'ज़करबर्ग के बजाय भारतीयों के लिए अच्छा बनाएं निवेश'

- Author, मोहन गुरुस्वामी
- पदनाम, अर्थशास्त्री
प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और वित्तमंत्री अरुण जेटली के लगातार शोर मचाने के बावजूद कि भारत दुनिया की सबसे तेज़ी से बढ़ती अर्थव्यवस्था है, साल 2015 भारतीय अर्थव्यवस्था के लिए ख़राब रहा.
वित्तवर्ष 2015-16 के बजट में वित्त मंत्री ने जीडीपी वृद्धि दर का लक्ष्य 11.5 फ़ीसद रखा था, लेकिन वृद्धि केवल 5.2 फ़ीसद या लक्ष्य से 6.3 फ़ीसद कम रही. जिस 7.4 फ़ीसद की जीपीडी वृद्धि के बारे में वो शोर मचा रहे थे दरअसल उसमें 2.2 फ़ीसद की अपस्फ़ीति (डिफ़्लेशन) भी शामिल है.
सेबों की संतरे से तुलना कर कुछ लोगों को कुछ समय के लिए तो मूर्ख बनाया जा सकता है, सभी लोगों को हमेशा के लिए नहीं.
कहावत है कि हाथ कंगन को आरसी क्या... अर्थव्यवस्था उसमें लाभ के लिए लगाए गए पैसे से बढ़ती है. आर्थिक गतिविधियों का सबसे भरोसेमंद संकेत शायद बैंकों से कर्ज़ों का वितरण है. लेकिन इसके लक्षण बहुत अच्छे नहीं हैं.

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उत्पादन क्षेत्र को दिए गए कर्ज़ की दर 21 फ़ीसद से गिरकर 7.1 फ़ीसद हो गई है, निर्माण में 27.4 फ़ीसद से गिरकर 4.1 फ़ीसद, खनन में 17.1 फ़ीसद से 8.2 फ़ीसद ऋणात्मक तक और उद्योग के लिए 9.6 फ़ीसद से गिरकर 5.2 फ़ीसद हो गई है.
सिर्फ़ बिजली के लिए दिया गया कर्ज़ ही तुलनात्मक रूप से कम 13.7 फ़ीसद से 12.7 फ़ीसद गिरा.
जीडीपी में कॉरपोरेट प्रॉफ़िट का फ़ीसद 2015-16 में 3.9 फ़ीसद तक गिर सकता है, जो 2003-04 के बाद से सबसे कम होगा. भारतीय कंपनियों का कुल लाभ क़रीब चार लाख करोड़ पर अटक सकता है. जीडीपी में बचत का अनुपात भी 28 फ़ीसद पर ही अटका हुआ है, जो 2008 के 38.1 फ़ीसद से गिर गया है. तो निवेश के लिए पैसा आएगा कहां से?
मोदी सरकार के सामने यह सबसे बड़ी चुनौती है. विकास को रफ़्तार देने और रोज़गार पैदा करने के लिए बहुत अधिक निवेश करने की ज़रूरत है, क्योंकि हर महीने 10 लाख युवा श्रमशक्ति में जुड़ते हैं. पैसा जुटाने के तीन ही सनातन तरीके हैं मांगो, उधार लो या चोरी करो. एक अच्छी सरकार यह तीनों काम करती है.

