परिवार वाले, जो ओता के पागलपन से परेशान उनकी पसंदीदा 'द लास्ट मुग़ल' रद्दी वाले को दे बैठे.

ओता अपने बच्चों की पढ़ाई के लिए बहुत ज़्यादा चिंतित रहते हैं.

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"मैं अपने बच्चों को अक्सर यहां बैठाता हूँ और उनको शब्दों की ताक़त समझाने की कोशिश करता हूँ. लेकिन मुझे नहीं मालूम वह मेरी विरासत को आगे बढ़ाएंगे भी या नहीं? मेरी बेटी ने तो इस बार दसवीं की परीक्षा पास की और हमारे परिवार में वह पहली सदस्य है, जिसने दसवीं जमात पास की."