आरएसएस से ना पूछिए ये सवाल

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- Author, अनिल यादव
- पदनाम, वरिष्ठ पत्रकार, बीबीसी हिंदी डॉट कॉम के लिए
राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ की स्थापना 1925 में नागपुर में विजयदशमी के दिन हुई थी.
तब से यह संगठन कभी फैलता कभी सिकुड़ता हुआ भारत को हिंदू राष्ट्र में बदलने के मिशन में लगा हुआ है. आरएसएस काग़ज़ पर हिंदुत्व को धर्म नहीं जीवनशैली कहता है.
लेकिन व्यवहार में मुस्लिम तुष्टीकरण, धर्मांतरण, गौहत्या, राम मंदिर, कॉमन सिविल कोड जैसे ठोस धार्मिक मुद्दों पर सक्रिय रहता है जो सांप्रदायिक तनाव का कारण बनते हैं.
और अनगिनत रिपोर्टों के मुताबिक़ अक्सर इस संगठन की दंगों में भागीदारी का आरोप लगा है.
यह विरोधाभास आरएसएस की विशेषता बन गई है.

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बीते 90 सालों पर नज़र डालें तो नज़र आता है कि आरएसएस के उठाए मुद्दे और गतिविधियां भले ख़ूनख़राबे, चुनावों के वक़्त धार्मिक ध्रुवीकरण और संप्रदायों के बीच नफ़रत का कारण बनते हों लेकिन वो कभी लक्ष्य की दिशा में निर्णायक मुक़ाम तक नहीं पहुंच पाते.

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इसका कारण यह है कि आरएसएस का अपना एक हिंदुत्व है जिसका तैंतीस करोड़ देवी देवताओं वाले, सैकड़ों जातियों में बंटे, बहुतेरी भाषाओं, रीति रिवाज, परंपराओं, धार्मिक विश्वासों वाले उदार बहुसंख्यक समाज की जीवनशैली से कोई मेल नहीं है.
आदिवासी और दलित भी उसके हिंदुत्व के खांचे में फ़िट नहीं हो पाते जो पलट कर पूछते हैं कि अगर हम भी हिंदू हैं तो अछूत और हेय कैसे हुए?

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आरएसएस की एक और बड़ी मुश्किल यह है कि उसका इतिहास, उसके नेताओं की सोच और व्यवहार लोकतांत्रिक व्यवस्था वाले आधुनिक भारत के धर्मनिरपेक्ष संविधान, क़ानून, अनूठी सांस्कृतिक विविधता और दिनों दिन बढ़ते पश्चिमी प्रभाव वाली जीवन शैली और समाज में बनते नए मूल्यों से बार-बार टकराते है.
इस टकराहट से कुछ सवाल पैदा होते हैं जिनका जवाब देने में नाकाम होने के कारण आरएसएस के विचारक और प्रचारक बौखला जाते हैं.
ऐसे कई सवाल हैं जिन्हें लेकर संघ के लोग सहज नहीं हैं.
1. आरएसएस का प्रमुख कोई ब्राह्मण (राजेंद्र सिंह उर्फ़ रज्जू भैया एक सवर्ण अपवाद थे) ही क्यों बनाया जाता है? लगभग एक सदी के लंबे समय में अब तक किसी ओबीसी, दलित या महिला को इसका प्रमुख क्यों नहीं बनाया गया, क्या यह ब्राह्मण वर्चस्व वाला सामंती संगठन है?
2. आरएसएस जातिगत आरक्षण की समीक्षा क्यों करना चाहता है जातिवाद की क्यों नहीं? क्या आरक्षण पा रही जातियां कम हिंदू हैं?

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3. क्या आरएसएस के शिखर व्यक्तित्वों में से एक विनायक दामोदर सावरकर उर्फ़ वीर सावरकर ने जेल से छूटने के लिए अंग्रेज़ों से माफ़ी मांगी थी? वह माफ़ीनामा दस्तावेज़ के रूप में मौजूद है.
4. गांधी के हत्यारे नाथूराम गोडसे का आरएसएस से क्या संबंध था? (आरएसएस इसे तत्कालिक राजनीतिक परिस्थितियों में अपनी सुविधानुसार स्वीकारता/नकारता रहा है)
5. क्या पांचजन्य आरएसएस का मुखपत्र है? (हाल ही में संघ प्रमुख ने दादरी की घटना की तथ्यहीन, भड़काऊ रिपोर्ट छपने के बाद इनकार किया)
6. क्या आरएसएस को भारत का झंडा स्वीकार नहीं है? (14 अगस्त 1947 को आरएसएस के मुखपत्र में छपा - भारत के झंडे में तीन रंग अशुभ हैं, इससे ख़राब मनोवैज्ञानिक असर पड़ता है, यह भारत महादेश के लिए नुक़सानदेह है जिसे हिंदू कभी स्वीकार नहीं करेंगे)

7. आप मकरसंक्रांति पर दलित बस्तियों में समरसता भोज तो आयोजित करते हैं लेकिन छूआछूत और शोषण की पैरोकार वर्णव्यवस्था के ख़िलाफ़ चुप रहते हैं, क्यों?
8-राममंदिर अगर आस्था का प्रश्न है तो उसे भाजपा को राजनीतिक सहूलियत के हिसाब से उठाने और दफ़नाने क्यों दिया जाता है?
9. भारत हिंदू राष्ट्र ही क्यों बने भारतीय राष्ट्र क्यों नहीं, जिसमें अन्य ग़ैर हिंदू जीवनपद्धतियों वाले लोग भी रह सकें?
10. आप भारतीय दर्शन की उदार, तार्किक, नास्तिक और सर्वसमावेशी परंपराओं का सम्मान कब करेंगे?

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व्यक्तिवाद के प्रबल विरोधी, प्रसिद्धिपरांगमुख आरएसएस ने पहली बार नरेंद्र मोदी को पिछले लोकसभा चुनाव से पहले प्रधानमंत्री ही नामित नहीं होने दिया बल्कि उनकी हवा को प्रचंड बहुमत में बदलने में अपने स्वयंसेवकों के ज़रिए महत्वपूर्ण भूमिका निभाई.
मोदी के सत्ता में आने के बाद से इस संगठन ने हिंदू राष्ट्र के लक्ष्य के लिए अपनी पुरानी सोच के साथ गतिविधियां तेज़ कर दी हैं.
इन सवालों के जवाब अन्य कारणों के अलावा इसलिए भी ज़रूरी हैं कि चुप्पी से आरएसएस की विश्वसनीयता खंडित होती है और इसकी छवि मौक़ापरस्त और दोमुंहे संगठन की बन रही है.
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