कुत्ते की वजह से मंदिर को मांगनी पड़ी माफ़ी

    • Author, सेज असर
    • पदनाम, बीबीसी संवाददाता, लंदन से

लंदन के श्री स्वामीनारायण मंदिर ने एक दृष्टिहीन व्यक्ति अमित पटेल से उसके गाइड कुत्ते को उसके साथ अंदर न जाने देने पर माफ़ी मांगी है.

ख़ासतौर से प्रशिक्षित अमित पटेल का कुत्ता कीका उनकी बाहर आने जाने में मदद करता है और अमित को मंदिर में उसके साथ न होेने से असहज सा लगा था जिसके लिए उन्होंने मंदिर प्रशासन की आलोचना की थी.

हालांकि नीस्डेन स्थित मंदिर प्रशासन ने घटना के लिए माफ़ी मांगी है. लेकिन उनका कहना है कि वह गाइड कुत्ते को मंदिर में प्रवेश पर रोक के नियम में छूट नहीं देंगे.

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अमित दो साल पहले दृष्टिहीन हो गए थे और कीका हमेशा उनके साथ होता है.

मंदिर की घटना पर अमित पटेल ने बीबीसी को बताया, “हमने फ़ोन करके पूछा था तब हमें बताया गया था कि कोई समस्या नहीं है. लेकिन प्रवेशद्वार पर हमें कहा गया कि वो अंदर नहीं जा सकता और उसे एक सुरक्षा गार्ड के साथ रहना होगा. मुझे किसी अन्य के साथ भेज दिया गया. उनका कहना था कि वहां जगह की कमी है. लेकिन हम इतनी ज़्यादा जगह नहीं घेरते और वहां व्हीलचेयर पर और लोग भी थे.’’

नीस्डेन मंदिर ने एक बयान में कहा है कि मंदिर श्रद्धालुओ की विशेष आवश्यकताओं का ध्यान रखते हैं. क़ानून के अनुसार गाइड कुत्ते सभी सार्वजनिक स्थानों पर जा सकते हैं, लेकिन इस बारे में थोड़े मतभेद हैं कि क्या यह धार्मिक भवनों पर भी लागू होता है."

दृष्टिहीनों के लिए गाइड कुत्ते उपलब्ध करवाने वाले डेव केंट ने इसी तरह के मामले देश भर में देखे हैं.

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डेव केंट बताते हैं, “दुर्भाग्य से अमित का अनुभव इस तरह का पहला नहीं है. ऐसे मामले समय-समय पर सामने आते रहते हैं. लीसेस्टर मस्जिद वाले मामले में हमें कुछ सफलता मिली है. ये दुनिया में पहली जगह होगी जिसने परिसर में गाइड कुत्ते को आने की इजाज़त दी है.”

उधर अमित का कहना है, “मैं चाहता हूं कि लोग गाइड कुत्ते को देखने के नज़रिए को बदलें. वह एक काम करने वाली कुतिया है और अगर वह नहीं होती तो मैं कहीं भी नहीं पहुंच पाता.’’

नीस्डेन मंदिर ने अमित को आमंत्रित किया है और कहा है कि मंदिर प्रशासन को उन्हें एक निजी गाइड प्रदान कर सकता है और उसे इस बात की ख़ुशी होगी. लेकिन उसने कहा है कि गाइड कुत्ती स्वयंसेवकों की देखरेख में ही रहेंगी और उसे परिसर में नहीं जाने दिया जाएगा.

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अमित निर्णय से दुखी हैं और नीति में बदलाव चाहते हैं. उन्हें यह भी लगता है कि कुछ एशियाई लोगों को विकलांगता पर नज़रिया बदलने की ज़रूरत है.

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