नक्सलवादी नहीं, गांधीवादी हूूं: संदीप पांडे

संदीप पांडे

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बीएचयू के आईआईटी की विज़िटिंग फैकल्टी से कार्यमुक्त किए गए डॉक्टर संदीप पांडे का कहना है कि वह नक्सलवादी नहीं बल्कि गांधीवादी हैं.

बनारस हिंदू यूनिवर्सिटी के विज़िटिंग फैकल्टी सदस्य डॉक्टर पांडे ने आरोप लगाया है कि और उन्हें इसलिए निकाला गया क्योंकि वो आरएसएस के काम में बाधक बन रहे थे.

मैग्सेसे पुरस्कार से सम्मानित डॉक्टर पांडे ने बीबीसी के कार्यक्रम इंडिया बोल में कहा कि अभिनेता आमिर ख़ान का तो क़रार समाप्त हो गया था, लेकिन उनका क़रार तो बीच में ही तोड़ दिया गया.

उन्होंने कहा, "मुझे क़रार की अवधि पूरी होने से पहले ही बोर्ड ऑफ़ गवर्नर्स की बैठक के ज़रिए हटा दिया गया. मुझ पर आरोप यह है कि मैं नक्सलवादी हूं और राष्ट्रविरोधी गतिविधियों में संलिप्त हूं."

आमिर ख़ान

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पांडे के अनुसार, "मैं बीएचयू के प्रशासन से पूछ रहा हूं कि मैं अगर इतना खतरनाक आदमी हूं तो मुझे केवल निकालने से कैसे काम चलेगा? मेरे खिलाफ एफआईआर दर्ज करके मुझे जेल भेजा जाना चाहिए. मेरे टर्मिनेशन लैटर में लिखा है कि एक महीने का नोटिस दिया जा रहा है. लोग पूछ रहे हैं कि इतने खतरनाक आदमी को कैंपस में एक महीना और क्यों रख रहे हैं?"

बीबीसी के रेडियो कार्यक्रम में उन्होंने कहा, "मैं गांधीवादी और समाजवादी सोच का व्यक्ति हूं. छात्रों, आसपास के गांवों और पटरी व्यवसायियों के बीच काम करता हूं. इसमें कोई दोराय नहीं है कि आरएसएस के लोग जो सत्ता पर काबिज़ हैं, वे विरोधियों को तो छोड़िए, असहमति रखने वालों को भी बख्शने को तैयार नहीं हैं."

आरएसएस

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पांडे के मुताबिक़ जो भी यह बात कहता है कि देश में असहिष्णुता की घटनाएं बढ़ी हैं उसके ख़िलाफ़ संघ परिवार से जुड़े लोग विरोध प्रदर्शन करने लगते हैं.

उन्होंने कहा कि वह अपनी नौकरी के लिए नहीं लड़ रहे हैं क्योंकि वह तो कॉन्ट्रेक्ट वाली थी, बल्कि उनकी लड़ाई प्रगतिशील विचारों पर हो रहे हमले के ख़िलाफ़ है.

पांडे ने कहा कि महिला हिंसा पर बीबीसी ने फ़िल्म बनाई थी जिसे दिखाने की इजाज़त नहीं दी गई.

महिला हिंसा के ख़िलाफ़ प्रदर्शन

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उन्होंने कहा, "महिलाओं के ख़िलाफ़ हिंसा के मुद्दे पर अगर विश्वविद्यालय में चर्चा नहीं होगी तो और कहां होगी? मुझसे कहा गया था कि आप अपनी क्लास रद्द कर दीजिए, तो मुझे चीफ़ प्रॉक्टर साहब से कहना पड़ा कि क्या सरकार ने चर्चा पर भी प्रतिबंध लगाया है."

पांडे ने कहा कि उस फ़िल्म पर लगाया गया प्रतिबंध ग़लत था और उससे किसी तरह की हिंसा या अराजकता की संभावना नहीं थी.

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