जिन्हें अमिताभ मानते हैं 'रियल हीरो'

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- Author, गीता पांडे
- पदनाम, बीबीसी संवाददाता
(यह बीबीसी की ख़ास सीरिज़ "हीरो हिंदुस्तानी"#HeroHindustani #UnsungIndians का पहला अंक है. इस सीरिज़ की दूसरी कहानी आप रविवार को पढ़ सकते हैं.)
पुणे के डॉ. गणेश राख 'बेटी बचाओ' मुहिम में ख़ास ढंग से योगदान कर रहे हैं. अगर उनके अस्पताल में किसी की बेटी होती है, तो वह कोई फ़ीस नहीं लेते.
गणेश राख इसे देश में घटते लिंगानुपात की स्थिति सुधारने के लिए 'छोटा सा योगदान' भर मानते हैं जहां समाज में बेटों को बेटियों पर तरजीह दी जाती है, और जहां आसानी से होने वाली सेक्स जांच के कारण लिंगानुपात पूरी तरह गड़बड़ा गया है.
1961 में भारत में सात साल से कम उम्र के बच्चों में प्रति एक हज़ार लड़कों पर 976 लड़कियां थीं. 2011 की जनगणना के आंकड़ों के मुताबिक़ अब यह संख्या 914 रह गई है.

2007 में पुणे में अपना अस्पताल खोलने वाले गणेश राख बताते हैं कि जब भी कोई गर्भवती महिला आती है, तो उसके घर वालों को उम्मीद होती है कि बेटा होगा.
डॉ. राख कहते हैं, “डॉक्टरों के लिए सबसे बड़ी चुनौती मरीज़ के संबंधियों को मरीज़ की मौत की सूचना देना होती है, पर मेरे लिए उतना ही चुनौतीपूर्ण किसी परिवार को यह बताना होता है कि उनके बेटी हुई है.”
वे आगे कहते हैं, “अगर बेटा पैदा होता है तो लोग जश्न मनाते हैं, मिठाई बांटते हैं और अगर बेटी का जन्म हो तो रिश्तेदार चले जाते हैं. मां रोने लगती है. परिवार वाले रियायत मांगने लगते हैं. वे इतने निराश होते हैं.”

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वह कहते हैं, “कई लोग मुझे बताते हैं कि उन्होंने बेटे का जन्म सुनिश्चित करने के लिए ही इलाज कराया था. मैं ताज्जुब में पड़ जाता हूँ क्योंकि मैं ऐसे किसी इलाज के बारे में नहीं जानता. पर लोग बताते हैं कि उन्होंने किसी धर्मगुरु से इलाज कराया है, तो कोई बताता है कि बेटे के लिए किस तरह गर्भवती महिला की नाक में दवा डाली गई.”
2011 की जनगणना के आंकड़े डॉक्टर राख के लिए आंखें खोलने वाले थे, जो अपनी नौ साल की बेटी और इकलौते बच्चे को बेहद प्यार करते हैं. इससे उन्हें पता चला कि हालात कितने ख़राब थे.
बड़े पैमाने पर कन्या भ्रूण हत्या को देखते हुए पूर्व प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह ने इसे ''राष्ट्रीय शर्म'' कहा था और कन्या बचाओ अभियान चलाने की अपील की थी.

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3 जनवरी 2012 को डॉ. राख ने अपना मुल्गी वचवा अभियान (बेटी बचाओ अभियान) शुरू किया. वे बताते हैं, “मैंने फ़ैसला किया कि अगर बेटी का जन्म होता है तो मैं कोई फीस नहीं लूंगा. लोग बेटे के जन्म पर जश्न मनाते हैं तो हमने फ़ैसला किया कि हम बेटियों के जन्म पर जश्न मनाएंगे.”
अपने अभियान के चार साल के दौरान उनके अस्पताल में 454 बच्चियां पैदा हुईं और इनके माता-पिता से उन्होंने कोई फ़ीस नहीं ली है.
जिस दिन हमारी टीम डॉ. राख के अस्पताल पहुँची, उस दिन अस्पताल में निशा और राहुल खाल्से की पहली संतान उनकी बेटी का जश्न मनाया जा रहा था.
निशा-राहुल पुणे से 50 किलोमीटर दूर एक गांव से यहां आए थे. वे अपनी बेटी का नाम अभी सोच ही रहे थे, कि अस्पताल कर्मचारियों ने इस एक दिन की बच्ची का नाम एंजेल रखने का फ़ैसला किया.
डॉ. राख और अस्पताल के कर्मचारियों ने माता-पिता को गुलदस्ता भेंट किया, मोमबत्तियां जलाईं और चॉकलेट केक मंगाया. परिवार और स्टाफ़ इकट्ठा हुआ, सबने तालियां बजाईं और गाया- 'हैपी बर्थडे डियर एंजेल'.

