नसबंदी कांड: 18 मौतें, एक साल, अनसुलझी गुत्थी

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    • Author, आलोक प्रकाश पुतुल
    • पदनाम, रायपुर से, बीबीसी हिंदी डॉटकॉम के लिए

छत्तीसगढ़ के बहुचर्चित नसबंदी कांड के एक साल पूरा होने के बाद भी प्रशासन उन 18 लोगों की मौत का कारण नहीं बता पाया है.

पिछले साल 8 नवंबर को बिलासपुर के पेंडारी और पेंड्रा में सरकारी नसबंदी शिविर में 137 महिलाओं का ऑपरेशन हुआ. इसके बाद जिन 18 लोगों की मौत हो गई उनमें 13 औरतें थीं.

मौत का सिलसिला नसबंदी के अगले ही दिन शुरु हो गया था.

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तत्कालीन स्वास्थ्य सचिव ने एक 'जांच रिपोर्ट' के आधार पर दावा किया था कि महिलाओं को दी गई सिप्रोसीन दवा में चूहा मारने वाले ज़हर का अंश पाया गया.

इसके बाद सरकार ने कथित रुप से अलग-अलग लैब में सिप्रोसिन और आईबूप्रोफेन दवा की जांच कराई और दावा किया गया कि जांच रिपोर्ट में दवाओं में ज़हर की पुष्टि हुई है.

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इस मामले में सरकार ने सिप्रोसिन बनाने वाली कंपनी के मालिकों को गिरफ़्तार कर जेल भेज दिया. वो अब भी जेल में हैं.

जिस नेशनल इंस्टिट्यूट ऑफ इम्यूनोलॉजी की जांच रिपोर्ट के आधार पर सरकार ने पिछले साल ज़हर होने का दावा किया, उसने साफ कर दिया है कि उसके यहां कभी ऐसी कोई जांच ही नहीं हुई थी.

इस मामले में चार घंटे में 83 महिलाओं का ऑपरेशन करने वाले डॉक्टर आरके गुप्ता को गिरफ़्तार किया गया था. लेकिन दवाओं में कथित ज़हर की सरकार की रिपोर्ट के आधार पर उन्हें जमानत मिल गई.

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यह दिलचस्प है कि नसबंदी कांड में मारी गई महिलाओं की पोस्टमॉर्टम और कल्चर रिपोर्ट में भी ज़हर की बात सामने नहीं आई. इसमें महिलाओं की मौत के पीछे संक्रमण की आशंका जताई गई.

रिपोर्ट के अनुसार महिलाओं की मौत संक्रमण से होने वाली सेप्टिसिमिया, सेप्टिक शॉक और पेरिटोनिटिस से हुई है.

अलग-अलग जांच में भी यह साफ हुआ कि महिलाओं की नसबंदी जिस मशीन से की गई, उसे संक्रमणमुक्त नहीं किया गया था. जिन परिस्थितियों में महिलाओं का ऑपरेशन किया गया, वहां संक्रमण का ख़तरा लगातार बना हुआ था.

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फोरम फॉर फास्ट जस्टिस के राष्ट्रीय संयोजक प्रवीण पटेल कहते हैं, “सरकार ने डॉक्टरों और दूसरे लोगों को बचाने के लिये चूहामार दवाई की कहानी गढ़ी. हमने पूरे मामले की जांच की है और सरकार के सारे तथ्य झूठे हैं. सुप्रीम कोर्ट में भी यह मामला चल रहा है और हमें उम्मीद है कि इसमें दूध का दूध और पानी का पानी हो जाएगा.”

सरकार ने तीन महीने के भीतर पूरे मामले की जांच के लिए अनिता झा कमेटी का गठन किया था. इस साल 12 अगस्त को पेश की गई कमेटी की रिपोर्ट अब तक सार्वजनिक नहीं की गई है.

राज्य के स्वास्थ्य मंत्री अजय चंद्राकर कहते हैं, “अनिता झा कमेटी की रिपोर्ट मंत्रिमंडल में रखी जा चुकी है और अब उसे विधानसभा में भी रखा जाएगा. उसके बाद ही रिपोर्ट सार्वजनिक की जा सकेगी.”

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चंद्राकर इस बात का भी भरोसा दिलाते हैं कि किसी भी दोषी को बख्शा नहीं जाएगा.

लेकिन राज्य के पूर्व मुख्यमंत्री अजीत जोगी का कहना है कि सरकार को पीड़ितों की परवाह ही नहीं है.

जोगी कहते हैं, “जो महिलायें किसी कारण से जिंदा बच गई हैं, उनकी ओर सरकार का ध्यान नहीं है. ऐसी महिलायें अभी भी बुरी सेहत की परेशानी से जूझ रही हैं. ”

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