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मोदी सरकार एक नए मजबूत भारत के निर्माण के वायदे के साथ सत्ता में आई थी. इसमें 100 नए शहर होंगे और हाईस्पीड रेलवे नेटवर्क देश को नज़दीक लाएगा. यह विदेशों में जमा पैसे को वापस लाने, अवांछित सब्सिडियों में कटौती करने और 'ब्लैक इकॉनमी' के बड़े हिस्से को अर्थव्यवस्था में आधिकारिक रूप से शामिल कर देने वालों का दायरा बढ़ाने का वायदा किया गया था.
वित्त मंत्रालय के एक थिंक टैंक, नेशनल इंस्टीट्यूट ऑफ़ पब्लिक फ़ाइनेंस एंड पॉलिसी (एनआईपीएफ़पी) के मुताबिक़ ये ब्लैक इकॉनमी जीडीपी की क़रीब तीन-चौथाई के बराबर हो सकती है. आय और राजस्व से बचाकर ब्लैक इकॉनमी में जाने वाला कर 30-40 लाख करोड़ सालाना के बीच हो सकती है.
अगर इसमें से एक तिहाई भी भारत में पूंजी निवेश किया जाता तो यह जीडीपी अनुपात में उछाल ला देता और इसे तेज़ी से बढ़ती प्रमुख अर्थव्यवस्था बना देता जिसकी वास्तविक ग्रोथ दो अंकों में होती. इसके लिए पुलिसिया राज की ज़रूरत होती है.
सरकार के पास पहले ही वह सब कुछ हासिल करने की कि शक्तियां हैं, जो दरअसल इसका है. लेकिन लापरवाह प्रशासन ऐसी आय को अपने हाथ से फ़िसल देने जाता है, ज़्यादातर जानबूझकर. इसलिए कर संग्रहण में सुधार सरकार की पहली प्रशासनिक प्राथमिकता होनी चाहिए.

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करने से कहना आसान होता है. लेकिन नरेंद्र मोदी ने वायदा किया था कि वह सांड को उसकी सींग पकड़कर नाथ लेंगे और देश के लिए काम में लेंगे. अब अफ़सरशाही को ज़्यादा जवाबदेह और ज़िम्मेदार बनाने के लिए ढांचागत बदलाव करने के लिए उन्हें राजनीतिक इच्छाशक्ति और प्रशासनिक सूझ-बूझ दिखाने की ज़रूरत है.
सरकार बड़े पैमाने पर, क़रीब 24 फ़ीसद तक, वेतन वृद्धि करने जा रही है और अब उसे वेतन को कर्मचारियों के बेहतर प्रदर्शन के साथ जोड़ देना चाहिए.
भारत में भविष्य में निवेश करने और व्यवसाय बनाने के लिए एक अन्य महत्वपूर्ण ज़रिया है प्रत्यक्ष विदेशी निवेश (एफ़डीआई). सरकार को एक महत्वपूर्ण बात समझ लेनी चाहिए कि भारत और चीन में भी, ज़्यादातर एफ़डीआई इसके अपने लोग ही करते हैं.
भारत में ज़्यादातर एफ़डीआई निवेशकों के स्वर्ग मॉरीशस, सिंगापुर और यूएई से आता है. विदेशों में बसे भारतीय बहुराष्ट्रीय कंपनियों से अधिक यहां निवेश करते हैं. नरेंद्र मोदी के सामने चुनौती यह है कि उन्हें भारत में निवेश को मार्क ज़ुकरबर्ग और सत्या नडेला के बजाय अपने साथी भारतीयों के लिए बेहतर बनाना होगा.