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एक निर्माणस्थल पर मज़दूरी करने वाले राहुल खाल्से कहते हैं, ''घर के पास कई दूसरे अस्पताल हैं, लेकिन हम यहां आए क्योंकि डॉ. राख पैसे नहीं लेते.”
उनकी मां अल्का शाहजी खाल्से कहती हैं, ''वे भले इंसान हैं.''
डॉ. राख कहते हैं, वह असल में डॉक्टर नहीं बल्कि पहलवान बनना चाहते थे.
वे कहते हैं, “लेकिन मेरी मां ने मुझे निरुत्साहित किया. वह कहती थीं कि तुम ज़्यादा खाओगे और सबका खाना खा जाओगे.”
मां की चिंता अपनी जगह ठीक थी क्योंकि उनके पिता अनाज बाज़ार में कुली का काम करते थे जबकि मां दूसरे के घरों में बर्तन मांजने का काम करती थीं. परिवार की आमदनी में राख और उनके दो भाइयों का ख़र्च मुश्किल से ही चलता था.

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तो राख ने डॉक्टर बनने पर ध्यान लगाया. बच्चियां पैदा होने पर कोई फ़ीस न लेने का फ़ैसला इतना आसान नहीं था. उनकी पत्नी और भाइयों ने इसका विरोध किया था.
उनकी पत्नी तृप्ति राख के मुताबिक़, “हम लोग आर्थिक तौर पर बहुत अच्छे नहीं हैं. इसलिए जब उन्होंने यह फ़ैसला बताया तो मुझे चिंता हुई थी कि हम घर कैसे चलाएंगे.”
मगर उनके पिता आदिनाथ विट्टल राख ने पूरे मन से बेटे के फ़ैसले का साथ दिया.
डॉ. राख बताते हैं, “उन्होंने मुझसे कहा कि अच्छा काम करते रहें. उन्होंने मुझसे कहा कि अगर ज़रूरत हुई तो वह फिर कुली का काम करने को तैयार हैं.”
आज राख की कोशिशों और उनके परिवार का त्याग काम आया. मंत्री और अधिकारी उनके काम की प्रशंसा करते हैं और बॉलीवुड सुपरस्टार अमिताभ बच्चन ने उन्हें 'रियल हीरो' कहा है.

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डॉ. राख कहते हैं, “मैंने छोटी सी शुरुआत की है. मुझे नहीं मालूम था कि लोग उसे हाथों-हाथ लेंगे. लेकिन कई बार छोटी-छोटी चीज़ें भी दिमाग पर बड़ा असर डालती हैं.”
पिछले कुछ महीनों से उन्होंने देशभर में डॉक्टरों से संपर्क साधा है और उन्हें भी कम से कम एक प्रसव ऑपरेशन मुफ़्त करने की अपील की है. कई ने उन्हें सहयोग देने का वादा किया है.
वे लोगों को यह बताने के लिए कि बेटियां भी बेटों की तरह हैं, पुणे की गलियों में मार्च निकालते हैं.
वह कहते हैं, “मैं लोगों और डॉक्टरों का नज़रिए बदलना चाहता हूँ. जिस दिन लोग बेटियों के जन्म पर जश्न मनाने लगेंगे, मैं अपनी फ़ीस लेना शुरू कर दूंगा. नहीं तो मैं अपना अस्पताल कैसे चला पाऊंगा.”
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