मणिपुर के 'थांगथा' का कश्मीर में जलवा

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- Author, माजिद जहांगीर
- पदनाम, श्रीनगर से, बीबीसी हिंदी डॉट कॉम के लिए
थांगथा खेल भारत प्रशासित जम्मू-कश्मीर में 18 साल पूरे कर चुका है. इस दौरान थांगथा कश्मीर घाटी के 2100 से ज़्यादा खिलाड़ियों को अपने साथ जोड़ने में कामयाब रहा.
थांगथा दरअसल मार्शल आर्ट्स का हिस्सा है, जिसे तलवार और ढाल से खेला जाता है.

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कश्मीर में थांगथा खेल की शुरुआत घाटी के एक छोटे से क़स्बे पम्पौर से हुई थी. यहां के नज़ीर अहमद मणिपुर में लंबे समय तक रहे. उन्होंने वहां यह खेल सीखा और इसे कश्मीर में खेलना शुरू किया. उसके बाद पम्पौर से निकलकर यह खेल पूरे कश्मीर में लोकप्रिय बन रहा है.

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अभी तक कश्मीर के कई थांगथा खिलाड़ियों ने राष्ट्रीय और अंतरराष्ट्रीय स्तर पर मेडल जीते हैं.

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27 वर्षीया अंजुमन फ़ारूक़ ने कई राष्ट्रीय और अंतरराष्ट्रीय खेलों में हिस्सा लिया है. अंजुमन इस समय दिल्ली पब्लिक स्कूल, श्रीनगर में खेल टीचर के अलावा थांगथा कोच भी हैं.
हालांकि थांगथा पहले अंजुमन के लिये केवल शौक़ था, फिर धीरे-धीरे यह उनके लिए पेशे में बदल गया.

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अंजुमन कहती हैं, "जब बचपन में मैंने यह खेल खेलना शुरू किया तब यह मेरे लिए शौक़ था. जब मैंने दिखा कि ये खेल लड़कियों की सुरक्षा के लिए भी अच्छा है और इसमें आगे बढ़ने का मौक़ा भी है, तो फिर मैंने इसमें भविष्य बनाना शुरू किया. आज इस खेल से कश्मीर के हज़ारों बच्चे जुड़े हैं. साफ़ है कि इस खेल के प्रति बच्चों में काफ़ी उत्साह है".

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अंजुमन के मुताबिक़ पहले कश्मीर में लड़कियों का खेल के मैदान में आना अच्छा नहीं माना जाता था.

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अंजुमन बताती हैं "जब मैंने अंतरराष्ट्रीय थांगथा में हिस्सा लेकर वहां गोल्ड मेडल जीता, तो दूसरी लड़कियों ने भी सोचा होगा कि जब मैं गोल्ड मेडल ला सकती हूँ तो वो ऐसा क्यों नहीं कर सकतीं."
अंजुमन की देखरेख में इस समय 57 बच्चे थांगथा खेलते हैं.

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कश्मीर घाटी के सबसे छोटे और थांगथा के उभरते खिलाड़ी 11 साल के ज़करिया यासीन ने अभी तक दो बार अंतरराष्ट्रीय, दो राष्ट्रीय और दो फ़ैडरेशन खेले हैं. ज़करिया को स्टेट अवार्ड से भी नवाज़ा गया है. ज़करिया ने दो एशियाई कप मुक़ाबलों में भी हिस्सा लिया है.
हालांकि ज़करिया कई बार राष्ट्रीय स्तर के मुक़ाबले में क्वालीफ़ाई नहीं कर सके, लेकिन एक दिन वो भी आया जब लोग ज़करिया को देखते रह गए.

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वे कहते हैं, "मैं 2009 से थांगथा खेल रहा हूँ. 2009 से 2011 तक मैं राष्ट्रीय खेलों के लिये क्वालीफ़ाई नहीं कर पाता था. फिर 2013 मैंने क्वालीफ़ाई किया और गोल्ड मेडल जीत लाया. मैंने एशियाई कप में भी गोल्ड मेडल जीता. फिर मैंने अंतरराष्ट्रीय मैच भी खेला और दक्षिणी कोरिया में गोल्ड मेडल जीता. इस तरह से मैं आगे बढ़ता रहा. थांगथा खेल से मुझे सुकून मिलता है."

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राष्ट्रीय और अंतरराष्ट्रीय स्तर पर खेलने और गोल्ड मेडल जीतने वाले 30 वर्ष के फ़िरोज़ अहमद पिछले 17 साल से थांगथा खेल रहे हैं. उन्हें शिकायत है कि इसमें हुनरमंद बच्चों की मौजूदगी के बावजूद सरकार ऐसे बच्चों के लिए कुछ नहीं कर रही है.

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वह कहते हैं, "मणिपुर के बाद जम्मू-कश्मीर में सबसे ज़्यादा थांगथा खेला जाता है. इसके बावजूद सरकार हमें आगे बढ़ाने के लिए कुछ नहीं कर रही है. लगता है कि कोई पीछे से मेरी पीठ थपथपा नहीं रहा है. इसी तरह मेरे जैसे खिलाड़ी मेरी ही तरह पड़े हैं."

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एजाज़ अहमद बट 'कश्मीर थांगथा एसोसिएशन' के जनरल सेक्रेटरी हैं. वो थांगथा की तरफ बच्चों के बढ़ते रुझान को इस खेल में आगे बढ़ने के अवसर से जोड़ते हैं.
एजाज़ कहते हैं, "थांगथा में जिस तेज़ी से बच्चे आगे आ रहे हैं, उसके पीछे वजह यह है कि बच्चों को राष्ट्रीय और अंतरराष्ट्रीय स्तर पर खेलने का मौक़ा मिलता है और इस आधार पर उन्हें प्रोफ़ेशनल कॉलेजों में दाख़िला मिलता है. दूसरी बात ये कि जो बच्चा जितनी मेहनत करता है, उतना आगे बढ़ता है. जो भी बच्चा अपने राज्य से बाहर जाता है, उसके लिए सरकार ख़र्च देती है. बच्चे इस खेल में भविष्य देखते हैं और वो मैदान में आ जाते हैं."

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एजाज़ अहमद के मुताबिक़ इस समय कश्मीर में 10500 लड़कियां भी थांगथा खेलती हैं.
13 साल की अयमान 2013 से थांगथा में हिस्सा ले रही हैं और अभी तक दो बार राष्ट्रीय और दो बार फ़ेडरेशन खेल चुकी हैं.

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अयमान को ख़ुद पर गर्व है कि उन्होंने राष्ट्रीय थांगथा खेला है.

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वह बताती हैं, "जब भी मैं कहीं जाती हूँ तो सब कहते हैं कि यह राष्ट्रीय खिलाड़ी है. थांगथा ने मुझे अलग माहौल दिया है. मैं चाहती हूँ कि हर लड़की को थांगथा खेलना चाहिए, क्योंकि इससे एक लड़की अपनी सुरक्षा भी कर सकती है."
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