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भारतीय आज की तारीख में बहुत से देशों में विदेशी पूंजी का सबसे बड़ा स्रोत हैं. वॉशिंगटन डीसी स्थित एक थिंक-टैंक ग्लोबल फ़ाइनेंशियल इंटीग्रिटी का कहना है कि भारत से अवैध रूप से हर साल आने वाला पैसा 33.27 खरब रुपए से अधिक हो गया है. इसमें से तीन चौथाई ग़लत व्यापारिक चालान (trade mis-invoicing) के ज़रिए भेजा जाता है.
हालांकि वैश्विक बाज़ार में इन वस्तुओं और सेवाओं के मूल्य को वास्तविक बिक्री से मिलाया जा सकता है. लेकिन वित्त और वाणिज्य मंत्रालय इस तरह के प्रयास ठीक से नहीं कर पाया है.
लेकिन महत्वपूर्ण सवाल यह है कि क्यों भारतीय अपने पैसे को छुपाकर बाहर भेजने को प्राथमिकता देते हैं. सामान्यतः इसका जवाब बहुत सीधा होता है क्योंकि इसे आसानी से लाभ कमाने के लिए लगाया जा सकता है. क्या इसे भारत में बेहतर ढंग से किया जा सकता है? एक बार फिर कहना बहुत आसान है.
विश्व बैंक के संयुक्त सूचकांक के अनुसार 11 महत्वपूर्ण पैमानों के हिसाब से 'व्यवसाय करने की सुविधा' के लिहाज से भारत 189 देशों में से 130 स्थान पर है.
यह कोई बहुत आदर्श जगह नहीं है, विशेषकर तब जबकि देश और अधिक निवेश के लिए तड़प रहा है. सिर्फ़ एक पैमाने पर पर यह आठवें स्थान पर है जो अल्पसंख्यक निवेशकों की सुरक्षा है. लेकिन मुख्य विदेशी निवेशक इसे मदद के बजाय समस्या के रूप में देखते हैं, क्योंकि इससे छोटे शेयरधारक मुख्य शेयरधारकों के बड़े फ़ायदे की कोशिशों में अड़ंगा लगा सकते हैं.

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व्यवसाय शुरू करने की सुविधा और एक अलाभकर व्यवसाय बंद करने की सुविधा, दोनों ही लिहाज़ से भारत का प्रदर्शन ख़राब है. भारत को इस सीढ़ी पर ऊपर चढ़ने की कोशिश करनी होगी और यह ऐसा कर संग्रहण केंद्रों को घटाकर कर सकता है. जो नियामक प्रणालियां लागू हैं ज़्यादातर बिल्कुल अनावश्यक हैं और नरेंद्र मोदी सरकार को इस मुद्दे पर अपने वायदे को पूरा करना चाहिए.
भारत का क़र्ज़ जीडीपी के अनुपात में 65 फ़ीसद है, जो प्रमुख अर्थव्यवस्थाओं में सबसे कम है. भारत का बाह्य क़र्ज़ जीडीपी के अनुपात में 23.8 फ़ीसद है जो अच्छा है. स्पष्ट है कि भारत अपने विकास के लिए और उधार ले सकता है, विशेषकर आधारभूत ढांचे के निर्माण और आधुनिकीकरण के लिए.
भारत को अब आक्रामकता के साथ अपने विकास के लिए संप्रभु गारंटीड ग्लोबल बॉन्ड्स जारी कर दीर्घकालिक निवेश की कोशिश करनी चाहिए. सबसे ऊंचे स्तर की अंतरराष्ट्रीय ब्याज दरों के साथ ही यह पैसा घरेलू पूंजी के मुक़ाबले काफ़ी सस्ता है, जो बहुत ज़्यादा ब्याज के साथ मिलती है.

रेलवे जैसे मंत्रालय और नेशनल हाइवे अथॉरिटी ऑफ़ इंडिया (एनएचएआई) जैसी संस्थाएं और विभिन्न बंदरगाह न्यासों को अपने आधुनिकीकरण और विस्तार के लिए अंतरराष्ट्रीय मुद्रा बाज़ारों से पूंजी जुटाने के लिए कहा जाना चाहिए.
पारंपरिक रूप से भारत क़र्ज़ लेने के विरोध में रहा है लेकिन अक्सर ऋण पूंजी जुटाने का सबसे सस्ता और तेज़ ज़रिया होता है. लेकिन क़र्ज़ का इस्तेमाल सही ढंग से और कुशलता से किया जाना चाहिए ताकि इसका भुगतान किया जा सके और ऋण लिया जा सके. इसके लिए सरकार को प्रभावशाली और कुशल होना चाहिए.
इससे हम एक बार फिर मोदी सरकार के मुख्य काम पर वापस आते हैं- भारत को एक बेहतर और अधिक कुशल सरकार देना.
प्रधानमंत्री जी, आपको नए साल की बहुत-बहुत बधाई.
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